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विश्वयुद्ध किश्‍तों में... दिनोदिन तेज होती जा रही है महाविनाश की आहट

वेनेजुएला ऑपरेशन के बाद से डोनाल्ड ट्रंप के पुराने सभी बयानों को खोद-खोदकर निकाला जा रहा है. अब यह मानना पड़ेगा कि 2025 में उन्होंने जो कहा वह सिर्फ सनक नहीं थी. बल्कि, दुनिया को अपने ढंग से हांकने का उनका इरादा किसी भी हद तक जा सकता है.

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तीसरे विश्वयुद्ध, या महाविनाश की कगार पर दुनिया?
तीसरे विश्वयुद्ध, या महाविनाश की कगार पर दुनिया?

2026 की शुरुआत के साथ दुनिया आज उस मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहां अचानक से एक दिन कोई देश दूसरे पर हमला करेगा और अगले दिन कहेगा क‍ि 'हमारे पास कोई और विकल्‍प नहीं था'. फिर आप डॉट्स कनेक्‍ट करते रहिये क‍ि युद्ध अचानक नहीं हुआ, बल्कि धीरे-धीरे उसके लिए हालात सामान्य ढंग से बनाए गए. पहले बयान, फिर धमकियां, उसके बाद सैन्य अभ्यास, और अंत में अटैक. डोनाल्ड ट्रंप हों या व्लादिमीर पुतिन, शी जिनपिंग हों या मिडिल ईस्‍ट के नेता, आज ग्‍लोबल पॉलिटिक्‍स में ताकतवर देशों की भाषा एक-सी हो गई है.

डोनाल्ड ट्रंप जब ग्रीनलैंड को 'खरीदने' से लेकर 'सैन्य विकल्प' जैसी बातें कहते हैं, तो यह सिर्फ एक सनकी बयान नहीं रह जाता. यह उस सोच का हिस्सा बन जाता है जिसमें सीमा, संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून कोई मायने नहीं रखते. बल्कि मोलभाव की चीजें बनती जा रही हैं. यही सोच दुनिया पहले भी देख चुकी है. द्वितीय विश्‍वयुद्ध से पहले जब जर्मनी ने कहा था कि कुछ इलाकों पर उसका 'नेचुरल राइट' है. और फिर धीरे धीरे वह पूरे यूरोप पर काबिज हो गया. वेनेजुएला पर हमले को न्‍यायसंगत साबित करने के लिए संयुक्‍त राष्‍ट्र में अमेरिकी राजदूत जब कहते हैं कि 'पश्चिमी गोलार्द्ध हमारा है', तो यह द्वितीय विश्‍वयुद्ध से पहले वाले जर्मनी की याद दिलाता है.

डोनाल्‍ड ट्रंप सिर्फ वेनेजुएला या ग्रीनलैंड तक सीमित नहीं हैं. वे मेक्सिको, पनामा, कोलंबिया, क्‍यूबा को भी धमका चुके हैं. वे सिर्फ लैटिन अमेरिका ही नहीं, ईरान को भी कह रहे हैं कि वह उस पर हमले के लिए तैयार हैं. इस्‍लामिक स्‍टेट का नाम लेकर वे दस दिन पहले नाइजीरिया पर भी अटैक कर चुके हैं. ट्रंप की नजर में किसी भी राष्‍ट्र की संप्रभुता मायने नहीं रखती है. अपने दूसरे कार्यकाल में वे अपने डिफेंस डिपार्टमेंट का नाम बदलकर डिपार्टमेंट ऑफ वॉर रख चुके हैं. मतलब, ट्रंप डिफेंसिव नहीं, बल्कि वॉर पर उतारू हैं.

