scorecardresearch
 

डिप्लोमेसी की जगह दबंगई... आखिर अमेरिका दुनिया को किस राह पर ले जा रहा?

दुनियाभर में संयुक्त राष्ट्र से लेकर नीति निर्धारण तक की ठेकेदारी जिस देश ने दशकों से अपने पास रखी है, वही देश मानवाधिकारों से लेकर सत्ताओं तक सबसे ज्यादा दख़ल और दादागिरी दिखाता रहा है. अमेरिका के फैसले एक गुंडे की कचहरी जैसे क्यों लगते हैं?

Advertisement
X
परमाणु हथियारों के मामले में अमेरिका सबसे मजबूत है और इसका इस्तेमाल करने वाला अकेला देश भी है. (Photo: Pixabay)
परमाणु हथियारों के मामले में अमेरिका सबसे मजबूत है और इसका इस्तेमाल करने वाला अकेला देश भी है. (Photo: Pixabay)

अमेरिका दुनिया के नवराष्ट्रों में है. उसके पास आधुनिक इतिहास के अलावा बताने या गर्व करने के लिए कुछ है नहीं. जो था, उसे उन्होंने सुनियोजित तरीके से मिटाया है. पूंजीवाद का मक्का बनकर अमेरिका ने दो चीज़ों को ही नियंत्रित करने पर सदी से ज्यादा समय लगाया. एक पैसा और दूसरी ताक़त. अमेरिका दुनियाभर की पूंजी को नियंत्रित करता है. विश्व व्यापार डॉलर पर आश्रित है. दूसरी ओर सेना, हथियार और परमाणु बमों के मामले में अमेरिका सबसे मज़बूत है. परमाणु हथियार तो इतने हैं कि पूरी धरती को कितनी ही बार नष्ट किया जा सकता है. परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का कलंक भी केवल अमेरिका के माथे पर ही लगा है.

ताक़त और पैसे के दम पर अमेरिका ने दुनिया को नियंत्रित करने का दम और आदत दोनों हासिल कर ली हैं. अमेरिका की सच्चाई दरअसल एक ऐसे दबंग गुंडे की कहानी जैसी है जो अपने हुक्म से अपना इलाका चलाता है. वहां पुलिस नहीं चलती, विधान नहीं चलता. उसको जो ठीक लगे वो सही, उसको जो ग़लत लगे वो ग़लत. वो जिसे चाहे काम करने देगा, जिसे चाहे उसे उखाड़ फेंकेगा. न्याय की परिभाषा किसी किताब से नहीं, उसकी सुविधा और सोच से तय होगी. कितने भी अन्यायपूर्ण कृत्य को वो न्यायसंगत ठहरा सकता है. जापान, वियतनाम, अफ़ग़ानिस्तान, रूस, इराक़, ईरान, लीबिया, लातिन अमरीकी देश जैसे कितने ही नाम हैं जहां अमेरिका ने सत्ता और सरकारों में दख़ल दिया और उन्हें हिलाकर रख दिया.

अमेरिका दुनियाभर में मानवाधिकारों की, लोकतंत्र की और न्याय की बात करता है. लेकिन दुनियाभर में कितने ही युद्ध अमेरिका की सोच और दख़ल का नतीजा रहे हैं. मानवाधिकारों की धज्जियां इन युद्धों में उड़ाई जाती रही. लोकतंत्र की वो परिभाषा लादी जाती रही जो अमेरिका के अनुसार सही ठहराई गई. अगर दुनिया के कुछ देशों ने अमेरिका के आगे समर्पण से मना किया तो उन्हें ध्वस्त कर दिया गया. उनपर हमले हुए और उनकी सरकारों को, शासकों को जाना पड़ा. तानाशाही के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वाले अमेरिका को तानाशाही भी वहीं दिखाई देती रही जहां उसके अपने हितों को कोई नुक़सान पहुंचा. और अपने हितों को प्रभावी रखने के लिए तानाशाहों को मारने और खत्म करने के युद्धों में अमेरिका प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से शामिल रहा.

Advertisement

यह भी पढ़ें: US के B-2 बॉम्बर की एंट्री, झुकने को तैयार नहीं ईरान... मिडिल ईस्ट में जंग के दूसरे दिन क्या-क्या हुआ

यह बात सही है कि दुनिया में लोकतंत्र कई देशों में है नहीं. लेकिन किसी भी देश में लोकतंत्र के लिए माँग करना, उसकी लड़ाई करना और उसे हासिल करना उसी देश के लोगों का अधिकार है, इसमें किसी भी दूसरे देश के दख़ल को किसी भी तरह से जायज़ नहीं ठहराया जा सकता. ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि लोकतंत्र एक आधुनिक अवधारणा है और कई देशों में इसे प्रभावी ढंग से लाया नहीं जा सका है. उसके पीछे पारंपरिक, सांप्रदायिक और सांस्कृतिक कारण हैं. लेकिन ये कारण और इसका निवारण उस देश के लोगों का ही अधिकार है और उसमें किसी भी बाहरी ताक़त का दख़ल उचित नहीं ठहराया जा सकता.

आज दुनिया में एक वैश्विक व्यवस्था को सुनिश्चित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र और ऐसी कितनी ही संस्थाएं हैं. लेकिन ये संस्थाएं भी बिना रीढ़ और दाँत के मंच भर ही साबित हुए हैं. यहां के निर्णय या तो अमेरिकी हितों के अनुरूप रहे हैं और या फिर इन निर्णयों की परवाह अमेरिका ने की ही नहीं है. कितने ही ऐसे सवाल हैं जहां परमाणु कार्यक्रम, जलवायु परिवर्तन, कृषि, मानवाधिकार, तेल, हथियार, व्यापार, लोकतंत्र और मुद्रा को नियंत्रित करने का मानक केवल अमेरिकी हितों के अनुरूप रहा है. और जहां अमेरिकी जवाबदेही की बारी आई है, अमेरिका ने उसे बहुत आसानी से ठंडे बस्ते में डाल दिया है.

Advertisement

यही बात ईरान के लिए भी है और वेनेजुएला के लिए भी. दोनों ही देशों में जिस तरह की सैनिक कार्रवाई राष्ट्रपति ट्रंप के इशारे पर हुई है, वो दादागिरी की श्रेणी में आती है. लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करने वाला अमेरिका किसी भी तरह से इसे न्यायोचित नहीं ठहरा सकता. खामेनेई से ईरान की जनता खासी निराश और नाराज़ थी. लेकिन खामेनेई को हटाना, ईरान को बदलना और वहां लोकतंत्र को स्थापित करना वहां की जनता की ज़िम्मेदारी है. अमेरिका उनकी आवाज़ के प्रति सहानुभूति रख सकता है, वैश्विक मंचों पर उसकी चर्चा कर सकता है, अपनी राय और विरोध व्यक्त कर सकता है लेकिन इस तरह का हमला और हत्याओं को क़तई जायज़ नहीं ठहरा सकता.

अमेरिका की दूसरी आपत्ति ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर है. अमेरिका का आरोप है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने में लगा है. ये परमाणु हथियार आतंकवादियों के हाथ में भी जा सकते हैं. इससे यूरोप और अमेरिका को खतरा है और इसलिए इसे रोकना ज़रूरी है. लेकिन दुनिया में यह कैसे तय होगा कि कौन परमाणु परीक्षण करेगा और कौन नहीं. किसे परमाणु हथियार बनाने का अधिकार है और किसे नहीं. अमेरिका के पास दुनिया के सबसे ज्यादा परमाणु हथियार हैं. दुनिया में परमाणु हथियारों का प्रयोग करने वाला अकेला देश अमेरिका ही है. हिरोशिमा और नागासाकी का विध्वंस आज भी मानवता पर कलंक की तरह ही याद किया जाता है. फिर इसकी क्या गारंटी है कि अमेरिका परमाणु हथियारों का ग़लत इस्तेमाल कभी नहीं करेगा. उससे बड़ा सवाल यह है कि क्या परमाणु हथियारों का कभी सही इस्तेमाल भी हो सकता है या ऐसा कोई शब्द भी सोचा जा सकता है जो परमाणु हथियारों के अस्तित्व को सही बताए.

Advertisement

यह भी पढ़ें: कराची में US दूतावास में घुसे पाकिस्तानी प्रोटेस्टर, अमेरिकी सैनिकों की फायरिंग में 12 की मौत

पोखरण के परमाणु परीक्षण के बाद इसी अमेरिका ने भारत पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाए. भारत की अर्थव्यवस्था और लोगों को कितनी ही दिक्कतों से रूबरू होना पड़ा. दख़ल और दादागिरी की कहानी केवल ईरान की नहीं है, भारत भी इसका भुक्तभोगी रहा है. और भारत ने भी परमाणु परीक्षण करते हुए अमेरिकी दबंगई को नहीं, अपनी संप्रभुता को तरजीह दी. अमेरिका आज भी भारत के परमाणु हथियारों के पक्ष में नहीं. तो क्या भारत एक आतंकवादी देश है और उसपर भरोसा नहीं किया जा सकता कि वो परमाणु हथियारों का कब और कैसे प्रयोग करेगा? अगर ये सवाल भारत के लिए है तो अमेरिका के लिए ख़ुद क्यों नहीं. और अगर यह ग़लत है तो अमेरिका दूसरों पर अपनी मर्जी और हित कैसे लाद सकता है.

सच यह है कि अमेरिका की नज़र में उनका हित ही दुनिया का हित है. विश्व कल्याण का ढोंग अमेरिका के हितों से शुरू होता है और अमेरिकन हितों पर ही खत्म. वो दुनिया में सबकुछ अपने पैरों के नीचे चाहते हैं. वो दुनिया में किसी और को बस उस हद तक सर उठाने देना चाहते हैं जहां तक उनकी सुरक्षा, व्यापार और मंशा पर कोई फर्क न पड़ रहा हो. यह ग़लत है और इससे दुनियाभर में न तो आतंकवाद से निपटा जा सकता है और न लोकतंत्र लाया जा सकता है. बदले की भावना, युद्ध की गुंजाइशें, नफ़रत और तानाशाही जैसे शब्द इसी परिस्थिति के कचरे पर पनपने लगते है. इनसे दुनिया को खतरा घटता नहीं, और बढ़ता है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement