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बीट रिपोर्ट: सरकार बनाने से आखिर कहां चूक रहे थलपति विजय? क्या हैं कानूनी अड़चनें

234 सदस्यों वाली तमिलनाडु विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 118 विधायकों का समर्थन जरूरी है. विजय की पार्टी टीवीके को 108 सीटें मिली हैं, यानी बहुमत के आंकड़े से वह 10 सीट पीछे है.

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सीनियर एडवोकेट विकास सिंह के मुताबिक सबसे बड़ी अड़चन ये है कि विजय ने सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर सरकार बनाने का दावा नहीं किया है. (Photo: ITG)
सीनियर एडवोकेट विकास सिंह के मुताबिक सबसे बड़ी अड़चन ये है कि विजय ने सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर सरकार बनाने का दावा नहीं किया है. (Photo: ITG)

आखिर टीवीके के थलपति विजय कहां चूक रहे हैं? रील लाइफ की उनकी फिल्म जन नायकन की तरह उनकी राजनीतिक फिल्म भी रिलीज क्यों नहीं हो पा रही? आइए हम भी देखें कि कानूनी, तकनीकी वजहें क्या हैं? 

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद बहुमत से थोड़ा ही पीछे खड़ी सबसे बड़ी पार्टी तमिलगा वेट्री कषगम, यानी टीवीके प्रमुख जोसेफ चंद्रशेखर विजय उर्फ थलपति विजय को अब तक राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर ने सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया. दो बार उन्हें बैरंग लौटाया जा चुका है.

सीनियर एडवोकेट और संविधान के जानकार विकास सिंह के मुताबिक सबसे बड़ी अड़चन ये है कि विजय ने सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर सरकार बनाने का दावा नहीं किया है. वो कांग्रेस के समर्थन यानी गठबंधन के साथ बहुमत से कम विधायकों का समर्थन लेकर सरकार बनाने का अवसर मांग रहे हैं.

विजय का ये दावा तब सही होता जब कांग्रेस के समर्थन से वो बहुमत का जादुई आंकड़ा पार कर जाते, तो सदन में फ्लोर टेस्ट आसानी से पास कर जाते और राज्यपाल को अपनी सरकार की स्थिरता का भरोसा हो जाता. 

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सुप्रीम कोर्ट में आर के सिंह के मुताबिक राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर द्वारा विजय को बैरंग लौटाए जाने के मुख्य कारण तकनीकी और संवैधानिक हैं. विजय की पार्टी के 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बावजूद, उन्होंने सरकार बनाने का दावा करने में कानूनी और संवैधानिक गलतियां कीं हैं. 

तमिलनाडु विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 234 सदस्यों वाली तमिलनाडु विधान सभा में जादुई आंकड़ा 118 है. विजय की पार्टी ने 108 सीटें जीतीं हैं. यह बहुमत से 10 सीटें कम है. विजय ने पहले ही दावे में कांग्रेस के 5 विधायकों के समर्थन का दावा किया. यानी गठबंधन के साथ कुल संख्या 113 हो गई. लेकिन गवर्नर ने स्पष्ट किया कि उन्हें लिखित और वास्तविक रूप से 118 विधायकों के हस्ताक्षर चाहिए, न कि केवल मौखिक दावा.

विजय के सामने चुनौती

विजय ने दो निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव जीता है. चुनाव नियमों के अनुसार, उन्हें एक सीट छोड़नी होगी, तो कायदे से फ्लोर टेस्ट के समय टीवीके की वास्तविक सीटें 108 से घटकर 107 रह जाएगी. जिससे बहुमत का अंतर और बढ़ जाएगा. राज्यपाल को स्थिर सरकार का भरोसा न दिला पाना भी विजय के लिए फिलहाल बड़ी चुनौती है. 

गवर्नर का मानना है कि समुचित सदस्यों के समर्थन के बिना सरकार अल्पमत में होगी. वो कभी भी गिर सकती है. उन्होंने कहा कि जब तक 118 विधायकों के समर्थन का लिखित प्रमाण नहीं मिलता, तब तक शपथ ग्रहण नहीं हो सकता.

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राज्यपाल ने विजय को दोबारा 118 के आंकड़े के साथ लौटने को कहा है, क्योंकि वह यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि सरकार अस्थिर न हो. हालांकि ऐसा नहीं है कि बहुमत से पीछे रहकर विजय पहली बार सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं. केंद्र और राज्य में अल्पमत की सरकार कई बार बनी और चली भी.

कई ने तो अपना कार्यकाल भी पूरा किया है. 1991 में पी.वी. नरसिम्ह राव की सरकार भी कांग्रेस के अल्पमत में रहते हुए चली. लोकसभा में तब बहुमत के लिए 272 की जरूरत थी, लेकिन कांग्रेस 232 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी. नरसिम्हा राव ने अल्पमत सरकार बनाई.

छोटे दलों के बाहरी समर्थन से यह सरकार 5 साल चली. इसके 5 साल बाद 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी कि सरकार भी बनी लेकिन 13 दिन में ही गिर गई, तब आम चुनाव में भाजपा 161 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी. 

बहुमत से 111 सीट कम थीं, लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया. हालांकि बहुमत साबित न कर पाने के कारण सरकार मात्र 13 दिन में गिर गई. दो साल बाद 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा 182 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी और सहयोगियों के साथ मिलकर गठबंधन (NDA) सरकार बनाया. लेकिन एक वोट से अविश्वास प्रस्ताव हारने के बाद 13 महीने बाद सरकार गिर गई.

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