तमिलनाडु विधानसभा में पॉलिटिकिल क्राइसिस अभी भी बना हुआ है. बहुमत न मिलने के कारण सबसे अधिक वोटं के बावजूद टीवीके सरकार बनाने से अभी भी 10 कदम दूर है. इसी बीच थलपति विजय गवर्नर राजेंद्र आर्लेकर के पास दो बार सरकार बनाने का दावा करते हुए जा चुके हैं, लेकिन गवर्नर ने उन्हें वापस लौटा दिया है.
गवर्नर ने विजय से 118 विधायकों के समर्थन का हस्ताक्षर लाने को कहा है. राज्यपाल के 118 हस्ताक्षर वाली बात पर अड़े रहने और टीवीके को फ्लोर टेस्ट की अनुमति न देने के इस फैसले की अब आलोचना भी होने लगी है. वहीं पूरे मामले में एक 32 साल पुराना अदालती फैसला भी चर्चा में आ चुका है. इसका जिक्र बार-बार किया जा रहा है और विजय के समर्थन में इस फैसले को उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है.
सबसे पहले अभिनेता कमल हासन ने राज्यपाल के फैसले को लेकर सोशल मीडिया पर लिखा था कि, बहुमत का फैसला लोकभवन में नहीं, बल्कि विधानसभा के फ्लोर पर होना चाहिए. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक एसआर बोम्मई फैसले का हवाला देते हुए कहा कि राज्यपाल खुद अंतिम निर्णायक नहीं हो सकते. इसके बाद से ही एसआर बोम्मई का केस चर्चा में है.

देश के संवैधानिक इतिहास पर नजर डालें तो एसआर बोम्मई का ये मामला वाकई उदाहरण है. यह मामला सिर्फ कर्नाटक की राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने यह तय किया कि केंद्र सरकार और राज्यपाल किसी चुनी हुई राज्य सरकार को मनमाने तरीके से नहीं गिरा सकते. इस मामले की शुरुआत 1980 के दशक के आखिर में कर्नाटक से हुई. साल 1985 में जनता दल ने राज्य में सरकार बनाई थी और रामाकृष्णा हेगड़े सीएम थे. बाद में राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और 1988 में एसआर बोम्मई सीएम बनाए गए.
कुछ ही समय बाद जनता दल के कई विधायकों ने पार्टी छोड़ दी और सरकार से समर्थन वापस लेने का दावा किया. इसके बाद राज्यपाल ने यह मान लिया कि बोम्मई सरकार के पास बहुमत नहीं बचा है. बोम्मई ने राज्यपाल से विधानसभा में फ्लोर टेस्ट कराने की मांग की ताकि बहुमत साबित किया जा सके, लेकिन राज्यपाल ने उनकी मांग ठुकरा दी. इसके तुरंत बाद अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल करते हुए राज्य सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया.
क्या है आर्टिकल 356?
संविधान का अनुच्छेद 356 केंद्र सरकार को यह अधिकार देता है कि अगर किसी राज्य में संवैधानिक सिस्टम फेल हो जाए तो वहां राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है. लेकिन लंबे समय तक इस प्रावधान का राजनीतिक इस्तेमाल होता रहा. केंद्र में बैठी सरकारें, प्रदेशों में बनी विपक्षी दलों की सरकारों को गिराने के लिए इस आर्टिकल का इस्तेमाल करती रही हैं. 1950 से 1990 के बीच इस प्रावधान का दर्जनों बार उपयोग हुआ और कई मामलों में आरोप लगा कि यह संवैधानिक नहीं बल्कि राजनीतिक फैसला था. इसी दुरुपयोग पर रोक लगाने के लिए एसआर बोम्मई केस ऐतिहासिक साबित हुआ.
आखिरकार मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. यहां नौ जजों की संवैधानिक पीठ ने 1994 में ऐतिहासिक फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि किसी राज्य सरकार के बहुमत का फैसला राज्यपाल की निजी राय से नहीं, बल्कि विधानसभा के फ्लोर पर होना चाहिए. यानी अगर किसी मुख्यमंत्री के बहुमत पर संदेह है, तो उसका टेस्ट विधानसभा में वोटिंग के जरिए किया जाएगा. राज्यपाल सिर्फ अनुमान या दावों के आधार पर सरकार को अल्पमत घोषित नहीं कर सकते.
कोर्ट ने यह भी कहा कि आर्टिकल 356 के तहत राष्ट्रपति की शक्ति असीमित नहीं है. इसकी न्यायिक समीक्षा हो सकती है. अगर राष्ट्रपति शासन लगाने का फैसला मनमाना पाया जाता है, तो अदालत उसे रद्द भी कर सकती है. यही वह फैसला था जिसने भारतीय लोकतंत्र में 'फ्लोर टेस्ट' को संवैधानिक परंपरा का हिस्सा बना दिया.
फ्लोर टेस्ट लोकतंत्र की सबसे पारदर्शी प्रक्रिया मानी जाती है. इसमें विधानसभा के अंदर वोटिंग के जरिए यह तय होता है कि सरकार के पास बहुमत है या नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि निर्वाचित विधायकों की इच्छा विधानसभा में सामने आनी चाहिए, न कि लोकभवन के बंद कमरों में तय होनी चाहिए. यही वजह है कि बाद के वर्षों में महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और गोवा जैसे कई राज्यों में सरकार गठन या सरकार बचाने के मामलों में अदालतों ने फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दिया.

