scorecardresearch
 

Touch Wood... क्यों नजर ना लगने के लिए लकड़ी के हाथ लगाते हैं, लोहे क्यों नहीं?

अच्छी बात कहने के बाद लोग 'टच वुड' क्यों बोलते हैं और लकड़ी क्यों छूते हैं? जानिए इस पुरानी परंपरा का इतिहास, पेड़ों में आत्माओं की मान्यता और बच्चों के एक पुराने खेल से जुड़ी दिलचस्प कहानी.

Advertisement
X
'टच वुड' की शुरुआत को लेकर एक दूसरी कहानी ईसाई धर्म से भी जुड़ी हुई है. ( Photo: ITG)
'टच वुड' की शुरुआत को लेकर एक दूसरी कहानी ईसाई धर्म से भी जुड़ी हुई है. ( Photo: ITG)

कई बार आपने किसी को यह कहते हुए सुना होगा कि सब कुछ अच्छा चल रहा है, बस ऐसा ही चलता रहे... टच वुड! इतना कहने के बाद वह व्यक्ति आसपास रखी किसी लकड़ी की चीज को छू भी लेता है. कुछ लोग तो लकड़ी की मेज या दरवाजे पर को जरूर छूते हैं. हमारे आसपास भी ऐसे कई लोग हैं, जो अच्छी बात कहने के बाद 'टच वुड' बोलना नहीं भूलते. जैसे कोई कहता है कि इस साल मेरी तबीयत बिल्कुल ठीक रही है, टच वुड. कोई कहता है कि नौकरी में सब अच्छा चल रहा है, टच वुड. 

ऐसा करने के पीछे लोगों की सोच होती है कि कहीं उनकी अच्छी किस्मत को किसी की नजर न लग जाए या आने वाले समय में कुछ बुरा न हो जाए. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर अच्छी बात कहने के बाद लकड़ी को छूने की जरूरत क्यों महसूस होती है? लकड़ी में ऐसा क्या खास है, जो इसे बुरी किस्मत से बचाने से जोड़ दिया गया? दरअसल, इस छोटी-सी आदत के पीछे कई साल पुरानी मान्यताएं और दिलचस्प कहानियां जुड़ी हुई हैं.

क्या होता है टच वुड का मतलब?
'टच वुड' अंग्रेजी का यह वाक्य काफी फेमस है. इसका इस्तेमाल तब किया जाता है, जब कोई व्यक्ति अपनी जिंदगी में चल रही किसी अच्छी बात को आगे भी वैसा ही बनाए रखना चाहता है. उदाहरण के लिए, अगर कोई कहता है कि पिछले कई सालों से मेरी नौकरी अच्छी चल रही है, तो वह इसके बाद 'टच वुड' बोल सकता है. इसके साथ ही वह किसी लकड़ी की चीज को छूता है या उस पर हाथ से दस्तक देता है.

Advertisement

ऐसा करने के पीछे मान्यता है कि अपनी अच्छी किस्मत के बारे में खुलकर बात करने से कहीं वह खत्म न हो जाए. इसलिए लोग लकड़ी को छूकर अनजाने में आने वाली बुरी किस्मत से बचने की कोशिश करते हैं. अमेरिका में इसी तरह की आदत के लिए 'नॉक ऑन वुड' (Knock on Wood) कहा जाता है. इसका मतलब भी लगभग यही है. यानी अच्छी किस्मत बनाए रखने और बुरी घटनाओं को दूर रखने के लिए लकड़ी पर दस्तक देना.

क्या पेड़ों में आत्माओं के रहने की मान्यता से जुड़ी है यह परंपरा?
'टच वुड' को लेकर एक पुरानी मान्यता यह है कि प्राचीन समय में कुछ लोग मानते थे कि पेड़ों में आत्माएं या देवताओं का वास होता है. यूरोप की कई पुरानी परंपराओं में ओक, ऐश और हॉथॉर्न जैसे पेड़ों को खास महत्व दिया जाता था. लोगों के लिए ये पेड़ सिर्फ छाया या लकड़ी देने वाले साधन नहीं थे, बल्कि इन्हें पवित्र भी माना जाता था. इस मान्यता के अनुसार, जब कोई व्यक्ति पेड़ को छूता था या उस पर दस्तक देता था, तो वह वहां रहने वाली अच्छी आत्माओं से सुरक्षा मांगता था. लोगों को लगता था कि ऐसा करने से बुरी शक्तियां उनसे दूर रहेंगी और उनकी अच्छी किस्मत बनी रहेगी.