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चीन के उकसावे को लेकर कब तक धैर्य रखेंगे पड़ोसी

चीन ताइवान को लेकर लगातार यह दोहरा रहा है कि उसका चीन से मिलन होकर रहेगा. इसके लिए वह सेना के इस्‍तेमाल से नहीं हिचकेगा. पिछले एक पखवाड़े से ताइवान के आसपास के समुद्र को चीन ने लगभग बंधक ही बना लिया. सैन्‍य अभ्‍यास के नाम पर उसने ताइवान के अधिग्रहण की लगभग तैयारी कर ली है. डिप्‍लोमैटिक स्‍तर पर आक्रामक बयानबाजी जारी है. सिर्फ ताइवान ही नहीं, दक्षिण चीन सागर में पड़ोसी देशों की चुनौती दी जा रही है. चीन ने पिछले दिनों जापान की सैन्‍य तैयारियों पर भी ऐतराज जताते हुए उसे पुराने युद्ध के दिनों की याद दिलाई. इधर, चीन अपने पश्चिमी पड़ोसी भारत के प्रति भी कोई अच्‍छी सोच नहीं रखता है. अरुणाचल प्रदेश को लेकर उसकी कारगुजारियां पिछले दिनों विवादों में रही. यह भारत का धैर्य ही है, जिसकी वजह से चीन के साथ कोई बड़ा संघर्ष टल जाता है. वरना, चीन भारत के लिए हिमालय ही नहीं, पाकिस्‍तान, श्रीलंका, बांग्‍लादेश, मालदीव के जरिए कोई न कोई चुनौती पेश करता रही रहता है. लेकिन, चीन की असली तैयारी अपने पड़ोसियों के लिए नहीं, बल्कि अमेरिका के लिए है. दोनों देशों में इस समय जो नेतृत्‍व है, वह अति महात्‍वाकांक्षी है. किसी भी हद से गुजर जाने वाला.

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यूक्रेन में रूस की NATO से अंतहीन होती रस्‍साकशी

रूस ने यूक्रेन पर हमला करते समय तर्क दिया था कि यह सुरक्षा का सवाल है. पुराना हिसाब है, जो अब बराबर हो रहा है. और यह भी क‍ि NATO के जरिए पश्चिम के फैलाव को रोकना उसकी मजबूरी है. नतीजा सबके सामने है. करीब चार साल से दोनों देशों के भीतर तबाही मची है. लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं. और इसी युद्ध के नाम पर दुनिया दो खेमों में साफ बंटी दिखती है. रूस से यूक्रेन ही नहीं, पोलैंड और फिनलैंड भी खतरा जताते हैं. पूरा यूरोप पुतिन को राक्षस की नजर से देखता है. और रूस पर काबू पाने के मंसूबे दिन-रात देखता रहता है.

मिडिल-ईस्‍ट में इजरायल का फाइनल टारगेट अब ईरान

तीन साल पहले हमास ने इजरायल नामी बारूद में ऐसी चिंगारी लगाई क‍ि मिडिल ईस्‍ट में उसकी आग थमने का नाम नहीं ले रही है. इजरायल के हमलों से गाजा पट्टी पूरी तरह तबाह हो चुकी है. हजारों लोग मारे गए हैं. इजरायल के उत्‍तर में बसा लेबनान भी इस आग की जद में आया है. हेजबुल्‍ला के ठिकानों पर इजरायल लगातार बमबारी कर रहा है. उसने सीरिया की सैन्‍य ताकत ही नहीं, वहां की सत्‍ता को भी ठिकाने लगा दिया है. इन सबके बीच इजरायल अपने असली दुश्‍मन ईरान पर लगातार हमलावर है. वह एक दौर में उस पर भीषण बमबारी कर चुका है. और अगली बार कभी भी कर सकता है. 2026 ईरान के लिए शुभ संकेत लेकर नहीं आया है. आंतरिक विरोध प्रदर्शनों के बीच उसे इजरायल और अमेरिका दोनों गिद्ध दृष्टि से देख रहे हैं. नेतृत्‍व परिवर्तन (regime change) के नाम पर कभी भी कुछ भी हो सकता है. विशेषज्ञ कहते हैं कि ईरान में जो भी होगा वह वेनेजुएला जैसा शांतिपूर्ण नहीं, बल्कि बहुत खूनखराबे वाला होगा.

