अगस्त, 2022 में एनडीए छोड़ने से लेकर जनवरी, 2024 तक नीतीश कुमार विपक्ष को एकजुट करने में शिद्दत से लगे रहे, और उनकी कोशिशों की बदौलत ही INDIA ब्लॉक अस्तित्व में आ सका - और अब भी बना हुआ है, बल्कि प्रासंगिक भी है.
नाम भले ही ममता बनर्जी ने सुझाया हो और अघोषित नेतृत्व राहुल गांधी ने दिया हो, लेकिन ताना बाना बुनने के साथ ढांचा तैयार कर खड़ा भी नीतीश कुमार का ही किया हुआ है.
अब वो खुद INDIA ब्लॉक को आगे नहीं बढ़ा पाये, या उनको विपक्षी दलों का अपेक्षित सपोर्ट नहीं मिल सका - लेकिन INDIA ब्लॉक की स्थापना से लेकर उसे अच्छी स्थिति में खड़ा करने तक के श्रेय से उनको वंचित नहीं किया जा सकता है.
और ये मानने में भी विपक्षी दलों को संकोच नहीं होना चाहिये कि अगर नीतीश कुमार अब भी साथ होते तो बात कुछ और ही होती. और हां, ममता बनर्जी भी दूर से ही कभी हां कभी ना नहीं कर रही होतीं, तो भी मामला अलग होता.
ये ठीक है कि नीतीश कुमार की उम्र बढ़ती जा रही है. ये भी ठीक है कि उनकी लोकप्रियता में कमी आई है, और ये भी ठीक है कि उनका अपना कोई जनाधार नहीं है - लेकिन ये तो सच है ही कि जिस किसी के साथ नीतीश कुमार होते हैं, पलड़ा तो उसका भारी हो ही जाता है. ये बात नीतीश कुमार के महागठबंधन में होने के दौरान भी देखा जा चुका है, और एनडीए में उनको बीजेपी के साथ रहते हुए भी महसूस किया जाता है.
राजनीतिक चाल ही सही, लेकिन पासा तो तेजस्वी यादव की तरफ से अब भी फेंका ही जा रहा है - और नीतीश कुमार बस ये बोल कर खामोश हो जाते हैं कि अब वो कहीं भी नहीं जा रहे हैं.
1. न नीतीश साथ हैं न ममता, फिर भी INDIA ब्लॉक बना हुआ है
संस्थापक सदस्य होने के नाते नीतीश कुमार अगर INDIA ब्लॉक में ही होते तो देश की राजनीति में विपक्ष का प्रभाव और उनका कद अभी के मुकाबले कहीं ज्यादा बड़ा होता. छोड़ने से पहले वो कांग्रेस को बार बार आगाह कर रहे थे, क्योंकि कमजोर स्थिति में भी कांग्रेस की विपक्ष के केंद्र बिंदु बनी हुई थी, और अब भी है.
राहुल गांधी और तेजस्वी यादव भले ही श्रेय के लेन देन को लेकर नीतीश कुमार को खारिज करने की कोशिश करें, लेकिन आज की तारीख में विपक्ष में कोई नहीं बचा है जो नीतीश कुमार की तरह बीजेपी नेतृत्व को चैलेंज कर सके.
चैलेंज करने का मतलब जोर जोर से भाषण देना और ऊलजलूल बातें करना भर नहीं होता. ज्यादातर ऐसी बातें बोलने वाले के खिलाफ ही जाती हैं, पनौती से लेकर मोदी के परिवार की बात कर मजाक उड़ाने का रिस्पॉन्स लोग देख ही रहे हैं.
सटीक रणनीति के साथ, सही समय पर सही राजनीतिक चाल चलना जरूरी होता है, और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में, ये जानना और समझना भी जरूरी होता है कि कहां चुप रहना है, और कहां बोलना है - लेकिन सब के सब ऐसे भागे जा रहे हैं जैसे रेस पूरी करनी हो.
अगर ममता बनर्जी भी INDIA ब्लॉक में वैसे ही साथ होतीं जैसे अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव डटे हुए हैं, तो मामला बिलकुल अलग होता - मुश्किल ये है कि कांग्रेस नेतृत्व को न तो नीतीश कुमार की बात समझ में आई, न ही ममता बनर्जी की.
बावजूद ऐसे सभी नुकसान के INDIA ब्लॉक के लिए सबसे बड़ी बात है कि न नीतीश कुमार साथ है, न ही ममता बनर्जी साथ हैं, लेकिन उसका अस्तित्व खत्म नहीं हुआ है - और बीजेपी चाह कर भी विपक्षी गठबंधन को उससे ज्यादा कमजोर नहीं कर सकी, जितना वो अपनी गलतियों के चलते हो गया.
2. कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सपोर्ट सिस्टम है INDIA ब्लॉक
कांग्रेस की हालत तो पहले से ही अकेले चने की तरह हो चुकी है. अकेला चना भांड नहीं फोड़ पाता. कांग्रेस अकेले करती भी तो क्या कर पाती. जब कांग्रेस के सबसे नेता की कुव्वत अपने दम पर चुनाव जिताने न रह गई हो, और न ही कोई स्पष्ट उम्मीद दिखाई पड़ रही हो - INDIA ब्लॉक लोकसभा चुनाव 2024 में बहुत बड़ा संबल बना है.
