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बंगाल चुनाव की ‘परफेक्‍ट वोटिंग’ का दूसरे चरण के ल‍िए क्‍या मैसेज है

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले फेज में भारी मतदान हर किसी के लिए जोश बढ़ाने वाला है. चाहे वे राजनीतिक दल हों, चुनाव आयोग हो या बंगाल के वोटर सभी उत्साहित लग रहे हैं. असली बात तो 4 मई को ही सामने आएगी, लेकिन दूसरे चरण के लिए पहले चरण का मतदान कई बातों का मोटिवेशन देने वाला तो है ही.

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पश्चिम बंगाल में पहले चरण के चुनाव में मतदान केंद्र के बाहर अपनी बारी का इंतजार कर रहे वोटर. (Photo: PTI)
पश्चिम बंगाल में पहले चरण के चुनाव में मतदान केंद्र के बाहर अपनी बारी का इंतजार कर रहे वोटर. (Photo: PTI)

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की शुरुआत बंपर वोटिंग से हुई है. पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से 152 सीटों पर पहले फेज में 92 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ है. इससे पहले 2011 में सबसे ज्यादा मतदान हुआ था, लेकिन इस बार वह रिकॉर्ड भी टूट गया है. 

2021 के पिछले विधानसभा चुनाव से तुलना करें, वोटिंग में 10 फीसदी का इजाफा हुआ है. क्या ये बढ़ोतरी SIR की वजह से हुई है? बिहार चुनाव के नतीजे तो यही बताते हैं. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी पिछली बार की तुलना में 10 फीसदी ज्यादा वोटिंग दर्ज की गई थी. 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में 57.27 फीसदी मतदान हुआ था, जबकि 2025 में 67.25 - ध्यान रहे पश्चिम बंगाल से पहले बिहार में ही SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद विधानसभा चुनाव हुआ था. 

बंगाल में हुए भारी मतदान पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का कहना है, 'आजादी के बाद से पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में सबसे ज्यादा मतदान प्रतिशत दर्ज हुआ है... चुनाव आयोग दोनों राज्यों के हर मतदाता को सलाम करता है.'

तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी का कहना था, बंगाल की जनता ने SIR के खिलाफ बंपर वोटिंग की है, जबकि बीजेपी नेता अमित शाह ने कहा कि TMC का सूरज ढल चुका है.

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पश्चिम बंगाल में आगे भी ज्यादा वोटिंग के संकेत

1. पश्चिम बंगाल चुनाव के पहले फेज में विधानसभा की 152 सीटों के लिए वोटिंग हो चुकी है, बाकी 142 सीटों पर मतदान 29 अप्रैल को होगा. पहले चरण की वोटिंग दूसरे चरण में वोट डालने जा रहे लोगों के लिए जोश बढ़ाने वाली है. ऐसे में दूसरे चरण में भी पश्चिम बंगाल में बंपर वोटिंग की उम्मीद की जा सकती है.  

2. विधानसभा चुनाव एसआईआर के बाद हुआ है. जिन लोगों के नाम कट गए उनका अलग संघर्ष है, लेकिन लोगों ने मतदान में बढ़ चढ़ कर हिस्सा इसलिए भी लिया है, ताकि आगे भी वोटर लिस्ट में उनका नाम बना रहे. अगर आगे एसआईआर हुआ तो निश्चित तौर पर 2026 की वोटर लिस्ट में नाम ही आधार बनेगा. यह सवाल उन लोगों के मन में भी होगा जिनको दूसरे चरण में वोट डालना है, और आगे भी ऐसे ही भारी मतदान की अपेक्षा की जा सकती है. 

3. चुनाव से पहले मालदा की घटना और वोटिंग के दिन की घटनाओं को छोड़ दें, तो शांतिपूर्ण मतदान के काफी करीब लगता है. पहले के चुनावों के दौरान हुई हिंसक घटनाओं से तुलना करें, तो ऐसा निश्चित तौर पर कहा जा सकता है. 

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और, ये सब संभव हो सका है पूरे पश्चिम बंगाल में तीन लेयर के व्यापक सुरक्षा बंदोबस्त के कारण ही. रिपोर्ट के मुताबिक, पहले चरण के लिए केंद्रीय बलों की 2407 कंपनियां, 2193 QRT यानी क्विक रिस्पांस टीम और 40,000 पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था. 

4. वोटिंग प्रतिशत बढ़ने का एक बड़ा कारण एसआईआर भी है. एसआईआर प्रक्रिया में न‍िष्‍क्र‍िय (मृत अथवा पलायन कर गए) पड़े नाम वोटर लिस्ट से हटने के कारण भी वोट‍ प्रतिशत बढ़ा है, जाहिर है अगले चरण में भी यह बढ़ेगा. 

5. जहां तक राजनीत‍िक नफे-नुकसान का सवाल है, बंपर वोटिंग से इतना तय है क‍ि मुस्‍लिम मतदाता पहले भी बढ़ चढ़कर मतदान करते थे, और उनका रुझान काफी ह‍द तक एकतरफा होता था, इस बार चूंक‍ि वोटिंग प्रत‍िशत 90 फीसदी को पार कर गया है तो इसका अनुमान यही है क‍ि ह‍िंदुओं ने भी खूब वोट डाला है. उनका वोट क‍िसके खाते में गया है, यह असली रहस्‍य है. 

15 साल बाद बंपर वोटिंग

पश्चिम बंगाल की ही तरह तमिलनाडु में भी जमकर लोगों ने वोट डाले हैं. तमिलनाडु की सभी 234 सीटों पर एक ही दिन हुए मतदान में 85.14 फीसदी वोट डाले गए हैं. 9 अप्रैल को हुए असम, केरलम और पुड्डुचेरी में भी रिकॉर्ड वोटिंग दर्ज किए गए. असम के इतिहास में सबसे ज्यादा 85.91 फीसदी, पुड्डुचेरी में 90 फीसदी और केरलम में 1987 के बाद सबसे ज्यादा 78.27 फीसदी वोट पड़े हैं.

