दीवारों के बीच अक्सर कंक्रीट की पतली परत देखने को मिलती है. यह खिड़के के निचले सिरे की तरफ एक पट्टी जैसी होती है. इसी कंक्रीट यानी आरसीसी पट्टी को सीलबैंड कहते हैं. सील बैंड घर बनाने के दौरान दीवारों में सरिये के खांचे पर कंक्रीट की एक होरिजेंटल पट्टी होती है.
आसान शब्दों में कहें तो यह दीवारों के बीच में पतली पिलर की तरह होती है. इसे सामान्य तौर पर खिड़की के निचले स्तर पर ईंट की दीवार के ऊपर डाला जाता है. यह दीवार की मजबूती के लिए बहुत जरूरी होता है. खासकर वैसी दीवारों के लिए जिसमें खिड़की या दरवाजे निकाले जाते हैं.
सीलबैंड दीवार में दरार आने से रोकता है. खिड़कियों के कोनों और नीचे की दीवारों में समय के साथ जो दरारें आती हैं, यह सील बैंड उन्हें रोकता है. यह ऊपर की दीवार और खिड़की के फ्रेम का वजन निचली ईंटों पर समान रूप से बांटता है.
भूकंप जैसी स्थिति में सुरक्षा प्रदान करता है. यह दीवार की मजबूती बढ़ाकर भवन को छोटे-मोटे भूकंप झटकों से बचाता है और पूरी चिनाई को आपस में बांधकर रखता है. यानी इससे दीवार की पकड़ मजबूत होती है.
सील बैंड से दीवारों की पकड़ मजबूत हो जाती है. यह दीवार को हिलने या अलग होने से रोकने के लिए यह स्ट्रक्चर को बेहतर सपोर्ट देता है. यह आमतौर पर फर्श से लगभग 3 फीट यानी 36 इंच या 900 मिमी की ऊंचाई पर दिया जाता है, जो खिड़की का निचला तल होता है. इसे सील लेवल भी कहते हैं.
इस आरसीसी बैंड की मोटाई आमतौर पर 3 से 4 इंच यानी 75 मिमी से 100 मिमी. रखी जाती है और चौड़ाई दीवार की मोटाई के बराबर होती है. सील बैंड हर दीवार के लिए जरूरी होता है. एक तरह से यह प्लींथ के लैंटन के बीच के रिंग का काम करता है और पिलर के साथ मिलकर पूरे घर को एक मजबूत स्ट्रक्चर देता है.