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क्यों किसी की सुनना पसंद नहीं करते हैं जेन-जी? एक्सपर्ट ने बताया

जेन-जी को अक्सर ऐसी पीढ़ी माना जाता है जो हर बात पर सवाल करती है और बिना वजह किसी की बात मानने को तैयार नहीं होती. एक्सपर्ट कहते हैं- जेन-जी बात सुनना नहीं छोड़ रही है, लेकिन वे बिना समझे किसी बात को मानना पसंद नहीं करते. वे चाहते हैं कि उनकी बात भी सुनी जाए और उन्हें किसी बात के पीछे का कारण समझाया जाए.

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एक्सपर्ट कहती हैं कि इस पीढ़ी में पोस्ट या उम्र से ज्यादा तर्क और कारण ज्यादा जरूरी है. ( Photo: ITG)
एक्सपर्ट कहती हैं कि इस पीढ़ी में पोस्ट या उम्र से ज्यादा तर्क और कारण ज्यादा जरूरी है. ( Photo: ITG)

पहले के समय में घर के बड़े जो कह देते थे, उसे मान लेना ही सही समझा जाता था. बच्चे हों या युवा, अक्सर यह सोच होती थी कि बड़े हैं, तो ज्यादा जानते होंगे. इसलिए माता-पिता, टीचर या किसी सीनियर की बात पर ज्यादा सवाल नहीं किए जाते थे. उनकी बात को अनुभव और उम्र की वजह से सही मान लिया जाता था. लेकिन आज की जेन-जी की सोच कुछ अलग है. सिर्फ इसलिए कि कोई उम्र में बड़ा है या पोस्ट पर है, उसकी हर बात सही है- ऐसा मानना इस पीढ़ी के लिए जरूरी नहीं है. वे किसी बात को मानने से पहले उसकी वजह जानना चाहते हैं. उन्हें समझना होता है कि जो कहा जा रहा है, वह सही क्यों है और इसका बेस क्या है.

यही वजह है कि जब जेन-जी किसी बड़े की बात पर सवाल करता है या अपनी राय रखता है, तो कई बार सामने वाले को लगता है कि वह बहस कर रहा है या बात नहीं मान रहा. लेकिन साइकोलॉजिस्ट के मुताबिक, इसके पीछे अपनी सोच रखने और खुद फैसला लेने की इच्छा भी हो सकती है. तो आखिर जेन-जी की यह सोच पुरानी पीढ़ी से इतनी अलग क्यों है और क्या हर बात पर सवाल करना वाकई जिद है.

चलिए जानते हैं क्या कहते हैं एक्सपर्ट
साइकोलॉजिस्ट बिन्दा सिंह ने इस व्यवहार को समझने की कोशिश की है. वह कहती हैं कि आज की जेनरेशन यानी जेन-जी को लेकर अक्सर कहा जाता है कि ये लोग किसी की बात आसानी से नहीं मानते, हर चीज पर सवाल करते हैं और अपनी पसंद को ज्यादा महत्व देते हैं. कई बार माता-पिता, शिक्षक या ऑफिस के सीनियर भी शिकायत करते हैं कि जेन-जी उन्हें सुनने के बजाय अपनी बात पर अड़े रहते हैं. 

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बिन्दा सिंह कहती हैं कि आज के बच्चों में टॉलरेंस यानी छोटी-छोटी बातों को सहने की क्षमता पहले के मुकाबले कम दिखाई देती है. इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि उन्हें बचपन से ही बहुत सारी सुविधाएं मिल रही हैं. इंटरनेट और सोशल मीडिया ने उनकी दुनिया को और बड़ा कर दिया है. आज बच्चे किसी भी सवाल का जवाब तुरंत इंटरनेट या एआई से खोज सकते हैं. उन्हें कई ऐसी जानकारियां बहुत कम उम्र में मिल जाती हैं, जिनके लिए पहले लोगों को किताबों, शिक्षकों या बड़ों पर निर्भर रहना पड़ता था.

खुद को ज्यादा स्मार्ट समझते हैं जेन-जी
इसका एक असर यह भी हुआ है कि कई बच्चों को अपने नॉलेज पर बहुत ज्यादा भरोसा होने लगा है. उन्हें लगता है कि उन्हें बहुत कुछ पता है और शायद सामने वाला उतना नहीं जानता. यही सोच कई बार उन्हें बड़ों की बात सुनने से रोकती है. उन्हें लगता है कि जब मेरे पास हर सवाल का जवाब है, तो मुझे कोई समझाने की जरूरत क्यों है. यही वजह है कि आज की जेनरेशन के कुछ बच्चे खुद को दूसरों से अलग और ज्यादा स्मार्ट समझने लगते हैं. वे अपनी बात पर अड़े रहते हैं और किसी की सलाह या डांट आसानी से स्वीकार नहीं करते. इसका मतलब यह नहीं है कि हर बच्चा ऐसा ही है, लेकिन यह व्यवहार आज के समय में कई परिवारों में देखने को मिल रहा है.

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दूसरी तरफ, माता-पिता भी अपने बच्चों को लेकर पहले से ज्यादा सतर्क हो गए हैं. उन्हें डर रहता है कि अगर बच्चे को ज्यादा डांट दिया या उसकी बात नहीं मानी, तो वह कोई गलत कदम न उठा ले. इसी डर की वजह से कई माता-पिता बच्चों को समझाने या डांटने से पहले कई बार सोचते हैं. धीरे-धीरे इसका असर बच्चों के व्यवहार पर भी पड़ सकता है. उन्हें लगने लगता है कि उनकी हर बात सही है और उन्हें किसी की बात मानने की जरूरत नहीं है. इसलिए आज जरूरत सिर्फ बच्चों को समझाने की नहीं, बल्कि उन्हें सही तरीके से सुनने, समझने और सीमाएं तय करने की भी है.