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यमन में सऊदी अरब के सिर से ऊपर निकला पानी

दस साल से जारी यमन सिविल वॉर 2026 में नए दौर में प्रवेश कर गई. यमन के लड़ाका गुटों से खतरे को देखते हुए सऊदी अरब यहां कई बार हमले कर चुका है. लेकिन पिछले दिनों सऊदी का गुस्‍सा तब आसमान पार कर गया, जब उसे पता चला क‍ि यूएई ने एक यमनी विद्रोही गुट को सपोर्ट किया है. एक सप्‍ताह से सऊदी अरब और उसके सहयोगी देशों की सेनाएं यमन में घुसी हुई हैं. अलग अलग जगहों पर जमीन और हवा से हमले किए जा रहे हैं. जैसे, सऊदी प्रिंस मोहम्‍मद बिन सलमान के इरादे हैं, वह यमन को एक बीमारी के रूप में देख रहे हैं. और इस बार वे न सिर्फ उसे पूरी तरह साफ करना चाहते हैं. बल्कि यमन के तेल से समृद्ध इलाके को सऊदी का हिस्‍सा ही बना लेना चाहते हैं.

नॉर्मल होते जा रहे हैं युद्ध

खतरनाक बात यह नहीं है कि युद्ध हो रहे हैं. खतरनाक यह है कि युद्ध की भाषा अब असामान्य नहीं रही. पहले किसी देश के नेता द्वारा दूसरे देश पर हमले की धमकी देना अंतरराष्ट्रीय हंगामा बन जाता था. आज वही बयान चुनावी राजनीति, घरेलू राष्ट्रवाद और सोशल मीडिया की सुर्खियों में दबकर सामान्य लगने लगे हैं. हर ताकतवर देश अपनी जनता को यह जता देना चाह रहा है कि दूसरों पर हमला करना उसके लिए जरूरी और मजबूरी हो गया है.

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इतिहास बताता है कि विश्व युद्ध अचानक नहीं होते. पहला विश्व युद्ध भी एक हत्या से नहीं, बल्कि वर्षों की सैन्य होड़, गठबंधनों और राष्ट्रवादी उन्माद से पैदा हुआ था. दूसरा विश्व युद्ध भी रातों-रात नहीं फूटा. पहले ऑस्ट्रिया, फिर चेकोस्लोवाकिया, फिर पोलैंड. हर बार दुनिया ने सोचा, शायद ये यहीं रुक जाएगा. लेकिन वह नहीं रुका.

परमाणु बम क्‍या रोक पाएंगे महायुद्ध?

आज भी वही भ्रम दिखाई देता है. माना जा रहा है कि परमाणु हथियार युद्ध को रोक लेंगे. लेकिन यही हथियार अब धमकी का औजार बन चुके हैं. जब नेता यह कहते हैं कि 'हम हर विकल्प खुले रखते हैं', तो उसका मतलब सिर्फ कूटनीति नहीं होता. उसका मतलब होता है कि विनाश की कोई सीमा नहीं है. पाकिस्‍तान की तरफ से भारत को सिर्फ और सिर्फ परमाणु बम की ही धमकी मिलती है. और हद तो तब हो गई जब अमेरिका जैसे ताकतवर देश के राष्‍ट्रपति ट्रंप फिर से परमाणु परीक्षण की बात कहते हैं. रूस और चीन भी अपनी परमाणु हथियारों की क्षमता दिखाने से पीछे नहीं हटते.

सबसे चिंताजनक यूएन की बेबसी

सबसे चिंताजनक यह है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं कमजोर पड़ रही हैं. संयुक्त राष्ट्र बेबस दिखता है, सुरक्षा परिषद वीटो की राजनीति में फंसी है. अंतरराष्ट्रीय कानून ताकतवर देशों के लिए सलाह बनता जा रहा है, नियम नहीं. छोटे देश यह देख रहे हैं कि अगर बड़े देश नियम तोड़कर भी बच सकते हैं, तो वे क्यों मानें?

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यही माहौल विश्व युद्ध की जमीन तैयार करता है. शायद अगले विश्‍व युद्ध का आगाज किसी खास दिन नहीं होगा. वह कई मोर्चों पर छोटे-छोटे युद्धों के रूप में शुरू होगा. यूक्रेन, ताइवान, मिडिल ईस्‍ट, आर्कटिक, अफ्रीका और फिर धीरे-धीरे एक-दूसरे से जुड़ता जाएगा. जब तक दुनिया समझेगी, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी. आज सवाल यह नहीं है कि तीसरा विश्व युद्ध होगा या नहीं. सवाल यह है कि क्या दुनिया उसे पहचान पाएगी, जब वह धीरे-धीरे हमारे सामने आकार ले रहा होगा.

ईश्‍वर करे, ये तमाम आशंकाएं गलत साबित हों. अमन कायम रहे.

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