अखिलेश यादव ने जन विश्वास रैली में भले ही यूपी और बिहार की 120 सीटों पर बीजेपी को शिकस्त देने के लिए हुंकार भरी हो, लेकिन हकीकत तो उनको भी मालूम है ही - और जमीनी हकीकत से वाकिफ होकर जिस तरह वो यूपी में लोकसभा चुनाव 2024 की तैयारी कर रहे हैं, काफी संभावनाएं भी हैं.
तकनीकी रूप से तो यूपी की 80 और बिहार की 40 सीटों पर अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और तेजस्वी यादव की आरजेडी बीजेपी के खिलाफ मोर्चा संभाले हुए हैं - और राहुल गांधी की कांग्रेस इस लड़ाई में कॉमन पार्टनर है.
कांग्रेस का हाल तो कर्नाटक और तेलंगाना को छोड़ कर पूरे देश में एक जैसा ही है. उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण भारत में राहुल गांधी थोड़ा बेहतर फील कर रहे होंगे - लेकिन अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव तो बीजेपी के साथ मुकाबले में तकरीबन बराबर खड़े नजर आते हैं.
तेजस्वी यादव की ताजा स्थिति बिहार में अखिलेश यादव के मुकाबले ज्यादा अच्छी भी मानी जा सकती है, लेकिन 2019 के नतीजों के साये में देखें तो अखिलेश यादव का उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन काफी अच्छा रहा है. 2019 में समाजवादी पार्टी को यूपी में 5 सीटें मिली थीं, लेकिन राष्ट्रीय जनता दल का बिहार में खाता तक नहीं खुला था.
मुलायम परिवार के दबदबे वाली सीटें
2019 में भी समाजवादी पार्टी को 2014 की तरह 5 लोक सभा सीटें ही मिली थीं, लेकिन मुलायम सिंह यादव के परिवार के लिए सबसे बड़ा झटका था उनकी बड़ी बहू डिंपल यादव का कन्नौज सीट से हार जाना - जहां से पहली वार वो निर्विरोध चुने जाने के बाद लोक सभा पहुंची थीं.
बीते दोनों लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी के सांसदों के नंबर तो बराबर रहे हैं, लेकिन सीटें बदल गई हैं - और अब तो कुल जमा तीन ही रह गई हैं. आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव बीजेपी के हाथों समाजवादी पार्टी के हार जाने के बाद. बीजेपी की नजर तो 2014 से ही मुलायम सिंह यादव और गांधी परिवार की सीटों पर लगी थी, और 2019 में एक-एक विकेट चटका भी लिये थे. कन्नौज में डिंपल यादव की तरह अमेठी से राहुल गांधी भी चुनाव हार गये थे. अब तो रायबरेली को भी सोनिया गांधी अलविदा कह चुकी है.
मौजूदा हालात में अगर अखिलेश यादव परिवार का गढ़ मानी जाने वाली और उसके बाद 2019 की जीती हुई सीटों पर फोकस कर रहे हैं तो अच्छे रिजल्ट की संभावना तो है ही. वैसे भी कहते हैं तोप के लाइसेंस की कोशिश करने पर पिस्टल की बहुत हद तक गारंटी तो होती ही है.
कन्नौज सीट अखिलेश यादव और डिंपल यादव दोनों के लिए ही लकी साबित हुआ है. अखिलेश यादव और डिंपल यादव दोनों का पहला चुनाव मैदान कन्नौज ही रहा है - और 2012 के उपचुनाव में तो डिंपल यादव निर्विरोध ही लोक सभा पहुंच गई थीं.
2012 में जब अखिलेश यादव यूपी के मुख्यमंत्री बन गये तो कन्नौज लोकसभा सीट छोड़नी पड़ी थी, और डिंपल यादव को समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार बनाया गया. वैसे डिंपल यादव का ये दूसरा चुनाव था, क्योंकि पहला चुनाव हो हार गई थीं.
डिंपल यादव पहली बार 2009 में फिरोजाबाद उपचुनाव में उतरी थीं, लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार राज बब्बर से हार गईं. असल में 2009 में अखिलेश यादव कन्नौज और फिरोजाबाद दो सीटों से चुनाव लड़े, और दोनों जगह से जीत गये थे. बाद में फिरोजाबाद सीट छोड़ दी थी. और वैसे ही ही 1999 में मुलायम सिंह यादव भी संभल और कन्नौज से एक साथ चुनाव मैदान में थे, लेकिन बाद में कन्नौज सीट छोड़ दी थी, जहां से उपचुनाव जीत कर अखिलेश यादव पहली बार संसद पहुंचे थे.
मुलायम सिंह ने 2014 में भी दो सीटों से नामांकन दाखिल किया था, आजमगढ़ और मैनपुरी. लेकिन बाद में मैनपुरी सीट छोड़ दिये जहां से उपचुनाव जीत कर उनके परिवार के ही तेज प्रताप यादव संसद पहुंचे थे.
मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद उपचुनाव जीत कर डिंपल यादव मैनपुरी से सांसद हैं - और हाल फिलहाल एक जोरदार चर्चा है कि कन्नौज का किला बचाये रखने के लिए अखिलेश यादव खुद लोकसभा चुनाव के मैदान में उतर सकते हैं.
कन्नौज और मैनपुरी तो अखिलेश यादव के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण लोकसभा क्षेत्र हैं ही, बदायूं और फिरोजाबाद के साथ साथ आजमगढ़ पर भी जोर दिखाई पड़ रहा है. बदायूं में तो समाजवादी पार्टी उम्मीदवार भी बदल चुकी है - और इलाके में एक बार फिर से बदले जाने की सुगबुगाहट महसूस की जा रही है.
फिरोजाबाद सीट से अखिलेश यादव ने अक्षय यादव को फिर से मैदान में उतार दिया है. 2014 में सांसद रहे अक्षय यादव बीजेपी के डॉक्टर चंद्रसेन से हार गये थे. और वैसे ही आजमगढ़ सीट पर भी अखिलेश यादव का खास जोर नजर आ रहा है - शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली को समाजवादी पार्टी में लाये जाने के एकमात्र मकसद तो यही है.
हो सकता है, धर्मेंद्र यादव को अखिलेश यादव फिर से आजमगढ़ से चुनाव लड़ाने का मन बना रहे हों. पहले तो धर्मेंद्र यादव को बदायूं से उम्मीदवार घोषित कर दिया गया था, लेकिन बाद में वहां से शिवपाल यादव को समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी बना दिया गया.
2022 के यूपी विधानसभा चुनावों के बाद कई मौकों पर नाराजगी जाहिर कर चुके शिवपाल यादव को मैनपुरी उपचुनाव के पहले डिंपल यादव ने फोन कर आशीर्वाद मांगा और फिर वो मैदान में कूद पड़े थे - और बार बार दोहराते रहे कि परिवार एकजुट है, और सब मिलजुल कर रहेंगे. लेकिन, अब ये भी सुनने में आ रहा है कि बदायूं सीट को लेकर वो खुश नहीं हैं
2019 में समाजवादी पार्टी की जीती हुई सीटें
2019 में परिवार से दो लोग ही चुनाव जीत पाये थे, मुलायम सिंह यादव मैनपुरी से, और अखिलेश यादव आजमगढ़ से. कन्नौज सीट सुब्रत पाठक ने बीजेपी की झोली में डाल दी थी. 2022 में अखिलेश यादव करहल से विधायक बन जाने के बाद आजमगढ़ सीट छोड़ दी थी - लेकिन वो भी उपचुनाव में फिसल कर बीजेपी के पास चली गई. बीजेपी उम्मीदवार दिनेशलाल यादव निरहुआ ने अखिलेश यादव से हार का बदला धर्मेंद्र यादव से ले लिया था.
पिछले लोक सभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने रामपुर, मुरादाबाद और संभल सीट पर भी जीत हासिल की थी. अखिलेश यादव की तरह मोहम्मद आजम खां के रामपुर सीट छोड़ देने पर आजमगढ़ की तरह बीजेपी ने हाथ साफ कर दिया था.
मुरादाबाद से समाजवादी पार्टी के टिकट पर एचटी हसन सांसद बने थे, और यही वजह है कि कांग्रेस की जोरदार मांग के बावजूद अखिलेश यादव ने वो सीट नहीं छोड़ी है. करीब करीब वैसी ही उम्मीद अखिलेश यादव को संभल सीट से भी है.
संभल से अखिलेश यादव ने शफीकुर्रहमान बर्क को पहली ही लिस्ट में फिर से उम्मीदवार बनाया था, लेकिन उसके कुछ ही दिन बाद वो नहीं रहे. अखिलेश यादव ने कहा है कि संभल की सीट उनके परिवार के पास ही रहेगी - और माना जा रहा है कि शफीकुर्रहमान के विधायक पोते जियाउर्रहमान बर्क को समाजवादी पार्टी अपना उम्मीदवार बनाएगी.
नेताओं की नाराजगी एक्स्ट्रा मुसीबत बन रही है
बीजेपी से मुकाबले की चुनौती तो अपनी जगह है ही, अखिलेश यादव के सामने नया चैलेंज समाजवादी पार्टी के नेता और कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी शामिल हो गया है. और ये सब मैनपुरी जैसे इलाके में होने लगे तो मुश्किल का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है.
मैनपुरी में समाजवादी युवजन सभा के जिलाध्यक्ष का विरोध हो रहा था. पहले डीपी यादव को जिलाध्यक्ष बनाया गया, लेकिन कुछ घंटे बाद ही उनकी जगह रंजीत यादव को जिम्मेदारी दिये जाने की घोषणा हो गई, नाराजगी और बढ़ गई.
हालात की गंभीरता को देखते हुए अखिलेश यादव ने डीपी यादव को उनके समर्थकों के साथ लखनऊ बुलाया, और सभा के प्रदेश अध्यक्ष को बोल कर फिर से डीपी यादव को अध्यक्ष बनवा दिया, तब जाकर मामला शांत हुआ.
छोटे नेताओं की बात तो सुलझाना भी आसान होता है, लेकिन सीनियर नेता नाराज हो जायें तो बड़ी मुश्किल होती है. सलीम शेरवानी बदायूं सीट की उम्मीदवारी को लेकर नाराज हैं तो रेवतीरमण सिंह इलाहाबाद लोकसभा सीट कांग्रेस को दे दिये जाने से नाराज हैं और पार्टी छोड़ने तक की धमकी दे चुके हैं. खबर है कि दोनों नेताओं को मनाने के लिए अखिलेश यादव खुद प्रयागराज जा रहे हैं - वैसे बताने के लिए तो वो शादी समारोह में ही शामिल हो रहे हैं.