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पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में 2011 में 84.72 फीसदी मतदान दर्ज किया गया था. तब ममता बनर्जी ने 3 प्रत‍िशत का वोट स्‍व‍िंग लाकर लेफ्ट फ्रंट की सत्ता को उखाड़ फेंका था, यद‍ि वैसा ही जादू बीजेपी को करना है तो उसे दूसरे चरण में भी अपना दबदबा बनाए रखना होगा. दूसरे चरण के मतदान में करीब हफ्ते भर का फर्क है, और बीजेपी को कार्यकर्ताओं में जोश बरकरार रखना होगा. अगर सत्ता में वापसी करनी है, तो ममता बनर्जी पर भी यही बात लागू होती है. 

पहले के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2006 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में 81.97 फीसदी वोट डाले गए थे. वैसे ही 2016 के चुनाव में 83.02 फीसदी, 2021 में 82.30 फीसदी - और, 2026 के पहले चरण के चुनाव में वोट प्रतिशत 92.88 दर्ज किया गया है. 

देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने पश्चिम बंगाल चुनाव में भारी संख्या में लोगों के वोट डालने पर कहा है, लोग 92 फीसदी के रिकॉर्ड मतदान पर तरह-तरह के अनुमान लगा रहे हैं... अगर 70 लाख (7 मिलियन) मतदाताओं के नाम सूची से नहीं हटाए गए होते, तो यह आंकड़ा लगभग 83 फीसदी ही रहता.

राजनीतिक दलों के लिए क्या संदेश है

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पश्चिम बंगाल में लोगों के इतनी बड़ी तादाद में वोट डालने को लेकर सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और चुनाव में चैलेंज कर रही भारतीय जनता पार्टी ने अपने अपने हिसाब से जनादेश का संदेश समझा है, और समझाने की भी कोशिश की है. जीत के दावे दोनों ही तरफ से किए जा रहे हैं. 

वोटिंग खत्म होने के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा, जनता ने एसआईआर के विरोध में बंपर वोटिंग की है. इसमें इतने नाम कटे हैं कि किसी ने कोई रिस्क नहीं लिया. सबने वोट डाला है. तृणमूल कांग्रेस नेता कुणाल घोष
ने लोगों के बढ़ चढ़कर मतदान में हिस्सा लेने पर कहा, यह चुनाव ममता बनर्जी के पक्ष में है और बीजेपी की बंगाल-विरोधी नीतियों के खिलाफ है. 

कुणाल घोष ने दावा किया, 152 सीटों में से हम कम से कम 125 सीटें जीतने जा रहे हैं... यह आंकड़ा 133 से 135 तक भी जा सकता है... यह जीत का साफ संकेत है.

बीजेपी की तरफ से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का दावा है कि पार्टी 152 में से 110 विधानसभा सीटें जीतने जा रही है. मतदान खत्म होने के बाद अमित शाह ने X पर ढलते सूरज का एक वीडियो शेयर करते हुए अंग्रेजी और बांग्ला में लिखा था, 'तृणमूल के भ्रष्टाचार और गुंडाराज का सूरज ढल चुका है.'

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मोथाबाड़ी का हाल

बंगाल में पहले चरण के मतदान के आंकड़ों पर नजर डालें तो 16 में से 13 जिलों में 90 फीसदी से ज्यादा वोटिंग हुआ है. सबसे ज्यादा वोटिंग दक्षिण दिनाजपुर में दर्ज की गई है. उसके बाद नंबर आता है कूचबिहार का, फिर बीरभूम, मुर्शिदाबाद, जलपाईगुड़ी, पश्चिम मेदिनीपुर और झाड़ग्राम का - और ऐन उसी वक्त मालदा के मोथाबाड़ी में सन्नाटा नजर आया. 

मोथाबाड़ी - पश्चिम बंगाल के मालदा जिले का छोटा-सा यह गांव 1 अप्रैल को तब सुर्खियों में आया था, जब आस पासल के लोगों ने कुछ न्यायिक अधिकारियों को कई घंटे तक बंधक बनाए रखा. तब से लेकर अब तक, मोथाबाड़ी में कई वाकये देखे गए. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर NIA की जांच, कई गिरफ्तारियां, सुरक्षा बलों की की तैनाती. 

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर किसी के जुबान पर एक ही शब्द सुनने को मिल रहा था, SIR. अलीनगर के मतिउर रहमान ने बातचीत में बताया कि तमाम दस्तावेड जुटाने और पेश करने के बावजूद उनका और परिवार के दो लोगों का नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया. बातचीत में मतिउर रहमान का कहना था, जिन लोगों की किस्मत अच्छी थी, वे वोट डालने बूथ पर चले गए. लेकिन, आज हमें तो सड़क पर कदम रखने की भी इजाजत नहीं है... क्या इसी को लोकतंत्र कहते हैं?

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60 साल के दिलीप एसके को आखिर तक समझ में नहीं आया कि उनका नाम वोटर लिस्ट से क्यों हट गया? जबकि उनके बेटे का वोटर लिस्ट में है. दिलीप का सवाल है, अगर मेरा नाम नहीं है, तो मेरे बेटे का नाम कैसे है? 

दिलीप के अनुसार, 2002 की वोटर लिस्ट में उनका नाम शुमार था, और उसी के आधार पर बाद में उनके बेटों के नाम दर्ज किए गए थे, फिर भी उनका नाम हटा दिया गया.

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