राजस्थान के नागौर जिले में सांसद और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल के पैतृक गांव बरणगांव का पंचायत चुनाव चर्चा में आ गया है. यहां सरपंच की एक कुर्सी के लिए सात महिला प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा एक ही परिवार की दो महिलाओं को लेकर हो रही है. ये दोनों महिलाएं न केवल बेनीवाल परिवार की सदस्य हैं, बल्कि सगी बहनें भी हैं. सांसद के बड़े भाई स्वर्गीय रामप्रसाद बेनीवाल की पत्नी मीरा बेनीवाल और दूसरे बड़े भाई प्रेमसुख बेनीवाल की पत्नी राजबाला बेनीवाल सरपंच पद के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रही हैं. एक ही परिवार की दो महिलाओं के आमने-सामने आने से गांव का चुनाव दिलचस्प हो गया है. अब ग्रामीणों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरपंच की कुर्सी किसके हिस्से में आती है और मतदाता किस प्रत्याशी पर भरोसा जताते हैं.
बरणगांव में सरपंच पद के लिए कुल सात महिला प्रत्याशी मैदान में हैं. इनमें मीरा बेनीवाल और राजबाला बेनीवाल के बीच का मुकाबला खास चर्चा में है. दोनों के बीच रिश्तेदारी के साथ बेनीवाल परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी जुड़ी हुई है. मीरा बेनीवाल स्वर्गीय रामप्रसाद बेनीवाल की पत्नी हैं, जबकि राजबाला बेनीवाल प्रेमसुख बेनीवाल की पत्नी हैं. दोनों सगी बहनें हैं. ऐसे में यह चुनाव केवल सरपंच पद के उम्मीदवारों के बीच मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि एक ही परिवार की दो महिलाओं की दावेदारी ने इसे गांव की राजनीति का प्रमुख मुद्दा बना दिया है. हालांकि, चुनाव में कुल सात प्रत्याशी होने के कारण मुकाबला केवल इन दोनों तक सीमित नहीं है. सभी उम्मीदवार मतदाताओं का समर्थन हासिल करने की कोशिश में हैं. गांव की बुनियादी जरूरतों और विकास से जुड़े मुद्दे भी इस चुनाव में अहम रहेंगे.
25 साल पहले सरपंच रह चुके थे रामप्रसाद बेनीवाल
बरणगांव के इस चुनाव में राजनीतिक विरासत की चर्चा भी हो रही है. मीरा बेनीवाल के पति स्वर्गीय रामप्रसाद बेनीवाल गांव की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे थे. वह करीब 25 साल पहले गांव के सरपंच रह चुके थे. अब उनकी पत्नी मीरा बेनीवाल सरपंच पद के लिए चुनाव मैदान में हैं. ऐसे में उनके चुनाव लड़ने के साथ रामप्रसाद बेनीवाल की पुरानी राजनीतिक भूमिका भी चर्चा में है. दूसरी तरफ, राजबाला बेनीवाल भी सरपंच पद पर अपनी दावेदारी पेश कर रही हैं. दोनों प्रत्याशियों के बीच रिश्तेदारी इस मुकाबले को और दिलचस्प बना रही है. गांव के लोगों के सामने अब सात महिला प्रत्याशी हैं, जिनमें से किसी एक को सरपंच चुनना है. चुनाव में किस प्रत्याशी को कितना समर्थन मिलता है, इसका फैसला मतदाता करेंगे.
बरणगांव और उससे जुड़े बूढ़ी व अर्जुनपुरा क्षेत्र को मिलाकर बताए गए आंकड़ों के अनुसार, यहां कुल 2,970 मतदाता हैं. सरपंच पद के लिए मैदान में उतरीं सातों महिला प्रत्याशियों के सामने इन मतदाताओं का विश्वास जीतने की चुनौती है. पंचायत चुनाव में गांव की बुनियादी समस्याएं, विकास और स्थानीय जरूरतें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. मतदाताओं के सामने उम्मीदवारों को परखने और अपने हिसाब से प्रतिनिधि चुनने का अवसर है. एक ओर दो सगी बहनों के चुनाव लड़ने की चर्चा है, तो दूसरी ओर छह अन्य प्रत्याशियों के साथ कुल सात उम्मीदवारों के बीच मुकाबला है. ऐसे में चुनाव का परिणाम किसके पक्ष में जाता है, इस पर गांव के लोगों की नजरें टिकी हुई हैं.
बेनीवाल परिवार के पुराने चुनावी मतभेद भी चर्चा में
बरणगांव के सरपंच चुनाव की चर्चा के बीच बेनीवाल परिवार से जुड़े पुराने राजनीतिक घटनाक्रम भी सामने आ रहे हैं. मीरा बेनीवाल और सांसद हनुमान बेनीवाल के बीच लंबे समय से मतभेद होने की बात कही जाती रही है. पिछले विधानसभा चुनाव में मीरा बेनीवाल की बेटी डॉ. अनीता बेनीवाल भी हनुमान बेनीवाल के सामने चुनाव मैदान में उतरी थीं. हालांकि, उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. वहीं, सांसद हनुमान बेनीवाल की पत्नी कनिका बेनीवाल खींवसर विधानसभा उपचुनाव में चुनाव हार गई थीं. इन घटनाक्रमों के बीच बरणगांव का सरपंच चुनाव एक बार फिर बेनीवाल परिवार से जुड़े राजनीतिक समीकरणों को चर्चा में ले आया है. हालांकि, पुराने चुनावी घटनाक्रमों के आधार पर वर्तमान पंचायत चुनाव में किसी प्रत्याशी को मिलने वाले समर्थन का अनुमान नहीं लगाया जा सकता.
इस चुनाव को लेकर एक बड़ा सवाल यह भी है कि सांसद हनुमान बेनीवाल की भूमिका क्या होगी. क्या वह किसी प्रत्याशी के समर्थन में सामने आएंगे या चुनाव से दूरी बनाए रखेंगे. फिलहाल, उनके समर्थन को लेकर किसी स्पष्ट रुख की पुष्टि नहीं है. इसलिए गांव के चुनाव में उनकी भूमिका को लेकर अटकलों के बजाय वास्तविक स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार है. फिलहाल, मुकाबले में सात महिला प्रत्याशी हैं और मीरा बेनीवाल तथा राजबाला बेनीवाल के बीच की रिश्तेदारी चुनाव को खास बना रही है. बरणगांव में सरपंच पद के लिए होने वाला यह मुकाबला अब मतदाताओं के फैसले पर निर्भर है. 2,970 मतदाताओं के बीच से किस प्रत्याशी को समर्थन मिलता है, कौन गांव का नेतृत्व संभालता है और विकास से जुड़े मुद्दों पर किसे जिम्मेदारी मिलती है, इसका जवाब चुनाव परिणाम आने के बाद ही मिलेगा.