उत्तराखंड में मानसून ने अभी रफ्तार ही पकड़ी है, लेकिन पहाड़ों पर सरकारी तैयारियों की पोल भी खुलने लगी है. नैनीताल के सात नंबर स्थित आल्मा कॉटेज क्षेत्र में जमीन खिसकना एक बार फिर होने लगा है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक साल तक प्रशासन और संबंधित विभाग क्या करते रहे?
पिछले वर्ष बरसात के दौरान इस इलाके में सड़क और पहाड़ी में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ने के बाद कुमाऊँ कमिश्नर से लेकर जिला प्रशासन और कई विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण किया था. प्रभावित क्षेत्र का दौरा हुआ, निर्देश दिए गए, आश्वासन भी मिले, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थायी सुरक्षा या मरम्मत का कोई ठोस काम नहीं हुआ. अब जैसे ही इस साल मानसून ने दस्तक दी, वही पहाड़ी फिर खिसकने लगी और प्रशासन एक बार फिर राहत और बचाव की कवायद में जुट गया.
लगातार करीब आठ घंटे हुई मूसलाधार बारिश के बाद सात नंबर स्थित आल्मा कॉटेज और जिला पंचायत रोड क्षेत्र में भूधंसाव तेज हो गया. पहाड़ी का बड़ा हिस्सा खिसककर नीचे नाले में जा गिरा, जिससे पूरे इलाके में दहशत का माहौल है. सड़क के ऊपर बने पांच और नीचे स्थित सात परिवारों के मकान खतरे की जद में आ गए हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते सुरक्षा कार्य करा दिए गए होते तो आज यह स्थिति पैदा नहीं होती. मामले की गंभीरता को देखते हुए एसडीएम नवाजिश खालिक ने लोक निर्माण विभाग और सिंचाई विभाग के अधिकारियों के साथ मौके का निरीक्षण किया. उन्होंने प्रभावित क्षेत्र में तत्काल सुरक्षा और राहत कार्य शुरू करने, सड़क पर वाहनों की आवाजाही रोकने तथा जोखिम वाले भवनों में रह रहे परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट करने के निर्देश दिए हैं.
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि हर साल मानसून आने पर ही प्रशासन की नींद क्यों खुलती है? अगर पिछले साल हुए निरीक्षणों के बाद समय रहते स्थायी सुरक्षा कार्य कर दिए गए होते, तो शायद आज दर्जनों लोगों की जान और घर दोबारा खतरे में नहीं पड़ते. पहाड़ों में आपदा के बाद केवल निरीक्षण और बैठकों से नहीं, बल्कि समय पर जमीनी कार्रवाई से ही लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है.