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सिर से जुड़ी हैं ये जुड़वां बहनें...क्या होता है जब एक को उठना हो और दूसरी को सोना? ऐसे गुजर रही है इनकी जिंदगी

पटना की रहने वाली सबा और फराह सिर से जुड़ी हुई हैं. ये दोनों बहनें पिछले कई सालों से एक-दूसरे के सहारे जिंदगी जी रही हैं. इस स्टोरी में आप जानेंगे कैसे एक सामान्य जिंदगी की चाह में ये बहनें कैसे अपनी जिंदगी का हर दिन गुजार रही हैं और उन्हें क्या-क्या मुश्किलें आती हैं.

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सिर से जुड़ी बहनों का नाम सबा और फराह है. (Photo: ndia Today Archives)
सिर से जुड़ी बहनों का नाम सबा और फराह है. (Photo: ndia Today Archives)

पटना में ढाबा चलाने वाले शकील अहमद की जुड़वां बेटियों का हर एक दिन काफी तकलीफ में गुजरता है. उनकी दोनों बेटियों के नाम सबा और फराह है. ये दोनों बहनें क्रेनियोपेगस (Craniopagus) कंडीशन के साथ पैदा हुई थीं यानी इनका सिर आपस में जुड़ा हुआ है. मेडिकल साइंस के लिए ये केस हमेशा से ही एक बड़ी चुनौती रहा है. जन्म के बाद से ही इनके परिवार ने इन्हें अलग करने के लिए कई बड़े हॉस्पिटल्स के चक्कर काटे, लेकिन रिस्क इतना ज्यादा था कि डॉक्टर्स ने हाथ खड़े कर दिए थे.

हालांकि 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को ढाबा मालिक शकील अहमद की जुड़वां बेटियों की तकलीफों को कम करने के लिए एक मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस टीम में अमेरिकी विशेषज्ञ सर्जन डॉ. बेंजामिन कार्सन और अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIMS) के अन्य विशेषज्ञ शामिल होने चाहिए. आज भी ये दोनों लड़कियां अपनी पूरी जिंदगी एक-दूसरे के सहारे बिता रही हैं.

रोजमर्रा की लाइफ में क्या परेशानियां आती हैं?

सबा-फराह बहनों की लाइफ एक सामान्य इंसान से बिल्कुल अलग है. सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक, हर काम में दोनों को एक-दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है. दोनों का सिर आपस में जुड़ा हुआ है इसलिए ये एक-दूसरे को देख तक नहीं सकतीं.

यदि सबा को चलना है तो फराह को भी उसके साथ कदम मिलाने पड़ते हैं. बैठने से लेकर सोने तक, इनकी पोजीशन एक फिक्स्ड है. इनकी लाइफ का सबसे बड़ा स्ट्रगल पर्सनल प्राइवेसी और बेसिक कंफर्ट की कमी है. इन्हें हमेशा एक ही करवट सोना पड़ता है जो शरीर में लगातार दर्द और अकड़न पैदा करता है.

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यदि किसी एक को सोना हो एक को उठना हो तो दोनों को एक ही काम करना पड़ता है. यदि एक को लेटना है तो दूसरी को भी लेटना होता है. एक को खड़े होना है तो दूसरे को भी खड़े होना पड़ता है. दोनों का आपसी तालमेल ही उन्हें इन मुश्किल जर्नी में मदद कर रहा है.

समय के साथ बढ़ रहीं मुश्किलें

सबा-फराह के लिए सबसे बड़ी चुनौती उनके शरीर का बढ़ता वजन और उम्र के साथ आती शारीरिक समस्याएं हैं. इनके शरीर के अंग तो अलग हैं लेकिन सिर के हिस्से से जुड़े होने के कारण इनके दिमाग और नसों पर बहुत ज्यादा दबाव रहता है.

डॉक्टर्स का मानना है कि इस कंडीशन में सर्जरी करना मौत को न्योता देने जैसा है इसलिए इनका परिवार अब कुदरत पर भरोसा करके इन्हें प्यार और पैशेंस के साथ बड़ा कर रहा है. ये दोनों बहनें भले ही शारीरिक रूप से एक-दूसरे से जुड़ी हों लेकिन इनके मन और सोच अलग-अलग हैं.

इमोशनल सफर और समाज का नजरिया

इनके पिता शकील अहमद और मां के लिए सबा और फराह सिर्फ बेटियां ही नहीं बल्कि एक ऐसी जिम्मेदारी हैं जो हर पल उन्हें इमोशनल करती हैं. समाज में लोग इन्हें कई बार अजीब नजरों से देखते हैं जिससे इनकी फैमिली को काफी दुख होता है.जब सबा उदास होती है तो फराह उसे हंसाने की कोशिश करती है और जब फराह को दर्द होता है, तो सबा उसकी ताकत बन जाती है.

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क्या है ये क्रेनियोपेगस

यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के मुताबिक, क्रेनियोपेगस एक बेहद दुर्लभ जन्मजात मेडिकल कंडीशन है, जिसमें जुड़वां बच्चे सिर (खोपड़ी) से आपस में जुड़े हुए पैदा होते हैं. ऐसे बच्चों का दिमाग अलग-अलग होता है, लेकिन उनकी खोपड़ी, रक्त वाहिकाएं और कई बार मस्तिष्क का कुछ हिस्सा आपस में जुड़ा हो सकता है.

यह स्थिति लगभग 25 लाख में से केवल 1 में देखने को मिलती है. ऐसे मामलों में सर्जरी बहुत जटिल होती है और इसे तभी किया जाता है जब डॉक्टरों को लगता है कि दोनों बच्चों को सुरक्षित रूप से अलग करना संभव है.

क्रेनियोपेगस का इलाज मुख्य रूप से सर्जरी है, लेकिन हर मामले में ऑपरेशन संभव नहीं होता. इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि दोनों बच्चों की खोपड़ी, रक्त वाहिकाएं और मस्तिष्क किस हद तक जुड़े हुए हैं.

यदि डॉक्टरों को लगता है कि दोनों बच्चों को सुरक्षित रूप से अलग किया जा सकता है तो कई चरणों में ऑपरेशन किया जाता है. सर्जरी से पहले MRI, CT स्कैन और 3D इमेजिंग के जरिए दिमाग और रक्त वाहिकाओं की पूरी मैपिंग की जाती है.

यदि मस्तिष्क का अहम हिस्सा या प्रमुख रक्त वाहिकाएं बहुत ज्यादा जुड़ी हों तो ऑपरेशन का जोखिम काफी बढ़ जाता है. ऐसे मामलों में डॉक्टर सर्जरी न करने का फैसला भी ले सकते हैं.

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