असम की महिलाएं पिछले दशक में सत्ता की दशा और दिशा भी तय कर रही हैं. सूबे के 2011 के विधानसभा चुनाव में महिलाएं भले ही पुरुषों से वोटिंग में पीछे रही हों, लेकिन एक दशक के बाद आगे निकल गई हैं. इससे साफ है कि महिला वोटर असम में साइलेंट नहीं बल्कि निर्णायक रोल भी अदा कर रही है. इस तरह महिलाएं सत्ता की धुरी बन रही है, जिन्हें साधे रखने के लिए हर राजनीति पार्टी सियासी दांव चल रही हैं.
2011 के विधानसभा चुनाव के वोटिंग पैटर्न देखें तो 126 सीटों में से 103 सीटों पर महिलाएं मतदान में पुरुषों से पीछे रही थी, लेकिन एक दशक के बाद महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है. महिलाएं हर 10 में से लगभग 6 सीटों पर पुरुषों से आगे रहीं. इस तरह से 60 फीसदी सीटों पर हार जीत का रोल महिला वोटर अदा कर रही है. सवाल यह है कि क्या चाय बागान वाले इलाके में मतदान में आई भारी गिरावट इस बढ़त को खत्म कर सकती है.
असम में 9 अप्रैल को चुनाव है. इंडिया टुडे की डेटा इंटेलिजेंस यूनिट द्वारा तीन विधानसभा चुनावों 2011, 2016 और 2021 के विश्लेषण से पता चलता है कि इस राज्य में वोटिंग के पैटर्न को महिलाओं ने चुपचाप, लेकिन निर्णायक रूप से, पूरी तरह से बदल दिया है.
असम में महिला मतदाताओं का दबदबा
2011 में असम की 126 विधानसभा सीटों में से 103 सीटों पर महिलाओं की वोटिंग पुरुषों के मुकाबले पीछे रही, जिसमें औसत अंतर लगभग दो प्रतिशत अंक का था. 2016 तक, यह अंतर न केवल खत्म हुआ, बल्कि पलट गया. महिलाएं 73 सीटों पर पुरुषों से आगे निकल गईं, जिसमें उन्होंने औसतन 0.35 अंकों की बढ़त दर्ज की. 2021 में यह बढ़त बरकरार रही, 72 सीटों पर महिलाओं का वर्चस्व रहा, जहां औसत अंतर 0.45 अंक था.
यह बदलाव मात्र एक चुनाव चक्र में हुआ और तब से यह पलटा नहीं है.
मुख्य निष्कर्ष
जेंडर फ्लिप
2016 का चुनाव एक निर्णायक मोड़ था. पूरे असम में 2011 से 2016 के बीच महिलाओं की औसत मतदान दर में जबरदस्त उछाल आया. यह उछाल इतना काफ़ी था कि इसने लगभग दो अंकों के औसत घाटे को पाट दिया और पूरे राज्य में बढ़त बना ली. इसके बाद हुए चुनाव में भी यह बढ़त बरकरार रही.
2011 से अब तक, 19 निर्वाचन क्षेत्रों में हर चुनाव में महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले ज़्यादा वोट डाले हैं. नगांव जिले के जमुनामुख में यह अंतर सबसे ज़्यादा था. 2021 में महिलाओं ने 7.4 प्रतिशत अंकों की बढ़त बनाई, जो 2011 में 0.6 अंक थी. बोंगाईगांव के अभयपुरी उत्तर में 2021 में महिलाओं की बढ़त का अंतर 3.9 अंक रहा. धेमाजी में यह अंतर 4.6 अंक था.
ये शहरी सीटें नहीं हैं. नगांव, बोंगाईगांव और धेमाजी मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्र हैं, जो दर्शाता है कि यह बदलाव केवल शहरों तक सीमित नहीं है.

