30 अक्टूबर 1918 को प्रथम विश्व युद्ध के दौरान एक ऐसी संधि पर हस्ताक्षर हुए, जिसने दुनिया के सबसे पुराने और ताकतवर साम्राज्यों में से एक के पतन की शुरुआत कर दी. यह संधि किसी महल या सरकारी इमारत में नहीं, बल्कि समुद्र में खड़े एक ब्रिटिश युद्धपोत पर हुई थी. इसके साथ ही ऑटोमन साम्राज्य ने प्रथम विश्व युद्ध में अपनी हार स्वीकार कर ली.
कभी यूरोप, एशिया और अफ्रीका के बड़े हिस्से पर राज करने वाले इस साम्राज्य की ताकत अब बिखरने लगी थी. इस संधि ने न सिर्फ युद्ध में ऑटोमन साम्राज्य की भूमिका खत्म की, बल्कि आधुनिक मध्य पूर्व की राजनीति की नींव रखने में भी अहम भूमिका निभाई.
युद्धपोत पर हुई थी ऐतिहासिक संधि
30 अक्टूबर 1918 को ब्रिटेन और ऑटोमन साम्राज्य के प्रतिनिधियों ने मुड्रोस की संधि पर हस्ताक्षर किए. यह समझौता एजियन सागर में स्थित लेमनोस द्वीप के मुड्रोस बंदरगाह पर खड़े ब्रिटिश युद्धपोत एचएमएस एगमेमनॉन में हुआ था.
इस बातचीत में ब्रिटेन की ओर से एडमिरल आर्थर काल्थॉर्प ने नेतृत्व किया, जबकि ऑटोमन साम्राज्य के प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई नौसेना मामलों के मंत्री रऊफ बेय कर रहे थे. दोनों पक्षों के बीच बातचीत सुबह करीब 9:30 बजे शुरू हुई और उसी शाम संधि पर हस्ताक्षर हो गए.
समझौते के मुताबिक, अगले दिन यानी 31 अक्टूबर को दोपहर 12 बजे से दोनों पक्षों के बीच लड़ाई बंद होनी थी. इस तरह ऑटोमन साम्राज्य की प्रथम विश्व युद्ध में भागीदारी खत्म हो गई.
युद्ध में कैसे फंस गया था ऑटोमन साम्राज्य?
ऑटोमन साम्राज्य कभी दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों में गिना जाता था. इसकी सत्ता यूरोप, एशिया और अफ्रीका के बड़े इलाकों तक फैली हुई थी. लेकिन 16वीं सदी के आखिरी दौर से ही इसकी ताकत धीरे-धीरे कम होने लगी थी.
जब 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ, तब ऑटोमन साम्राज्य ने शुरुआत में तटस्थ रहने की कोशिश की. लेकिन जल्द ही उसने जर्मनी के साथ गठबंधन कर लिया और अक्टूबर 1914 में मित्रराष्ट्रों के खिलाफ युद्ध में उतर गया.
इस युद्ध में एक तरफ जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और ऑटोमन साम्राज्य जैसी केंद्रीय शक्तियां थीं, तो दूसरी तरफ ब्रिटेन, फ्रांस और रूस समेत मित्रराष्ट्र थे.
ऑटोमन साम्राज्य ने युद्ध के दौरान कई मोर्चों पर जमकर मुकाबला किया. 1915 से 1916 के बीच गैलीपोली प्रायद्वीप पर मित्रराष्ट्रों के बड़े हमले को रोकना उसकी महत्वपूर्ण सैन्य सफलताओं में से एक था. इस अभियान में ब्रिटिश और फ्रांसीसी सेनाओं को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा.
लेकिन युद्ध लंबा खिंचने के साथ ऑटोमन साम्राज्य की स्थिति बिगड़ती चली गई. ब्रिटिश और रूसी सेनाओं के हमलों के अलावा अरब क्षेत्रों में शुरू हुए विद्रोह ने भी उसकी मुश्किलें बढ़ा दीं. अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई और उसके नियंत्रण वाले कई इलाकों में तबाही मच गई.
युद्ध और उससे जुड़ी भुखमरी व संकट के कारण करीब 60 लाख लोगों की मौत का अनुमान लगाया गया. लाखों अन्य लोग खाने की कमी और बदहाल हालात से जूझ रहे थे.
ब्रिटेन ने फ्रांस को बताए बिना क्यों की बातचीत?
अक्टूबर 1918 के पहले सप्ताह तक ऑटोमन सरकार और उसके कुछ नेताओं ने मित्रराष्ट्रों से संपर्क करना शुरू कर दिया था. वे युद्ध खत्म करने और शांति समझौते की संभावनाएं तलाश रहे थे.
उस समय ब्रिटिश सेनाएं ऑटोमन साम्राज्य के कई इलाकों पर कब्जा कर चुकी थीं. ब्रिटेन इस मौके का इस्तेमाल अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए करना चाहता था. लेकिन यहां एक पेच था. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1916 में हुए एक समझौते के तहत फ्रांस को सीरिया के तटीय इलाकों और आज के लेबनान के बड़े हिस्से पर नियंत्रण मिलने की उम्मीद थी.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड लॉयड जॉर्ज और उनकी कैबिनेट ने फ्रांस से सलाह किए बिना एडमिरल आर्थर काल्थॉर्प को ऑटोमन साम्राज्य के साथ तत्काल युद्धविराम पर बातचीत करने की मंजूरी दे दी.
ब्रिटेन के इस कदम से फ्रांस के प्रधानमंत्री जॉर्ज क्लेमेंसो नाराज हो गए. दोनों देश प्रथम विश्व युद्ध में सहयोगी थे, लेकिन युद्ध के बाद ऑटोमन साम्राज्य के इलाकों पर किसका नियंत्रण होगा, इस सवाल पर उनके हित टकराने लगे थे. यही वजह थी कि युद्ध खत्म होने के बाद भी मध्य पूर्व के भविष्य को लेकर ब्रिटेन और फ्रांस के बीच खींचतान जारी रही.
मुड्रोस की संधि में क्या-क्या शर्तें थीं?
मुड्रोस की संधि सिर्फ युद्ध रोकने का समझौता नहीं थी. इसकी शर्तों ने ऑटोमन साम्राज्य की सैन्य और राजनीतिक ताकत को काफी कमजोर कर दिया.
- ऑटोमन साम्राज्य को डार्डानेल्स और बॉस्फोरस स्ट्रैट जैसे समुद्री मार्ग से मित्रराष्ट्रों के युद्धपोतों को गुजरने देना था.
- इन अहम समुद्री रास्तों की सुरक्षा करने वाले किलों पर मित्रराष्ट्रों को सैन्य कब्जा करने की अनुमति देनी थी.
- ऑटोमन साम्राज्य को अपनी सेना को भंग करने की प्रक्रिया शुरू करनी थी. उसके नियंत्रण में मौजूद युद्धबंदियों को रिहा करना था.
- ऑटोमन साम्राज्य को अपने अरब प्रांतों से सेना हटानी थी. इनमें से ज्यादातर इलाके पहले ही मित्रराष्ट्रों के नियंत्रण में जा चुके थे.
इन शर्तों के बाद ऑटोमन साम्राज्य के लिए युद्ध जारी रखना लगभग असंभव हो गया. उसकी सैन्य क्षमता सीमित हो गई और उसके बचे हुए इलाकों पर भी मित्रराष्ट्रों का दबाव बढ़ गया.
इस संधि ने प्रथम विश्व युद्ध में ऑटोमन साम्राज्य की भागीदारी खत्म कर दी. हालांकि, इससे साम्राज्य उसी दिन कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुआ. लेकिन उसकी सत्ता कमजोर पड़ चुकी थी और उसका बिखरना लगभग तय हो गया था.