देशभर में करोड़ों लोग हर दिन डॉक्टर की सलाह पर दवाइयां खाते हैं. मरीजों को पूरा भरोसा होता है कि मेडिकल स्टोर से जो ब्रैंडेड दवा वे खरीद रहे हैं, वह एकदम सही होगी. लेकिन अब इसी भरोसे पर बहुत बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. भारत सरकार की संस्था CDSCO की ताजा रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि मई 2026 के दौरान 157 दवाओं के सैंपल क्वॉलिटी जांच में फेल हो गए हैं. इनमें बुखार, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, गैस और खांसी जैसी आम बीमारियों में रोज इस्तेमाल होने वाली दवाइयां शामिल हैं.
सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (CDSCO) हर महीने बाजार में बिक रही दवाओं के सैंपल लेकर लैब में जांच करता है. मई महीने की रिपोर्ट में 157 दवाओं को तय क्वॉलिटी से कमजोर पाया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ दवाओं में बीमारी ठीक करने वाला जो 'ड्रग सॉल्ट' होना चाहिए, उसकी मात्रा सही नहीं मिली. कुछ मामलों में दवाओं का कॉम्बिनेशन ही गड़बड़ था. इसका मतलब यह है कि मरीज इलाज समझकर जो दवा खा रहे थे, वह शरीर पर पूरा असर ही नहीं करेगी.
रोज खाई जाने वाली दवाएं भी लिस्ट में शामिल
सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि जांच में फेल हुई कई दवाइयां ऐसी हैं, जो लगभग हर आम परिवार के घर में मिल जाती हैं. इस लिस्ट में ये नाम शामिल हैं.
ये दवाइयां बुखार, दर्द, खांसी और सांस से जुड़ी समस्याओं के इलाज में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की जाती हैं
गैस, शुगर और बीपी के मरीज भी खा रहे हैं खराब दवा
रिपोर्ट में पेट और गैस की कई मशहूर दवाओं के सैंपल भी फेल पाए गए हैं. इनमें रेबेप्राजोल (Rabeprazole), पैंटोप्राजोल (Pantoprazole), ओमेप्राजोल (Omeprazole) और इसोमेप्राजोल (Esomeprazole) शामिल हैं, जिन्हें देश में लाखों लोग रोज सुबह खाते हैं. इनके अलावा, डायबिटीज के मरीजों की जरूरी दवा मेटफॉर्मिन (Metformin) और ग्लिमेपिराइड (Glimepiride) भी टेस्ट में फेल निकली हैं. ब्लड प्रेशर और दिल के मरीजों के लिए जरूरी दवा टेल्मीसार्टन 9Telmisartan), एम्लोडिपाइन (Amlodipine), रैमीप्रिल (Ramipril) के साथ-साथ खून पतला करने वाली एस्पिरिन 75 एमजी (Aspirin 75 mg) और कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली रोजुवास्टैटिन (Rosuvastatin) जैसी बड़ी कंपनियों की कुछ दवाइयां भी टेस्ट में फेल हो गई हैं.
सिर्फ गोलियां ही नहीं, पट्टियां और सैनिटाइजर भी घटिया
इस सरकारी जांच में सिर्फ खाने वाली दवाइयां ही नहीं, बल्कि अस्पतालों और घरों में रोज काम आने वाली चीजें भी फेल हो गई हैं. इनमें डिहाइड्रेशन में दिया जाने वाला ओआरएस (ORS), चोट साफ करने वाला सर्जिकल स्पिरिट (Surgical Spirit), हैंड सैनिटाइजर (Hand Sanitizer), घाव पर लगने वाली पट्टी (बैंडेज) और रुई (Cotton Wool) भी क्वॉलिटी टेस्ट पास नहीं कर पाई हैं. सिप्ला और सन फार्मा जैसी देश की सबसे बड़ी कंपनियों की दवाएं भी इस लिस्ट में आने से हड़कंप मच गया है.
यह कोई एक महीने की बात नहीं है. इस साल जनवरी में 218, फरवरी में 217, मार्च में 190, अप्रैल में 121 और अब मई में 157 दवाओं के सैंपल फेल हुए हैं. भारत दुनिया के 200 से ज्यादा देशों को दवाएं भेजता है, ऐसे में देश के भीतर ही ब्रैंडेड दवाओं का क्वॉलिटी में फेल होना पूरे सिस्टम और मरीजों के भरोसे को हिला देने वाली खबर है.
हम यह बात इतनी गंभीरता से इसलिए समझा रहे हैं, क्योंकि देश में हर रोज करीब 30 से 40 करोड़ लोग कोई न कोई दवा खाते हैं. इलाज के नाम पर शहरों में एक परिवार का सालाना औसत खर्च 12 हजार 400 रुपये है, वहीं गांवों में लोग करीब 10 हजार 500 रुपये सिर्फ दवाओं और डॉक्टर पर खर्च कर देते हैं. पहले देश में हर 15 दिन में औसतन साढ़े सात प्रतिशत लोग बीमार पड़ते थे, लेकिन आज यह आंकड़ा बढ़कर 13 प्रतिशत से ज्यादा हो चुका है. लोग ठीक होने के लिए गाढ़े पसीने की कमाई से डॉक्टर की लिखी ब्रैंडेड दवाइयां खरीदते हैं, लेकिन जब वही क्वॉलिटी टेस्ट में फेल हो जाएं तो गरीब और आम आदमी आखिर जाए तो कहां जाए.