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PDA पर्याप्त नहीं... अखिलेश यादव का ब्राह्मणों पर फोकस क्यों, क्या मायावती जैसी करिश्मा संभव है?

अखिलेश यादव 2024 के आम चुनाव में PDA के सफल प्रयोग के बावजूद ब्राह्मण समुदाय का वोट पाने की कोशिश में लग गए हैं. 2007 में मायावती की सोशल इंजीनियरिंग के प्रयोग की आज भी मिसाल दी जाती है, लेकिन बाद में बीएसपी भी वैसी सफलता नहीं दोहरा पाई - अखिलेश यादव कुछ अलग करेंगे क्या?

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समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव और बीएसपी प्रमुख मायावती. (Photo: PTI)
समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव और बीएसपी प्रमुख मायावती. (Photo: PTI)

अखिलेश यादव ने PDA फॉर्मूले के दम पर 2024 के आम चुनाव में समाजवादी पार्टी को सबसे ज्यादा सीटें दिलाईं. बीजेपी को 2014 और 2019 के मुकाबले करीब आधी सीटों पर समेट दिया था. अयोध्या (फैजाबाद लोकसभा सीट) में बीजेपी को शिकस्त दे डाली थी - लेकिन, अब लगता है PDA (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) नाकाफी लगने लगा है. 

समाजवादी पार्टी फिर से ब्राह्मण वोट साधने की कोशिश में जुट गई है. 2022 के चुनाव से पहले भी ऐसी कोशिशें हुई थीं, और ब्राह्मण वोटर को आकर्षित करने के लिए काफी बयानबाजी हुई थी. अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी के ब्राह्मण नेताओं की एक कमेटी भी बनाई थी. 

ब्राह्मण वोटर को लेकर अब तक सबसे सफल प्रयोग मायावती के नाम रहा है. दलित और ब्राह्मण वोटों की सोशल इंजीनियरिंग करके मायावती ने बिना किसी गठबंधन के 2007 में बीएसपी की सरकार बनाई, और पूरे पांच साल चलाई भी. 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भी मायावती ने बीएसपी के ब्राह्मण चेहरे सतीश चंद्र मिश्रा को आगे करके जगह जगह ब्राह्मण सम्मेलन भी कराया था, लेकिन नाम प्रबुद्ध सम्मेलन दिया गया था. 

अब अगर अखिलेश यादव भी वैसी ही सोशल इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे हैं, तो बड़ा सवाल है कि मायावती जैसी कामयाबी फिर संभव है क्या?

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समाजवादी पार्टी के ब्राह्मण चेहरे  

समाजवादी पार्टी अगस्त में अपने जमाने में दिग्गज नेता रहे जनेश्वर मिश्र की जयंती के मौके पर बड़े पैमाने पर कार्यक्रम की तैयारी कर रही है. समाजवादी पार्टी को उम्मीद है कि ऐसा करने से ब्राह्मण वोटर के बीच एक बड़ा संदेश दिया जा सकता है. 5 अगस्त को जनेश्वर मिश्र की जयंती होती है. 

बलिया के रहने वाले जनेश्वर मिश्र के नाम पर ब्राह्मण वोटर को जोड़ने के लिए बलिया के ही लोकसभा सांसद सनातन पांडेय को आगे किया गया है. ब्राह्मण समुदाय को समाजवादी पार्टी के पक्ष में करने के लिए सनातन पांडेय लखनऊ में जनेश्वर मिश्र पार्क के विकास और वहां जनेश्वर मिश्र की प्रतिमा स्थापित किए जाने की दुहाई दे रहे हैं. सनातन पांडेय समझाते हैं, ये कदम वरिष्ठ समाजवादी नेता के प्रति पार्टी के सम्मान को दर्शाते हैं.

समाजवादी पार्टी सांसद सनातन पांडेय का कहना है, पार्टी ने ऐतिहासिक रूप से समाजवादी आंदोलन में ब्राह्मण समुदाय को महत्वपूर्ण स्थान दिया है, खासकर पूर्व केंद्रीय मंत्री जनेश्वर मिश्र जैसे नेताओं के माध्यम से. सनातन पांडेय का दावा है कि समाजवादी पार्टी की सरकारों के दौरान ब्राह्मण नेताओं को सरकार, संगठन और प्रशासन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व हासिल था. 

2022 के चुनाव से पहले भी अखिलेश यादव ने ब्राह्मण समुदाय के बीच पैठ बनाने के लिए समाजवादी पार्टी के ब्राह्मण नेताओं की एक कमेटी बनाई थी. उस कमेटी में भी सनातन पांडेय को रखा गया था. सनातन पांडेय के अलावा विधानसभा में विपक्ष के नेता माता प्रसाद पांडेय, अभिषेक मिश्र और संतोष पांडेय को शामिल किया गया था. कमेटी के एक सदस्य मनोज पांडेय भी थे, जो बाद में बीजेप में चले गए. 

