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वजन 520 ग्राम, उम्र 27 हफ्ते...जन्म के समय हथेली बराबर थी बच्ची, 3 महीने तक मासूम ने ऐसे लड़ी मौत से जंग

मैंगलोर के एक हॉस्पिटल में डॉक्टरों ने कमाल कर दिया. यहां मात्र 520 ग्राम वजन और 27 हफ्ते में पैदा हुई एक प्रीमैच्योर बच्ची को डॉक्टरों ने नया जीवन दिया है. दरअसल, करीब 3 महीने तक एनआईसीयू (NICU) में जिंदगी की जंग लड़ने के बाद अब बच्ची पूरी तरह सुरक्षित और स्वस्थ है.

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27 हफ्ते की प्रीमैच्योर पैदा हुई थी नन्ही परी. (Photo: fmciofficial)
27 हफ्ते की प्रीमैच्योर पैदा हुई थी नन्ही परी. (Photo: fmciofficial)

कर्नाटक के मैंगलोर से एक मामला सामने आया है जो चमत्कार से कम नहीं लग रहा है. दरअसल, वहां के फादर मुलर मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल (FMMCH) में एक बच्ची पैदा हुई थी जिसका वजन केवल 520 ग्राम था जो 27 हफ्ते में ही पैदा हो गई थी. करीब तीन महीने तक हॉस्पिटल के एनआईसीयू (NICU) में जिंदगी और मौत के बीच झूलने के बाद अब यह बच्ची पूरी तरह स्वस्थ है और उसे हॉस्पिटल से छुट्टी दे दी गई है.

IVF से मिली थीं खुशियां

इस कपल की शादी को कई साल हो चुके थे लेकिन उन्हें माता-पिता बनने का सुख नहीं मिला था. आखिरकार उन्होंने आईवीएफ का सहारा लिया था. प्रेग्नेंसी बेहद सेंसिटिव होने के कारण फादर मुलर हॉस्पिटल की ओबीजी (OBG) कंसलटेंट डॉक्टर जॉयलीन डिसूजा लगातार महिला की हेल्थ मॉनिटरिंग कर रही थीं. सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन अचानक 24वें हफ्ते में ही महिला को लेबर पेन शुरू हो गया जो कि बेहद रिस्की था.

डॉक्टरों ने बढ़ाया प्रेग्नेंसी का समय

डॉक्टर जॉयलीन डिसूजा की लीडरशिप वाली टीम ने तुरंत सूझबूझ दिखाई. उन्होंने स्पेशल मेडिसिन और लगातार मॉनिटरिंग के जरिए प्रेग्नेंसी को करीब तीन हफ्ते और आगे बढ़ा दिया. इसका फायदा यह हुआ कि बच्ची को मां के गर्भ में 27 हफ्ते तक रहने का मौका मिल गया जिससे उसके बचने की उम्मीदें थोड़ी बढ़ गईं. 

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इसके बाद 11 फरवरी को सिजेरियन डिलीवरी (सी-सेक्शन) के जरिए इस नन्हीं परी का जन्म हुआ. जन्म के समय उसका वजन केवल 520 ग्राम था, जिसके चलते उसे तुरंत एनआईसीयू में शिफ्ट किया गया.

3 महीने तक चली जिंदगी की जंग

मेडिकल साइंस में 1 किलो से कम वजन वाले बच्चों को 'एक्सट्रीमली लो बर्थ वेट' (ELBW) की कैटेगरी में रखा जाता है. ऐसे बच्चों का बचना बहुत मुश्किल होता है. हॉस्पिटल के पीडियाट्रिशियन और नियोनेटल स्पेशलिस्ट डॉक्टर मारियो बुकेलो और डॉक्टर जेसन की टीम ने बच्ची की देखभाल की. 

उसकी आंखों की रोशनी बचाने के लिए आई स्पेशलिस्ट डॉक्टर श्रीपति कामथ ने रेटिनोपैथी का इलाज किया. इसके अलावा डॉक्टर मुरलीधर और एनेस्थीसिया टीम के डॉक्टर किशन शेट्टी ने भी अहम भूमिका निभाई.

3 गुना बढ़ा वजन, अब मिली छुट्टी

एनआईसीयू में करीब तीन महीने तक चले लंबे इलाज के बाद बच्ची का वजन 3 गुना बढ़ गया. जून के महीने में जब बच्ची का वजन करीब 1.6 किलोग्राम हो गया और उसकी हालत बिल्कुल स्थिर हो गई और अब उसे घर भेज दिया गया है.

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