अगर राहुल गांधी के पास अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, एमके स्टालिन और लेफ्ट नेताओं का सपोर्ट नहीं होता, तो कहां तक और क्या हासिल कर पाते. राहुल गांधी के पास बड़ा मौका था, और वो चाहते तो INDIA ब्लॉक का बहुत ज्यादा फायदा उठा सकते थे, लेकिन हो सकता है उनका मकसद कुछ और हो. किसी और बात का इंतजार हो.
3. केजरीवाल और अखिलेश के लिए INDIA ब्लॉक की भूमिका
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ही नहीं, यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी बड़े ही मुश्किल संघर्ष के दौर से गुजर रहे हैं. निश्चित तौर पर कांग्रेस भी उनके साथ होने से खुद को यूपी और दिल्ली दोनों जगह बेहतर स्थिति में पा रही हो, लेकिन दोनों तरफ से थोड़ा और बड़ा दिल दिखाया गया होता तो और अच्छे नतीजों की संभावना बन रही होती.
जो कांग्रेस रायबरेली और अमेठी लोकसभा सीट जीतने के लिए जूझ रही हो, उसके हिस्से में वाराणसी की सीट देना और उसकी बलिया की डिमांड को नजरअंदाज करना कहां तक उचित था, लेकिन अखिलेश यादव ऐसा नहीं कर सके. जयंत चौधरी का साथ छूट जाने के बाद तो ये सब और भी ध्यान से देखना चाहिये था. बलिया की ही बात करें तो कांग्रेस वहां अजय राय को उम्मीदवार बनाना चाहती थी, जो फिलहाल तीसरी बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं. ये ठीक है कि अखिलेश यादव को सनातन पांडेय पर इसलिए भरोसा हुआ होगा क्योंकि पिछली बार वो 15 हजार वोटों से पिछड़ गये थे, लेकिन अगर वहां अजय राय होते तो सनातन पांडेय के मुकाबले मजबूत टक्कर दे सकते थे. बलिया तो एक उदाहरण भर है, ऐसी और भी सीटें हैं.
4. INDIA ब्लॉक ने तीसरा मोर्चा तो नहीं ही बनने दिया
INDIA ब्लॉक के अस्तित्व में आने और बने रहने का एक फायदा तो हुआ ही - कोई तीसरा मोर्चा नहीं खड़ा हो सका.
विपक्षी खेमे की शुरू से ही ऐसी कोशिश रही की बीजेपी के सामने एक ही फोरम हो. विपक्ष का एक ही मोर्चा केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी को चैलेंज करे - और हुआ तो आखिरकार ऐसा ही.
बीच में तेलंगाना के मुख्यमंत्री रहे केसीआर यानी के. चंद्रशेखर राव की तरफ से एक अलग मोर्चा खड़ा करने की कोशिश भी हुई थी, लेकिन संभव नहीं हो पाया. केसीआर ने अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल और पी. विजयन तक को जोड़ लिया था, लेकिन वो कुछ बैठकों, मुलाकातों और एक रैली से आगे नहीं बढ़ पाये.
केसीआर के सामने विधानसभा चुनाव की भी चुनौती थी. केसीआर ने पार्टी का नाम भी टीआरएस से बदल कर बीआरएस कर लिया था, लेकिन कोई उपाय काम न आ सका - हो सकता है केसीआर ने तीसरे मोर्चे की कोशिश भी सत्ता में अपनी वापसी के लिए ही की हो, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के लिए तीसरे मोर्चे का न बनना फायदेमंद ही रहा.
देखा जाये, तो अगर INDIA ब्लॉक नहीं होता तो बीजेपी के सामने पूरी तरह बिखरा हुआ विपक्ष होता - और अगर ऐसा होता तो सिर्फ कल्पना की जा सकती है, क्या होता?
5. INDIA ब्लॉक की मौजूदा स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है?
फर्ज कीजिये INDIA ब्लॉक नहीं बना होता तो क्या होता? कांग्रेस का क्या होता?
अकेले दम पर कांग्रेस कहां तक और बीजेपी से कितना लड़ पाती? 2023 के विधानसभा चुनाव INDIA ब्लॉक के प्रति विपक्षी दलों की गंभीरता में कमी का नतीजा क्या हुआ, सबसे बड़ा उदाहरण है.
लेकिन तब क्या होता जब INDIA ब्लॉक में ही नीतीश कुमार भी होते, और ममता बनर्जी भी सक्रिय रूप से जुड़ी होतीं - और पहले से ही किसी को INDIA ब्लॉक का संयोजक और INDIA ब्लॉक के प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिया गया होता?
क्या INDIA ब्लॉक के शुरुआती स्वरूप में न बने के लिए नीतीश कुमार जिम्मेदार हैं? क्या INDIA ब्लॉक के शुरू के मुकाबले बाद में कमजोर होने के लिए ममता बनर्जी जिम्मेदार हैं?
या फिर INDIA ब्लॉक की मौजूदा स्थिति के लिए सिर्फ कांग्रेस नेतृत्व, बल्कि कहें कि राहुल गांधी जिम्मेदार हैं?
ऐसे सारे ही सवालों के जवाब 4 जून को विस्तार से मिल जाएंगे - और आगे से विपक्ष में कोई भी, सभी के लिए छोटी छोटी बातें भी बहुत बड़ी नसीहत होंगी.