लखनऊ के कोचिंग सेंटर में लगी आग से एक बार फिर फायर एनओसी की चर्चा होने लगी है. जब दिल्ली के मालवीय नगर में आग लगी थी, जब भी ये बात सामने आई थी कि बिल्डिंग मालिक ने फायर एनओसी नहीं ली है. वैसे जब भी कहीं आग लगती है तो फायर एनओसी ना होने की बात सामने आती है. ऐसे में सवाल ये खड़ा होता है कि आखिर बिल्डिंग मालिक फायर एनओसी लेने से बचते क्यों हैं. क्या इसे लेना इतना जटिल है कि लोग फायर एनओसी नहीं ले पाते.
मालवीय नगर में लगी आगे से पहले राजकोट (गेमिंग जोन), दिल्ली (बेबी केयर सेंटर), दिल्ली मुखर्जी नगर (कोचिंग सेंटर), मुंडका (बिल्डिंग) में लगी आग में भी फायर एनओसी ना होने की बात सामने आई थी. फिर मालवीय नगर की आग के बाद पता चला कि फायर एनओसी नहीं ली गई थी. तो आज समझते हैं कि आखिर फायर एनओसी मिलती कैसे है और ऐसी कौनसी शर्तें हैं, जिन्हें पूरा करने के बाद एनओसी मिलती है.
किन्हें फायर एनओसी लेना जरूरी है?
वैसे तो आग स्टेट का मामला है और इस स्थिति में आग से जुड़े नियम राज्य की ओर से तय किए जाते हैं. लेकिन, सामान्य तौर पर देखें तो 15 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले या विशेष श्रेणी (बहुमंजिला, व्यावसायिक, अस्पताल आदि) के बिल्डिंग के लिए फायर एनओसी लेना अनिवार्य हैं. लेकिन, अगर होटल है तो 12 मीटर, एजुकेशन बिल्डिंग है तो 9 मीटर, नॉर्मल व्यावसायिक भवन है तो 15 मीटर की हाइट पर एनओसी जरूरी है. ये बिल्डिंग में हो रहे काम के आधार पर तय होती है.
कई जगह इसकी ऑनलाइन व्यवस्था भी है. वैसे राज्य अग्निशमन सेवा विभाग की ओर से एनओसी मिलती है. अगर फीस की बात करें तो ये बिल्डिंग की हाइट, साइज आदि पर निर्भर करती है और ये रेट हर राज्य के हिसाब से अलग-अलग है. वैसे एनओसी 2000 से 50 हजार रुपये के बीच फीस के साथ मिल सकती है.
किन शर्तों को पूरा करना होता है?
फायर एनओसी उस स्थिति में मिलती है जब बिल्डिंग में आग लगने के बाद के इंतजाम पूरे हों. जैसे अगर आग लग जाती है तो कैसे उससे निपटा जाएगा. जैसे बिल्डिंग तक फायर ब्रिगेड के पहुंचने के लिए पर्याप्त रास्ता होना चाहिए. हर बिल्डिंग में इमरजेंसी में निकलने के लिए एक्जिट की व्यवस्था होनी चाहिए. फायर चेक डोर भी होने चाहिए. बिल्डिंग में स्मोक मैनेजमेंट सिस्टम लगा होना चाहिए.फायर एक्सटिंग्विशर बिल्डिंग के हिसाब से रखे होने चाहिए. ऑटोमैटिक फायर डिटेक्शन और अलार्म सिस्टम भी होना चाहिए. पब्लिक एड्रेस सिस्टम, ऑटोमैटिक स्प्रिंकलर सिस्टम, फायर पंपिंग व्यवस्था भी होनी चाहिए. एग्जिट साइनेज, स्टैंडबाय पावर सप्लाई, रिफ्यूज एरिया, फायर कंट्रोल रूम को लेकर भी नियम तय किए गए हैं.
अगर ये इंतजाम पूरे होते हैं तो सरकार की ओर से फायर एनओसी दी जाती है, लेकिन आजकल बहुत कम बिल्डिंग्स में ये सभी शर्ते पूरी हो पाती हैं. इस स्थिति में बिल्डिंग मालिक में फायर एनओसी से बचते हैं. इसके अलावा जब फायर एनओसी लेते हैं तो कई सवालों का जवाब भी देना होता है, जिसमें आग से जुड़े हर फैक्टर की जानकारी देनी होती है. ये सवाल कुछ ऐसे होते हैं-
कैसी बिल्डिंग है?
कितनी ऊंचाई है?
कितनी मंजिल हैं?
ग्राउंड फ्लोर का क्षेत्रफल कितना है?
प्रत्येक मंजिल का क्षेत्रफल कितना है?
बेसमेंट है या नहीं और उसका क्षेत्रफल कितना है?
फायर ब्रिगेड की पहुंच है या नहीं?
बिल्डिंग तक पहुंचने वाली सड़क की चौड़ाई कितनी है?
एंट्री ग्रेट की चौड़ाई कितनी है?
परिसर के अंदर की सड़क की चौड़ाई कितनी है?
बिल्डिंग और सड़क के बीच की दूरी कितनी है?
इमरजेंसी एग्जिट है या नहीं?
कितनी सीढ़ियां हैं?
सीढ़ियों की चौड़ाई कितनी है?
बेसमेंट और ऊपरी मंजिलों के लिए अलग निकास हैं या नहीं?
फायर टावर है या नहीं?
एग्जिट गेट कैसा है?
कॉरिडोर की चौड़ाई कितनी है?
दरवाजों का आकार कितना है?
आग फैलने से रोकने की व्यवस्था क्या है?
फायर रेसिस्टेंट दीवार है या नहीं?
फायर कर्टेन है या नहीं?
धुआं निकालने की व्यवस्था कैसी है?
नैचुरल वेंटिलेशन कैसा है?
हर मंजिल पर कितने अग्निशमन यंत्र हैं?
अलार्म और डिटेक्शन सिस्टम है या नहीं?
स्मॉक डिटेक्टर्स है या नहीं?
स्प्रिंकलर सिस्टम है या नहीं?
बेसमेंट और ऊपरी मंजिलों में कितने स्प्रिंक्लर हैं और उनकी डिजाइन कैसी है?
कितनी लिफ्ट है, फायर लिफ्ट है या नहीं, पावर सप्लाई का क्या सिस्टम है?
फायर कंट्रोल है या नहीं, सेफ्टी ऑफिसर है या नहीं?
इसके अलावा भी कई तरह के सवालों के जवाब देने होते हैं और उन सवालों के जवाब के आधार पर डिपार्टमेंट की ओर से एनओसी दी जाती है.