Advertisement

एक दूसरी मान्यता यह भी है कि लोग लकड़ी पर दस्तक इसलिए देते थे, ताकि बुरी आत्माएं उनकी अच्छी बातों को सुन न सकें. माना जाता था कि अगर किसी ने अपनी खुशहाली या अच्छी किस्मत के बारे में ज्यादा बात की, तो बुरी आत्माएं उसे छीन सकती हैं. लकड़ी पर दस्तक देने से वे ऐसा नहीं कर पाएंगी. हालांकि, ये सभी पुरानी मान्यताएं हैं. इनके सही होने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है.

क्या ईसाई धर्म के लकड़ी के क्रॉस से भी जुड़ा है टच वुड?
'टच वुड' की शुरुआत को लेकर एक दूसरी कहानी ईसाई धर्म से भी जुड़ी हुई है. इस मान्यता के मुताबिक, लकड़ी को छूने की परंपरा का संबंध ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाने के लिए इस्तेमाल किए गए लकड़ी के क्रॉस से हो सकता है. लोगों का मानना था कि लकड़ी के क्रॉस को छूना ईश्वर से सुरक्षा और आशीर्वाद मांगने का एक प्रतीक हो सकता है. इसी वजह से लकड़ी को छूने की आदत को बुरी चीजों से बचने की भावना से जोड़कर देखा जाने लगा. हालांकि, इतिहास में इस बात का कोई पक्का सबूत नहीं मिलता कि आज इस्तेमाल होने वाले 'टच वुड' शब्द की शुरुआत इसी परंपरा से हुई थी.

बच्चों के एक पुराने खेल से भी जुड़ी हो सकती है यह आदत
'टच वुड' की शुरुआत को लेकर एक और दिलचस्प कहानी सामने आती है. ब्रिटिश लोक परंपराओं के जानकार स्टीव राउड के मुताबिक, इस आदत का संबंध 19वीं सदी के एक बच्चों के खेल से हो सकता है. इस खेल का नाम 'टिग्गी टचवुड' (Tiggy Touchwood) था. यह कुछ हद तक पकड़म-पकड़ाई जैसा खेल होता था. इसमें एक बच्चा दूसरे बच्चों को पकड़ने की कोशिश करता था. लेकिन अगर कोई बच्चा किसी पेड़, लकड़ी के दरवाजे या लकड़ी से बनी दूसरी चीज को छू लेता था, तो उसे कुछ समय के लिए पकड़े जाने से सुरक्षा मिल जाती थी.

Advertisement

यानी लकड़ी को छूना इस खेल में बचाव का तरीका था. माना जाता है कि धीरे-धीरे लकड़ी को छूकर खुद को सुरक्षित रखने का यह विचार लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में भी शामिल हो गया. बाद में लोग अच्छी बात कहने के बाद बुरी किस्मत से बचने के लिए भी लकड़ी छूने लगे.

कब से इस्तेमाल होने लगा टच वुड शब्द?
भले ही इस परंपरा को प्राचीन मान्यताओं से जोड़ा जाता है, लेकिन लिखित इतिहास में 'टच वुड' का जिक्र काफी बाद में मिलता है. भाषा के इतिहास से जुड़ी वेबसाइट 'वर्ल्ड वाइड वर्ड्स' के मुताबिक, ब्रिटेन में 'टच वुड' शब्द का एक शुरुआती लिखित उदाहरण साल 1899 में मिलता है. वहीं, अमेरिका में 'नॉक ऑन वुड' का शुरुआती उदाहरण साल 1905 का बताया जाता है. हालांकि, इसकी शुरुआत को लेकर अलग-अलग कहानियां मौजूद हैं. इसलिए यह पक्के तौर पर कहना मुश्किल है कि यह आदत सबसे पहले कहां और कब शुरू हुई.

क्या सच में लकड़ी छूने से बुरी किस्मत दूर होती है?
आज भी दुनिया के कई देशों में लोग 'टच वुड' या 'नॉक ऑन वुड' कहते हैं. हालांकि, विज्ञान के पास ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि लकड़ी छूने से बुरी किस्मत दूर होती है या अच्छी किस्मत बनी रहती है. इसके बावजूद लोग इस आदत को अपनाते हैं. कुछ लोग इसे पुरानी परंपरा मानते हैं, तो कुछ के लिए यह सिर्फ अच्छी बात के बाद उम्मीद जताने का एक मजेदार तरीका है. यानी अगली बार जब कोई अच्छी बात कहने के बाद लकड़ी छुए और 'टच वुड' बोले, तो समझ जाइए कि वह अपनी अच्छी किस्मत आगे भी वैसी ही बने रहने की उम्मीद कर रहा है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement