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बैठे-बैठे बूढ़ा हो रहा है दिमाग? आज ही बदलें ये एक आदत, भूलने की बीमारी का खतरा होगा कम

घंटों टीवी देखने जैसी मानसिक रूप से निष्क्रिय आदतें आपके दिमाग को समय से पहले बूढ़ा और कमजोर बना सकती हैं. स्वीडन में हुई एक नई रिसर्च में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. वैज्ञानिकों ने इस रिसर्च में बताया कि बैठने के दौरान आपका दिमाग कितना एक्टिव रहता है, इसका सीधा असर आपकी याददाश्त पर पड़ता है.

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ऐसे कम करें डिमेंशिया का रिस्क (Photo: ITG)
ऐसे कम करें डिमेंशिया का रिस्क (Photo: ITG)

हम सभी बचपन से यह कहावत सुनते आ रहे हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है. अमूमन इसका मतलब यही निकाला जाता है कि अगर आप अपने दिमाग को किसी प्रोडक्टिव या रचनात्मक काम में नहीं लगाएंगे तो उसमें फिजूल और नकारात्मक विचार आने लगेंगे. विज्ञान की भाषा में इस खाली दिमाग का संबंध हमारी मानसिक निष्क्रियता से है.

वहीं, सालों से वैज्ञानिकों का भी यह मानना रहा है कि लंबे समय तक बैठे रहने की आदत दिमाग के लिए नुकसानदेह है और इससे डिमेंशिया का खतरा बढ़ सकता है. डिमेंशिया यानी याददाश्त, सोचने-समझने, तर्क करने और रोज के कार्य करने की क्षमता में गिरावट, जिसे बोलचाल की भाषा में भूलने की बीमारी भी कहा जाता है,  लेकिन हाल ही में सामने आए नए नतीजों ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है. नए निष्कर्ष बताते हैं कि आप कितनी देर बैठते हैं, उससे कहीं ज्यादा यह मायने रखता है कि आपके बैठने का तरीका (यानी बैठने के दौरान आपकी एक्टिविटी) कैसा है. 

क्या कहती है नई रिसर्च?
मार्च में अमेरिकन जर्नल ऑफ प्रिवेंटिव मेडिसिन में प्रकाशित हुआ यह हालिया शोध बताता है कि अगर कोई व्यक्ति मानसिक रूप से निष्क्रिय बैठने की अपनी आदत को मानसिक रूप से सक्रिय बैठने की आदत से बदल देता है तो उसमें डिमेंशिया के खतरे में काफी कमी देखी जाती है.

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दिमाग का बिजी रहना है जरूरी

इसे हम ऐसे समझ सकते हैं कि अगर कोई व्यक्ति बैठा हुआ है लेकिन वो पढ़ाई, ऑफिस का काम या ऐसी किसी एक्टिविटी में बिजी है जिसमें उसका दिमाग लगातार काम कर रहा है तो ऐसे व्यक्ति को डिमेंशिया का रिस्क कम होगा. वहीं, टेलीविजन देखना या स्क्रीन स्क्रॉल करने जैसी एक्टिविटी जिनमें आप बैठे भी रहते हैं और आपका दिमाग भी पूरी तरह निष्क्रिय यानी सुस्त अवस्था में रहता है तो ऐसे लोगों को डिमेंशिया का रिस्क ज्यादा होता है. 

19 साल तक हुई स्टडी

एक आधिकारिक प्रेस रिलीज के अनुसार, इस शोध के सटीक निष्कर्षों तक पहुंचने के लिए स्वीडन के शोधकर्ताओं ने एक बहुत बड़ा अध्ययन किया. इस रिसर्च के लिए वैज्ञानिकों ने 35 से 64 वर्ष की आयु वर्ग के 20 हजार से ज्यादा वयस्कों के डेटा का डीप्ली एनालिसिस किया. शोधकर्ताओं ने इन सभी लोगों पर साल 1997 से लेकर 2016 तक यानी पूरे 19 सालों तक लगातार नजर रखी.

स्टडी में शामिल लोगों से उनकी रोज की आदतों को लेकर सवाल-जवाब किए गए. इसमें उन्होंने खुद बताया कि उनकी बैठने की आदतें कैसी हैं वे कितनी शारीरिक गतिविधियां करते हैं और उनकी जीवनशैली से जुड़े बाकी व्यवहार कैसे हैं.

इन लोगों में डिमेंशिया के मामलों की सटीक पहचान करने के लिए स्वीडन के आधिकारिक स्वास्थ्य और मृत्यु संबंधी राष्ट्रीय रिकॉर्ड्स का इस्तेमाल किया गया था.

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इन लोगों को डिमेंशिया का खतरा

अध्ययन के चौंकाने वाले निष्कर्ष बताते हैं कि जो लोग मानसिक रूप से सक्रिय बैठने वाली जीवनशैली जैसे पढ़ना या लिखना अपनाते हैं, उनमें मानसिक रूप से निष्क्रिय बैठने वाले लोगों जैसे टीवी देखना की तुलना में डिमेंशिया का खतरा काफी कम होता है.

भले ही यह महत्वपूर्ण रिसर्च स्वीडन के लोगों पर की गई थी, लेकिन प्रेस रिलीज में साफ कहा गया है कि इसके नतीजे केवल एक देश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरी दुनिया की आबादी पर समान रूप से लागू होने की पूरी संभावना रखते हैं. साथ ही ये भविष्य में दुनिया भर के लोगों को डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारी से बचाने के लिए नए हेल्थ गाइडलाइंस और प्रिवेंटिव स्ट्रेटेजी तैयार करने में यह डेटा बेहद मददगार साबित हो सकते हैं.

स्वीडन के कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट के प्रमुख शोधकर्ता डॉ. मैट्स हॉलग्रेन ने इस विषय पर एक बयान जारी करते हुए कहा है कि इस स्टडी ने दिमाग के स्वास्थ्य के मामले में एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंतर को दुनिया के सामने रखा है. उन्होंने कहा कि निष्क्रिय बैठने और मानसिक रूप से सक्रिय होकर बैठने की आदतों के बीच का यह अंतर हमारे दिमाग को लंबे समय तक जवान और सेहतमंद बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है. 

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