भारत ने मंगलवार को दृढ़ता से कहा कि आतंकवाद से लड़ने के मामले में मनमर्जी भरा रवैया नहीं अपनाया जा सकता.
उन्होंने पाकिस्तान स्थित आतंकवादी शिविरों का पोशीदा अंदाज में उल्लेख करते हुए कहा कि अफगानिस्तान से बाहर बने आतंकवादी ठिकानों और पनाहगाहों को खत्म करने की जरूरत है. भारत ने यह भी कहा कि युद्धग्रस्त अफगानिस्तान में स्थिरता लाने की कोई भी नयी कवायद पूरी तरह से ‘अफगान नेतृत्व’ की होनी चाहिए.
इसके तहत हिंसा को अंत हो और ‘जेहादी’ या राज्य प्रायोजित किसी भी तरह के आतंकवाद से कोई सम्पर्क न रहे. अफगानिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विदेशमंत्री एस एम कृष्णा ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आतंकवाद से निपटने के मामले में मनमर्जी वाला रवैया नहीं अपनाया जाना चाहिए. अफगानिस्तान शांति प्रक्रिया का समर्थन करते हुए कृष्णा ने कहा कि यह प्रक्रिया ‘निर्णायक और पारदर्शी’ होनी चाहिए.
विदेश मंत्री एस एम कृष्णा ने कहा, ‘आतंकवाद को वर्गीकृत नहीं किया जा सकता. आज अल कायदा और उन अन्य आतंकवादी संगठनों में फर्क नहीं किया जा सकता जिन्होंने अल कायदा के तौर तरीके अपनाए हैं और जो अल कायदा के ही मकसद को पूरा कर रहे हैं.’ {mospagebreak}
उन्होंने कहा, ‘इसलिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि अफगानिस्तान से बाहर मौजूद आतंकवादियों के ठिकनों और पनाहगाहों को नष्ट किया जाए.’ कृष्णा ने कहा कि युद्धग्रस्त अफगानिस्तान में स्थायित्व लाने की किसी भी नयी कवायद में देश की आबादी के हर तबके को शामिल किया जाना चाहिए. भारत और अफगानिस्तान को ‘ऐतिहासिक दोस्त’ बताते हुए कृष्णा ने कहा कि भारत ने यहां राष्ट्र निर्माण और पुनर्निर्माण के अपने प्रयासों में ‘अफगान सरकार और यहां के लोगों की आकांक्षाओं को पूरी तरह से ध्यान में रखा है.’
उन्होंने कहा, ‘कट्टरपंथी और चरमपंथी संगठनों से अतीत में बातचीत से अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सबक लेना चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि शांति के लिए जो भी कवायद की जाए, वह निर्णायक और पारदर्शी हो.’ विदेशमंत्री एस एम कृष्णा ने कहा, ‘शांति और एकीकरण की दिशा में अफगानिस्तान के प्रयासों का भी भारत ने समर्थन किया है. लेकिन इन प्रयासों को सफल बनाने के लिए यह जरूरी है कि इनका नेतृत्व पूरी तरह से अफगान हाथों में हो और इसमें देश की आबादी के तमाम तबके शामिल हों, साथ ही उन बातों पर अमल हो जिन पर लंदन सम्मेलन में सहमति बनी थी.’
कृष्णा ने उल्लेख किया कि अफगानिस्तान के मुद्दे पर आयोजित लंदन सम्मेलन में हिंसा छोड़ने, आतंकवादियों से तमाम सम्पर्क खत्म करने, फिर वह चाहे ‘जेहादी’ हो या राज्य प्रायोजित और महिलाओं के अधिकार समेत अफगान संविधान के लोकतांत्रिक और बहुलवादी मूल्यों को स्वीकार करने पर जोर दिया गया था.