कहां मतदान में सबसे भारी गिरावट आई
2021 का चुनाव 2016 के उछाल को बरकरार नहीं रख सका. पूरे राज्य में मतदान 84.7 प्रतिशत से गिरकर 82.4 प्रतिशत पर आ गया, और इस गिरावट का भौगोलिक पैटर्न काफी विशिष्ट है.
ऊपरी असम में सबसे तीखी गिरावट देखी गई. डिब्रूगढ़ जिले की सीटों पर औसतन 5.5 अंकों की गिरावट दर्ज की गई. जोरहाट में यह गिरावट 5.0 अंक और तिनसुकिया में 4.8 अंक रही. ये ब्रह्मपुत्र घाटी के चाय बागान बेल्ट वाले जिले हैं, जो ऐतिहासिक रूप से उच्च मतदान वाले क्षेत्र रहे हैं जहां 2016 के आंकड़े असाधारण थे.
व्यक्तिगत निर्वाचन क्षेत्रों में गिरावट और भी अधिक थी. डिब्रूगढ़ के चाबुआ में 7.4 अंकों की गिरावट आई. तिनसुकिया के डूमडूमा में 6.3 अंक और जोरहाट के मरियानी में 6.1 अंकों की कमी दर्ज की गई.
डेटा इसकी वजह नहीं बताता कि ऐसा क्यों है. लेकिन ऊपरी असम के तीन ऐसे ज़िले, जहां चाय के बागान बहुत ज़्यादा हैं, जहां प्रवासी मजदूरों और मौसमी आवाजाही का असर वोटर लिस्ट पर पड़ता है, राज्य भर में हुई इस गिरावट का सबसे बड़ा हिस्सा हैं. यह एक पैटर्न है, न कि महज शोर.

जिन ज़िलों में रुझान उल्टा रहा
असम की दक्षिणी सीमा पर बराक घाटी में स्थित हैलाकांडी ज़िले में रुझान बाकी जगहों से अलग रहा. 2016 से 2021 के बीच इस ज़िले का औसत 4.1 पॉइंट बढ़ गया. इस ज़िले के एक विधानसभा क्षेत्र, कटलीचेरा में 7.1 पॉइंट की बढ़त दर्ज की गई, जो पूरे राज्य में किसी भी सीट पर हुई सबसे बड़ी बढ़त थी.
नॉर्थ कछार हिल्स की कहानी बिल्कुल अलग है. 2011 में यहां मतदान का प्रतिशत सिर्फ 51.3 था, जो पूरे राज्य में सबसे कम था और असम के औसत से 20 पॉइंट से भी ज़्यादा नीचे था. 2016 तक यह बढ़कर 81.1 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो 30 पॉइंट की एक बड़ी छलांग थी. 2021 में भी यह 81.3 प्रतिशत पर ही बना रहा.

सबसे ज़्यादा और सबसे कम
2021 के चुनाव में धुबरी जिला वोट देने में सबसे आगे रहा, जहां 91.4% मतदान हुआ. दिलचस्प बात यह है कि 2016 में भी यहां ठीक इतना ही (91.4%) मतदान हुआ था, यानी 5 सालों में इसमें कोई बदलाव नहीं आया. इसके बाद गोलपारा का नंबर आता है, जहां 89.8% लोगों ने वोट डाले."
दूसरी ओर, करीमगंज का औसत 78.3 प्रतिशत और कछार का 79.9 प्रतिशत रहा. ये दोनों ही बराक घाटी में स्थित हैं. वही क्षेत्र जहां हैलाकांडी (जो इसी घाटी में है) ने राज्य में सबसे बड़ी बढ़त दर्ज की.
एक महत्वपूर्ण चेतावनी
2026 के लिए निर्वाचन क्षेत्र-स्तर के नतीजे निकालने से पहले, एक बात साफ-साफ कह देनी चाहिए. भारत के परिसीमन आयोग ने सितंबर 2023 में असम की विधानसभा सीमाओं को फिर से तय किया था.