जेन-जी ने इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बीच बचपन से ही दुनिया को देखा है. उनके लिए किसी जानकारी को सिर्फ इसलिए सही मान लेना आसान नहीं है क्योंकि उसे कोई बड़ा या अनुभवी व्यक्ति कह रहा है. वे तुरंत गूगल, सोशल मीडिया या दूसरी वेबसाइटों पर जाकर उसकी सच्चाई जांच सकते हैं. इसी वजह से इस पीढ़ी में ‘क्यों?’ और ‘कैसे?’ पूछने की आदत ज्यादा दिखाई देती है. एक्सपर्ट के मुताबिक, सवाल पूछना हमेशा दूसरों की बात न मानना नहीं होता. कई बार वे किसी चीज को खुद समझ कर फैसला लेना चाहते हैं. 

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एक्सपर्ट की बात क्यों नहीं मानते?
साइकोलॉजिस्ट बिन्दा सिंह बताती हैं कि इसे ऑटोनॉमी यानी खुद फैसला लेने की जरूरत से भी जोड़ा जाता है. जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उस पर कोई फैसला थोपा जा रहा है, तो वह स्वाभाविक रूप से उसका विरोध कर सकता है. इसे मनोविज्ञान में साइकोलॉजिकल रिएक्टेंस  (Psychological Reactance) कहा जाता है. इस थ्योरी के अनुसार, जब लोगों को लगता है कि उनकी आजादी या अपनी पसंद से फैसला लेने का अधिकार कम किया जा रहा है, तो वे उस रोक के खिलाफ प्रतिक्रिया दे सकते हैं. इसलिए अगर जेन-जी को सिर्फ यह कहा जाए कि ऐसा इसलिए करो क्योंकि मैं कह रहा हूं तो वह सवाल कर सकते हैं.

सोशल मीडिया ने सोचने का तरीका बदला
जेन-जी की परवरिश ऐसे समय में हुई है जब अलग-अलग विचार उनके सामने लगातार आते रहते हैं. सोशल मीडिया पर उन्हें एक ही मुद्दे पर कई तरह की राय देखने को मिलती है. इससे उनमें अपनी राय बनाने और अलग नजरिए को समझने की आदत भी डेवलप हुई है. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. सोशल मीडिया का लगातार इस्तेमाल ध्यान को प्रभावित कर सकता है और बहुत ज्यादा जानकारी के बीच किसी एक बात पर लंबे समय तक ध्यान देना मुश्किल हो सकता है. इसलिए कभी-कभी उनका बातचीत का तरीका पुरानी पीढ़ी को अधीर या असहमत नजर आ सकता है.

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एक्सपर्ट कहती हैं कि इस पीढ़ी में पोस्ट या उम्र से ज्यादा तर्क और कारण ज्यादा जरूरी है. यानी बॉस, टीचर या पेरेंट की बात सिर्फ इसलिए स्वीकार करने के बजाय वे जानना चाहते हैं कि ऐसा करने की वजह क्या है. उदाहरण के लिए ऑफिस में अगर सीनियर कहता है कि यह काम इसी तरह करना है, तो जेन-जी पूछ सकता है- क्या इसे दूसरे तरीके से ज्यादा बेहतर किया जा सकता है? सीनियर को यह बहस लग सकती है, जबकि युवा इसे बातचीत और समस्या सुलझाने का तरीका मान सकता है.

साइकोलॉजिस्ट पवन गुगरी कहते हैं कि जेन-जी बात सुनना नहीं छोड़ रही है, लेकिन वे बिना समझे किसी बात को मानना पसंद नहीं करते. वे चाहते हैं कि उनकी बात भी सुनी जाए और उन्हें किसी बात के पीछे का कारण समझाया जाए.

क्या हर जेन-जी ऐसा होता है?
हर जेन-जी एक जैसे नहीं होती. हर इंसान का व्यवहार उसके परिवार, पढ़ाई, माहौल, सोच और अनुभव पर निर्भर करता है. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि जेन-जी किसी की बात सुनना ही पसंद नहीं करती. हकीकत यह है कि इस पीढ़ी के कई युवा किसी आदेश को सीधे मानने के बजाय पहले यह जानना चाहते हैं कि ऐसा क्यों करना है. वे अपनी राय रखना और अपने फैसले खुद लेना भी पसंद करते हैं. एक्सपर्ट के मुताबिक, अगर माता-पिता, टीचर या ऑफिस के मैनेजर जेन-जी से अपनी बात मनवाना चाहते हैं तो सिर्फ आदेश देने के बजाय उनसे बात करना ज्यादा बेहतर तरीका हो सकता है. उन्हें किसी काम की वजह समझाएं, उनकी बात भी सुनें और जहां संभव हो, उन्हें कुछ विकल्प दें. इससे वे बात को ज्यादा आसानी से समझ सकते हैं.

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असल में जेन-जी और पुरानी पीढ़ी के बीच सोच का फर्क होना कोई नई बात नहीं है. हर पीढ़ी का सोचने और चीजों को देखने का अपना तरीका होता है. फर्क सिर्फ इतना है कि आज के युवाओं के पास इंटरनेट और सोशल मीडिया की वजह से जानकारी के बहुत ज्यादा साधन हैं. इसलिए उनकी हर असहमति को जिद या बदतमीजी समझना सही नहीं है. कई बार वे सिर्फ यह समझना चाहते हैं कि जो बात उनसे कही जा रही है, उसके पीछे वजह क्या है.

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