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लोकसभा चुनाव में क्‍या होगा मायावती का रोल? BSP सांसदों को लेकर उभरने लगे नए समीकरण

उत्तर प्रदेश में सियासी समीकरण सेट हो चुके हैं. बीजेपी और सपा-कांग्रेस गठबंधन आमने-सामने हैं. जयंत चौधरी बीजेपी की तरफ हैं, लेकिन मायावती? शुरू से ही मायावती एक बात पर कायम हैं, बीएसपी चुनाव अकेले लड़ेगी. सवाल ये है कि अकेले लड़कर हासिल क्या होगा - फायदा खुद को होगा या कोई और उठाएगा?

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लोकसभा चुनाव को लेकर मायावती की रहस्यमय खामोशी ने यूपी से बसपा के सांसदों को अधर में डाल दिया है.
लोकसभा चुनाव को लेकर मायावती की रहस्यमय खामोशी ने यूपी से बसपा के सांसदों को अधर में डाल दिया है.

उत्तर प्रदेश में 80 लोक सभा सीटों की लड़ाई है. चुनाव तारीखों के ऐलान से पहले ही राजनीतिक समीकरणों की तस्वीर साफ हो चुकी है. बीजेपी से लड़ने के लिए अखिलेश यादव ने फिर से राहुल गांधी की कांग्रेस से हाथ मिला लिया है. 

जयंत चौधरी तो पहले ही छिटक कर बीजेपी के पास जा चुके हैं, लेकिन मायावती किसी से भी गठबंधन न करने की बात पर अब भी कायम हैं. और ये बात वो बार बार बता भी रही हैं, ये समझाते हुए कि राजनीतिक विरोधी उनके खिलाफ अफवाह फैलाने की कोशिश कर रहे हैं. 

आरएलडी नेता की तरह समाजवादी पार्टी छोड़ कर स्वामी प्रसाद मौर्य और सलीम शेरवानी भी अलग अलग मोड़ पर खड़े हो चुके हैं. आगे जो भी हो, ये लोग भी फिलहाल यहीं जताने की कोशिश कर रहे हैं कि मायावती की तरह ही अपने बूते अकेले मैदान में उतरेंगे. 

स्वामी प्रसाद मौर्य और सलीम शेरवानी की बात और है, लेकिन मायावती के अकेले लड़ने की बिलकुल अलग वजह हो सकती है. वैसे उनका दावा तो यही रहता है कि वो बहुजन समाज के हित में फैसले लेती हैं, और गठबंधन करने पर दूसरे दलों के वोट बीएसपी को ट्रांसफर नहीं हो पाते. 

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बीजेपी तो काफी पहले से ही लोक सभा चुनाव की तैयारियां शुरू कर चुकी है. देखा जाये तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी भारत जोड़ो न्याय यात्रा लेकर सड़क पर उतरे हुए हैं - लेकिन मायावती तो घर पर ही बैठी हुई हैं. हाल फिलहाल बहुत ज्यादा एक्टिव दिखीं हैं तो सोशल साइट X पर आकर कुछ लिखवा देती हैं - और उससे भी ज्यादा जरूरी लगा तो प्रेस कांफ्रेंस बुला कर अपनी बातें बोल चल पड़ती हैं.

सवाल-जवाब तो विरले ही होते हैं, और ऐसा ही एकतरफा संवाद पार्टी के अंदर भी लगता है - अगर ऐसा नहीं है तो बीएसपी के ज्यादातर सांसद इधर उधर हाथ पैर क्यों मार रहे हैं?

अकेले चुनाव लड़ने से मायावती को हासिल क्या होगा

मायावती ने अपनी तरफ से पूरी तरह साफ कर दिया है कि लोक सभा चुनाव 2024 में वो अकेले दम पर ही मैदान में उतरेंगी. प्रेस कांफ्रेंस में मायावती का कहना था, हमारी पार्टी देश में जल्दी ही घोषित होने वाले लोक सभा के आम चुनाव गरीबों और उपेक्षित वर्गों में से विशेषकर दलितों, आदिवासियों, अति पिछड़े वर्गों, मुस्लिम और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक समाज के लोगों के बलबूते ही पूरी तैयारी और दमदारी के साथ लड़ेगी.

मायावती का मामला समाजवादी पार्टी से थोड़ा अलग है. हाल फिलहाल देखा जाये तो अखिलेश यादव को गठबंधन का बार बार नुकसान उठाना पड़ा है, फिर भी वो कांग्रेस के साथ दोबारा चुनाव लड़ने जा रहे हैं. पिछली बार 2017 में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस विधानसभा चुनाव साथ लड़े थे, इस बार लोक सभा चुनाव में मिल कर हाथ आजमाने जा रहे हैं - लेकिन मायावती हमेशा ही फायदे में रही हैं. 

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सिर्फ 2007 में मायावती ने अपने बूते यूपी में सत्ता हासिल की थी. तब उनकी सोशल इंजीनियरिंग के खूब चर्चे हुआ करते थे. मायावती ने दलित और ब्राह्मण वोटों का गठजोड़ किया और सफल रही, लेकिन 2017 में उनका दलित-मुस्लिम प्रयोग पूरी तरह फेल रहा - हां, 2019 का सपा-बसपा गठबंधन मायावती के लिए बहुत फायदेमंद रहा. 

