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मोदी-योगी की जुगलबंदी... मेरठ से निकला 2027 का संकेत, 2017 जैसी प्रचंड जीत का गेम प्लान तय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर में विकास के एजेंडे को चुनावी चर्चा के बीच में रखा है. जातिगत रूप से संवेदनशील राज्य बिहार के चुनाव में भी एनडीए की बढ़त के पीछे इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट को अहम माना गया. लेकिन, यूपी में मोदी और योगी के कॉम्बिनेशन ने डेवलपमेंट के इसी नैरेटिव को और ज्यादा अभेद्य बना दिया है.

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पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ ने दिल्ली-मेरठ मेट्रो का उद्धाटन किया. (फोटो- PTI)
पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ ने दिल्ली-मेरठ मेट्रो का उद्धाटन किया. (फोटो- PTI)

पश्चिमी उत्तर प्रदेश मेरठ में रविवार को हुआ रैपिड रेल परियोजना का उद्घाटन सामान्य सरकारी कार्यक्रम भर नहीं था. यह वह मंच था जहां विकास की भाषा और राजनीति का संदेश एक साथ बुना गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की साझा उपस्थिति ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 की भूमिका अभी से लिखी जा रही है. और यह भूमिका 2017 जैसी प्रचंड चुनावी जीत की है. मंच पर दिखी सहजता, परस्पर प्रशंसा और विपक्ष पर केंद्रित हमले के संकतों को पढ़ें तो यह केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सोची समझी राजनीतिक प्रस्तुति थी.

विकास के मंच से राजनीतिक ताने-बाने का निर्माण

रैपिड रेल जैसी परियोजना आधुनिक भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर की पहचान बन चुकी है. लेकिन मेरठ में यह परियोजना केवल गति और विकास की कहानी नहीं कह रही थी, बल्कि भाजपा के डबल इंजन मॉडल को स्थापित करने का माध्यम भी बनी. प्रधानमंत्री ने जिस तरह योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व की सराहना की, वह एक संदेश था कि केंद्र और राज्य की एकजुटता ही विकास की गति को तय करती है.

यह संदेश सीधा और सरल था- नीति दिल्ली में बनती है, लेकिन उसका प्रभाव तभी दिखता है जब लखनऊ में उसे जमीन पर उतारने की क्षमता हो. भाजपा इस तालमेल को अपने राजनीतिक नैरेटिव का केंद्रीय तत्व बना चुकी है. मेरठ का मंच उसी कथा का विस्तार था, जहां विकास को उपलब्धि नहीं, बल्कि चुनावी विश्वास में बदला जा रहा था.

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कांग्रेस पर प्रहार, सपा पर दबाव

दिलचस्प बात यह रही कि इस मंच से सबसे तीखा हमला कांग्रेस पर हुआ. पहली नजर में यह थोड़ा असामान्य लग सकता है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी ताकत समाजवादी पार्टी को माना जाता है. लेकिन राजनीति केवल प्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धा नहीं होती, वह विमर्श की दिशा तय करने का खेल भी होती है.

कांग्रेस पर हमले एक बड़े रणनीतिक संकेत की ओर इशारा करते हैं. अगर कांग्रेस को विपक्ष के केंद्र में लाया जाता है, तो यूपी में मुख्य प्रतिपक्ष समाजवादी पार्टी की स्थिति अपने आप मुश्किल में आ जाती है. यह स्थिति अखिलेश यादव के लिए असहज हो सकती है, क्योंकि उन्हें अपने आधार को बचाने के साथ-साथ विपक्षी एकता की राजनीति में भी संतुलन बनाना होगा.

यह दबाव केवल सीटों का नहीं, बल्कि नेतृत्व के प्रश्न का भी है. जैसे ही कांग्रेस का विमर्श मजबूत होता है, विपक्ष के भीतर शक्ति संतुलन बदलने लगता है. भाजपा शायद इसी मनोवैज्ञानिक दबाव को निर्मित करना चाहती है.

बिहार की रणनीति की झलक

मेरठ में दिखा यह पैटर्न पूरी तरह नया नहीं है. बिहार की राजनीति में भी कुछ ऐसा ही प्रयोग देखने को मिला था. वहां भाजपा ने प्रत्यक्ष रूप से क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी पर हमला करने के बजाय कांग्रेस के विमर्श को उभारा, जिससे विपक्षी खेमे में नेतृत्व को लेकर असमंजस बढ़ा. इसके समानांतर, शासन और स्थिरता के प्रतीक के रूप में सहयोगी नेतृत्व को आगे रखा गया. इससे चुनाव केवल सरकार बनाम विपक्ष का संघर्ष नहीं रह गया, बल्कि स्थिरता बनाम अनिश्चितता की बहस में बदल गया.

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मेरठ की सभा में भी यही सूत्र दिखाई देता है. योगी आदित्यनाथ को विकास और सुशासन के चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि कांग्रेस को विपक्षी विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास हुआ. इससे समाजवादी पार्टी के सामने एक नई राजनीतिक चुनौती खड़ी होती है.

अखिलेश यादव के सामने दोहरी चुनौती

अखिलेश यादव के लिए यह स्थिति सरल नहीं है. उन्हें भाजपा के विकास नैरेटिव का जवाब देना है और साथ ही विपक्षी खेमे में अपनी केंद्रीय भूमिका भी बनाए रखनी है. यदि कांग्रेस का प्रभाव बढ़ता है, तो सपा को अपने सामाजिक समीकरणों के साथ-साथ राजनीतिक रणनीति पर भी पुनर्विचार करना पड़ सकता है.

यह चुनौती केवल चुनावी नहीं, बल्कि वैचारिक भी है. भाजपा जहां विकास और स्थिर नेतृत्व की छवि को मजबूत कर रही है, वहीं विपक्ष को यह तय करना होगा कि उसका मुख्य संदेश क्या होगा - सामाजिक न्याय, आर्थिक मुद्दे या फिर गठबंधन की राजनीति.

भाजपा की दोहरी बढ़त की रणनीति

भाजपा के लिए यह रणनीति कई स्तरों पर लाभकारी हो सकती है. एक ओर योगी सरकार के कामकाज को प्रधानमंत्री के समर्थन से वैधता मिलती है, जिससे राज्य स्तर पर नेतृत्व की विश्वसनीयता बढ़ती है. दूसरी ओर विपक्ष के भीतर प्रतिस्पर्धा और असमंजस को बढ़ावा मिलता है. जब विपक्ष अपने भीतर ही संतुलन साधने में व्यस्त होता है, तब सत्तारूढ़ दल को अपने एजेंडे को स्थापित करने का अधिक अवसर मिलता है. भाजपा इसी राजनीतिक स्पेस को साधने की कोशिश करती दिख रही है.

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मेरठ से 2027 की शुरुआत

राजनीति में संकेत अक्सर शब्दों से ज्यादा प्रभावशाली होते हैं. मेरठ में मोदी और योगी की केमिस्ट्री, विकास की पृष्ठभूमि और कांग्रेस पर केंद्रित हमला - इन तीनों को एक साथ देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि भाजपा ने 2027 के लिए अपनी प्रारंभिक रेखाएं खींच दी हैं. यह केवल एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक प्रस्तावना थी. इसमें विकास का वादा है, नेतृत्व की स्थिरता का भरोसा है और विपक्ष की असंगति को रेखांकित करने की कोशिश भी.

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