तमिलनाडु विवाद में क्यों हो रहा है बोम्मई केस का जिक्र?
तमिलनाडु में इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी टीवीके को सरकार बनाने का न्योता दें या पहले 118 विधायकों का समर्थन पत्र मांगना संवैधानिक रूप से सही है?
संवैधानिक विशेषज्ञों का तर्क है कि अगर टीवीके सबसे बड़ी पार्टी है, तो उसे पहले सरकार बनाने का मौका मिलना चाहिए और फिर विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए कहा जाना चाहिए. उनका कहना है कि एसआर बोम्मई फैसले की भावना यही है कि बहुमत का परीक्षण सदन में हो, न कि पहले से राजभवन में 'नंबर गेम' के जरिए.
दूसरी तरफ कुछ संवैधानिक विशेषज्ञ मानते हैं कि राज्यपाल यह सुनिश्चित करने के लिए समर्थन पत्र मांग सकते हैं कि सरकार बनने के तुरंत बाद गिर न जाए. उनका कहना है कि राज्यपाल का दायित्व स्थिर सरकार सुनिश्चित करना भी है. यहीं से राज्यपाल के 'विवेकाधिकार' और 'संवैधानिक मर्यादा' की बहस शुरू होती है.
क्या राज्यपाल के पास विशेष अधिकार हैं?
संविधान में राज्यपाल को कुछ सीमित विवेकाधिकार दिए गए हैं, खासकर तब जब चुनाव में स्पष्ट बहुमत न हो. लेकिन सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि यह विवेकाधिकार मनमाना नहीं हो सकता. सरकारिया आयोग और पुंछी आयोग ने भी सुझाव दिया था कि ऐसी स्थिति में पहले सबसे बड़ी पार्टी को मौका दिया जाना चाहिए. यदि वह बहुमत साबित न कर पाए, तभी दूसरे विकल्पों पर विचार होना चाहिए. यानी राज्यपाल संविधान के संरक्षक जरूर हैं, लेकिन वे राजनीतिक फैसलों के अंतिम निर्णायक नहीं हो सकते.

30 साल बाद भी क्यों प्रासंगिक है बोम्मई फैसला?
एसआर बोम्मई फैसला सिर्फ एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि भारतीय संघवाद की सुरक्षा कवच माना जाता है. इसने केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन को मजबूत किया.
इस फैसले ने तीन बड़े सिद्धांत स्थापित किए-
- चुनी हुई सरकारों को आसानी से नहीं गिराया जा सकता
- बहुमत का फैसला विधानसभा में होगा
- राष्ट्रपति और राज्यपाल की शक्तियां न्यायिक समीक्षा के दायरे में हैं
तमिलनाडु का मौजूदा विवाद भी इसी वजह से सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक बहस का विषय बन गया है. अब देखना ये है कि एसआर बोम्मई केस विजय के राजतिलक की चाबी बन पाता है या नहीं?