कुल सीटों की संख्या 126 ही है, लेकिन कई निर्वाचन क्षेत्रों के नाम, नंबर और सीमाएं बदल गई हैं, कुछ तो काफी ज़्यादा. 2021 में 'चाबुआ' नाम की जो सीट थी, हो सकता है कि 2026 में उसी नाम की सीट वैसी न रहे. हो सकता है कि मतदाताओं को किसी दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में भेज दिया गया हो.
इसका मतलब है कि इस रिपोर्ट में निर्वाचन क्षेत्र-स्तर पर जो तुलनाएं की गई हैं जैसे कि चाबुआ में 7.4 अंकों की गिरावट आई, या जमुनामुख में महिलाओं ने 7.4 अंकों की बढ़त बनाई. वे 2021 के प्रदर्शन को पुरानी सीमाओं के आधार पर बताती हैं. पुरानी और नई परिसीमन सीमाओं के बीच हर सीट का अलग-अलग मिलान किए बिना, इन नतीजों को सीधे तौर पर 2026 के चुनावों पर लागू नहीं किया जा सकता.
ज़िला-स्तर के नतीजों पर इस समस्या का असर कम पड़ता है. जिलों में कोई बदलाव नहीं हुआ है. डिब्रूगढ़ में मतदान में आई गिरावट, हैलाकांडी में हुई बढ़त, और धुबरी में लगातार ऊंचे आंकड़े ये सभी असली भौगोलिक रुझान हैं जो परिसीमन के बाद भी बने रहने चाहिए, भले ही उनके अंदर के सटीक निर्वाचन क्षेत्र बदल गए हों.

लिंग-आधारित रुझान भी कुल मिलाकर इसी तरह बने रहने की संभावना है. पूरे राज्य में महिलाओं का मतदान पुरुषों से ज़्यादा होता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं कहां खींची गई हैं.
2026 में किन बातों पर नजर
डेटा से मिले तीन रुझान 9 अप्रैल के लिहाज से अहम हैं. पहला, लिंग-आधारित बढ़त असली है और लगातार बनी हुई है. पिछले दो चुनावों से पूरे राज्य में महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है. जिन सीटों पर यह अंतर सबसे ज़्यादा है जैसे जमुनामुख, धेमाजी, सोतिया, अभयपुरी उत्तर वे अलग-अलग ज़िलों और अलग-अलग पार्टियों के प्रभाव वाले क्षेत्रों में फैली हुई हैं. इस वजह से इस रुझान को महज़ कोई स्थानीय विसंगति मानकर नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो जाता है.
दूसरा, अगर ऊपरी असम में 2021 में मतदान में आई गिरावट कोई ढांचागत समस्या न होकर सिर्फ़ उस चुनाव तक सीमित थी, तो 2016 के स्तर तक वापस पहुंचने से कुल मतदान में काफ़ी बढ़ोतरी हो सकती है. इस क्षेत्र की चाय बागान वाली सीटें काफ़ी प्रतिस्पर्धी होती हैं, और मतदान में पांच अंकों के उतार-चढ़ाव का चुनावी नतीजों पर सीधा असर पड़ता है.
तीसरा, बराक घाटी के भीतर के अलग-अलग रुझानों की कोई साफ़ वजह समझ नहीं आती. जहां हैलाकांडी ने प्रगति की, वहीं करीमगंज और कछार स्थिर बने रहे. 2026 में यह अंतर बढ़ेगा या कम होगा, यह शायद ज़मीनी स्तर पर होने वाली उस लामबंदी पर निर्भर करेगा, जिसे कोई भी ऐतिहासिक डेटासेट दर्ज नहीं करता.
नोट: मतदान की गणना पंजीकृत मतदाता सूचियों के आधार पर की गई है. इन सूचियों की गुणवत्ता अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों और वर्षों में भिन्न हो सकती है. कुछ निर्वाचन क्षेत्रों के लिए 'जेंडर' संबंधी आंकड़े उन जिला-स्तरीय डेटा से लिए गए हैं जहां निर्वाचन क्षेत्र-वार विस्तृत जानकारी अधूरी थी.