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समाजवादी पार्टी में सनातन पांडेय के अलावा दो और प्रमुख चेहरे नजर आते हैं. माता प्रसाद पांडेय और गोरखपुर से आने वाले विनय शंकर तिवारी. विनय शंकर तिवारी यूपी के बाहुबली नेता रहे हरिशंकर तिवारी के बेटे हैं. विनय शंकर तिवारी को लेकर अखिलेश यादव की एक सोशल मीडिया पोस्ट काफी चर्चित हुई थी, कुछ लोगों को ‘हाता नहीं भाता’.

उत्तर प्रदेश विधानसभा के स्पीकर रहे माता प्रसाद पांडेय को अखिलेश यादव ने कन्नौज से लोकसभा सांसद बन जाने के बाद बनाया था. जाहिर है, माता प्रसाद पांडेय को आगे बढ़ाते वक्त अखिलेश यादव की नजर आने वाले विधानसभा चुनाव पर ही होगी. माता प्रसाद पांडेय कभी समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के विश्वस्त नेताओं में शामिल थे. और, ऐसे कम ही नेता हैं जो अखिलेश यादव के भरोसेमंद बने हुए हैं, माता प्रसाद पांडेय उदाहरण हैं. 

ब्राह्मणों पर मेहरबानी क्यों?

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय की कुल आबादी का करीब 10 से 15 फीसदी हिस्सा होने का अनुमान है. माना यह भी जाता है कि यूपी की 403 में से 100 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण समुदाय चुनाव नतीजों पर असर डालने की क्षमता रखता है. 

2022 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले भी ब्राह्मण वोट बैंक पर सबकी नजर टिकी हुई थी. असल में, 2020 में कानपुर के गैंगस्टर विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद ब्राह्मण समुदाय के राजनीतिक रुख को लेकर खूब बातें हो रही थीं. कुछ दिनों तक ऐसे भी प्रोजेक्ट करने की कोशिश हुई कि विकास दुबे की गाड़ी पलट जाने से हुई मौत से ब्राह्मण समुदाय में नाराजगी है. लिहाजा ब्राह्मण वोटर को अपनी तरफ खींचने में राजनीतिक दल जुटे हुए थे. 

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बीएसपी की तरफ से यूपी में जगह-जगह ब्राह्मणों के नाम पर प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन कराए गए. शुरुआत तो सतीश चंद्र मिश्रा ने की, लेकिन लखनऊ में हुए आखिरी सम्मेलन में मायावती भी मंच पर आईं. और, ऐसे नजारे देखे गए जो बीएसपी के सम्मेलनों में कभी नहीं देखने को मिले थे. लेकिन, सारी कवायद धरी की धरी रह गई - और मायावती को महज एक सीट पर जीत मिल पाई. 

जब ब्राह्मण समुदाय को लुभाने के लिए खूब बयानबाजी चल रही थी, तो परशुराम की मूर्ति लगाने की भी घोषणाएं हुईं. तब तो समाजवादी पार्टी ने राज्य के हर जिले में परशुराम की मूर्ति लगाने का भी ऐलान किया था. अब नए सिरे से अखिलेश यादव की ब्राह्मण वोट पर नजर टिकी हुई लग रही है. 

क्या PDA पर्याप्त नहीं है

2024 के आम चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने PDA फॉर्मूला तैयार किया था. PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है, PDA के A को अलग-अलग नाम से परिभाषित किया जा रहा है. अब तो यह भी बताने की कोशिश होने लगी है कि PDA में A का मतलब अगड़ा यानी सवर्ण भी होता है. और, सवर्ण से आशय ब्राह्मण बताने की कोशिश हो रही है. 

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लोकसभा चुनाव के बाद से ही अखिलेश यादव PDA की जोर-शोर से पैरवी कर रहे हैं. PDA के दम पर बीजेपी को यूपी की सत्ता से बेदखल करने का दावा कर रहे हैं - ऐसे में सवाल उठता है कि PDA के बाद समाजवादी पार्टी के पास ब्राह्मण वोटर के लिए बचता क्या है?

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने ब्राह्मणों पर बड़ी ही अभद्र टिप्पणी की थी. बीजेपी ही नहीं, यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय ने भी राजकुमार भाटी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया जताई थी. अजय राय ने अखिलेश यादव से राजकुमार भाटी को बर्खास्त तक करने की मांग की थी. लेकिन, अखिलेश यादव ने चेतावनी देकर छोड़ दी थी.

बेशक जब भी यूपी में सोशल इंजीनियरिंग की बात होती है, मायावती के 2007 के प्रयोग की मिसाल दी जाती है. लेकिन, यह भी सच है कि मायावती उसे कभी दोहरा नहीं पाईं - क्या अखिलेश यादव के लिए वैसे नतीजे ला पाना संभव हो पाएगा?

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