2019 के आम चुनाव में बीएसपी को 10 सीटें मिली थीं, जब वो अखिलेश यादव के साथ चुनावी गठबंधन करके लड़ी थीं. फिर भी मायावती से ये कहते हुए गठबंधन तोड़ लिया कि बीएसपी को समाजवादी पार्टी के वोट ट्रांसफर नहीं हो रहे हैं. सवाल ये उठता है कि अगर वोट ट्रांसफर नहीं हुए होते तो मायावती ने ऐसा क्या कमाल किया था कि पांच साल में उनकी सीटें शून्य से दस तक पहुंच गईं? समाजवादी पार्टी की सीटें देख कर तो यही लगता है कि अखिलेश यादव के उम्मीदवारों को बीएसपी के वोट नहीं मिले - और समाजवादी पार्टी 2014 की ही तरह 2019 में भी 5 सीटों पर ही सिमटी रही - ऊपर से डिंपल यादव की हार का दर्द भी झेलना पड़ा था. 

2022 के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने भी साबित कर दिया कि अखिलेश यादव के साथ मिल कर चुनाव लड़ने से मायावती को सबसे ज्यादा फायदा हुआ था. चुनाव नतीजे आये तो मालूम हुआ बीएसपी का सिर्फ एक उम्मीदवार विधानसभा पहुंच सका था. बलिया की रसड़ा विधानसभा सीट से उमाशंकर सिंह. 

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बीएसपी के घटते जा रहे वोट शेयर भी यही बता रहे हैं. 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में बीएसपी के वोट शेयर 22 फीसदी थे, लेकिन पांच साल बाद 2022 आते आते 13 फीसदी पहुंच गये. अगर 2019 में बीएसपी के वोट शेयर से तुलना करें तो 6 फीसदी से ज्यादा का नुकसान हुआ था - आगे तो अंदाजा ही लगाया जा सकता है. 

अब खबर आई है कि बीएसपी के 10 में से 8 सांसदों को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, न तो बीएसपी की तरफ से अब तक उनको कुछ बताया गया है, न ही मायावती तक वो पहुंच पा रहे हैं जिससे ये पता कर सकें कि उनको टिकट मिलने जा रहा है भी या नहीं?

एक सांसद को तो ये कहते सुना गया है कि उसे बीएसपी की बैठकों तक में नहीं बुलाया जाता, ऐसे में वो क्या करें समझ में नहीं आ रहा है.

क्यों है बीएसपी सांसदों को नये ठिकाने की तलाश

अफजाल अंसारी के लिए तो चुनावी राजनीति का रास्ता साफ हो चुका है. अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी की पहली ही सूची में गाजीपुर से अफजाल अंसारी को उम्मीदवार घोषित कर दिया है. 

दानिश अली का भी मामला करीब करीब वैसा ही लगता है. बीएसपी से निकाले जाने के बाद दानिश अली कांग्रेस के करीब देखे ही जा रहे थे. समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में अमरोहा की सीट कांग्रेस के हिस्से में आ जाने के बाद उनको टिकट मिलना करीब करीब पक्का लग रहा है. 

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दानिश अली के अलावा दो और बीएसपी सांसद कांग्रेस के संपर्क में बताये जाते हैं. ऐसे ही तीन सांसद समाजवादी पार्टी और चार सांसद बीजेपी में अपने लिए संभावनाएं तलाश रहे हैं. उनमें से एक सांसद मलूक नागर के आरएलडी नेता जयंत चौधरी के संपर्क में बताया जा रहा है. ठीक वैसे ही लालगंज सांसद संगीता आजाद और अंबेडकर नगर सांसद रितेश पांडेय के भी बीजेपी के संपर्क में होने की काफी चर्चा है. 

मायावती के मन में चल क्या रहा है?

बीएसपी का हाल भी कांग्रेस जैसा ही हो चला है. यूपी में बीएसपी और कांग्रेस की हैसियत में कोई खास फर्क नहीं बचा है. बीएसपी का वोट शेयर भी तेजी से घटा है. ये ठीक है कि 2019 में बीएसपी ने 10 लोक सभा सीटें जीती थी, और कांग्रेस ने महज 1. लेकिन 2022 आते आते तो बीएसपी विधानसभा में एक सीट पर पहुंच चुकी है, कांग्रेस के पास तो दो सीटें हैं. मायावती के साथ अब सिर्फ उनका जाटव दलित वोटर ही रह गया है - ऐसे में देखना है आम चुनाव में बीएसी की क्या स्थिति रहती है?

2022 के यूपी चुनाव में तो यही देखने को मिला कि मायावती की रणनीति का सबसे ज्यादा फायदा बीजेपी उठा रही थी. अब ये सब जानबूझ कर हो रहा हो, या यूं ही. संयोग हो या प्रयोग चल रहा हो - एक बात तो साफ है, मायावती की चुनावी रणनीति का सीधा फायदा बीजेपी को तो मिल ही रहा है. 

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करहल विधानसभा सीट को छोड़कर पूरी यूपी के विधानसभा सीटों पर बीएसपी की एक जैसी रणनीति दिखी थी, और बिलकुल वैसा ही नमूना तब भी देखने को मिला था जब अखिलेश यादव के इस्तीफे के बाद आजमगढ़ लोक सभा पर उपचुनाव हुआ - ऐसा क्यों लगता है कि बीएसपी की भूमिका अब धीरे धीरे वोटकटवा की बनती जा रही है? 

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