संसद के बजट सत्र का दूसरा फेज सोमवार से शुरू हो रहा है. यह काफी हंगामेदार होने वाला है. बजट सत्र के पहले फेज में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सदन में बोल नहीं सके, क्योंकि बजट के मुद्दे पर बोलने के बजाय पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित किताब में चीन के साथ सीमा विवाद पर लिखे गए अंश पर अपनी बात रखना चाहते थे. इसके जवाब में विपक्ष ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का दांव चला.
स्पीकर ओम बिरला ने राहुल गांधी को बजट चर्चा के दौरान केवल बजट पर बोलने या नियमों (Rule 349) का पालन करने की बात कही थी, जबकि राहुल गांधी चीन के साथ गतिरोध पर पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे के अप्रकाशित संस्मरणों का हवाला देना चाहते थे. ऐसे में स्पीकर ने नियमों के विरुद्ध बताते हुए राहुल गांधी को बोलने की अनुमति नहीं दी थी.
बजट सत्र के पहले फेज में राहुल ने कई बार बोलने की कोशिश की, लेकिन हर बार उन्हें रोक दिया गया. इसके चलते कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों ने स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ले आया. विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव से भले ही स्पीकर न हट सके, लेकिन ओम बिरला को बजट के पहले सत्र में 'खामोश' कर दिया था.
राहुल गांधी हुए साइलेंट तो स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव
लोकसभा में राहुल गांधी को स्पीकर ने बोलने की इजाजत नहीं दी. इस पर राहुल गांधी ने कहा था कि हिंदुस्तान के इतिहास में इस साल पहली बार लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का बोलने नहीं दिया गया. मैंने स्पीच शुरू की. मुझे रोका गया. फिर शुरू की, फिर रोका गया. इसके जवाब में विपक्ष ने स्पीकर ओम बिरला को हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लेकर आया.
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लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को हटाने के प्रस्ताव पर कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार ने कहा था कि सदन में विपक्ष के नेता को सरकार के खिलाफ बोलने की इजाजत नहीं दी गई. लोकसभा में एकतरफा शासन चल रहा था. इसलिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला अविश्वास प्रस्ताव का सामना कर रहे हैं. साथ ही कांग्रेस के सांसद सुखदेव भगत ने कहा कि अगर अंपायर खुद पक्षपाती हो जाए, तो खेल सत्ता का हो जाता है, लोकतंत्र का नहीं. इसीलिए हमने प्रस्ताव पेश किया है.
सुखदेव भगत ने कहा कि जिस तरह राहुल गांधी की आवाज दबाई जा रही है, उसी तरह विपक्ष की आवाज भी दबाई जा रही है. लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर में जन मुद्दे गायब हो जाते हैं. इसीलिए हमने यह कदम उठाया हैय मेरा मानना है कि हर पार्टी के लोग, हर विपक्षी पार्टी के लोग, महसूस करते हैं कि उनके साथ निष्पक्ष व्यवहार नहीं किया जा रहा है. उन्हें उचित समय नहीं दिया जा रहा है, और हर पार्टी हमारे साथ है.
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को विपक्ष ने किया खामोश
पिछले महीने बजट सत्र के पहले चरण के दौरान, विपक्ष ने लोकसभा के महासचिव को अविश्वास प्रस्ताव सौंपकर अध्यक्ष को हटाने की मांग की थी. इस प्रस्ताव में विपक्षी सांसदों ने ओम बिरला पर पक्षपातपूर्ण तरीके से काम करने का आरोप लगाया था. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके, वामपंथी दलों और अन्य दलों के 118 सांसदों ने इस पर हस्ताक्षर किए थे.
अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिए जाने के बाद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला अब लोकसभा की कार्यवाही का संचालन नहीं कर सके. ओम बिरला ने निष्पक्षता बनाए रखने के लिए सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता से खुद को अलग कर लिया था. ऐसे में जब तक प्रस्ताव पर फैसला नहीं हो जाता, ओम बिरला पीठासीन अधिकारी (स्पीकर की कुर्सी) के रूप में काम नहीं करेंगे.
स्पीकर ओम बिरला सदन में भी उसके बाद नहीं आए. इस तरह उन्होंने लोकसभा की कार्यवाही से खुद को पूरी तरह अलग कर रखा है. उस दिन के बाद से सदन की कार्यवाही डिप्टी स्पीकर या किसी वरिष्ठ सदस्य द्वारा संचालित की जा रही है. यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि प्रक्रिया निष्पक्ष तरीके से पूरी हो सके और स्पीकर स्वयं उस प्रक्रिया का हिस्सा न बनें, जिसमें उनके पद पर सवाल उठाए जा रहे हों.
क्या स्पीकर ओम बिरला को हटा पाएंगा विपक्षी सांसद
लोकसभा स्पीकर को हटाने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता नहीं होती. इसके लिए साधारण बहुमत ही पर्याप्त होता है. यानी उस समय सदन में जितने भी सांसद मौजूद हों और मतदान कर रहे हों, उनमें से आधे से एक अधिक सांसदों का समर्थन मिलना जरूरी है. उदाहरण के तौर पर यदि उस समय कुल 400 सांसद मौजूद हैं और मतदान कर रहे हैं, तो प्रस्ताव पास होने के लिए कम से कम 201 सांसदों का समर्थन चाहिए.
विपक्ष के तमाम दल पूरी तरह से एकजुट है, जिसमें कांग्रेस से लेकर सपा, टीएमसी, लेफ्ट सहित सभी विपक्षी दल साथ हैं. विपक्ष का आरोप है कि स्पीकर ने सदन में विपक्ष के नेताओं को खासकर लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को बोलने का पर्याप्त मौका नहीं दिया और कुछ मामलों में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया.
हालांकि, बीजेपी सहित सभी एनडीए के सहयोगी दल एक साथ स्पीकर के साथ खड़े हैं. एनडीए के सांसदों की संख्या लोकसभा में विपक्ष के कुल सदस्यों की संख्या से ज्यादा है. ऐसे में सत्तापक्ष के सांसद अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग के दौरान विपक्ष से ज्यादा रहते हैं तो स्पीकर को कुर्सी से नहीं हटा सकेंगे. पीएम मोदी ने स्पीकर ओम बिरला को अपना समर्थन दे दिया है, उससे साफ है कि एनडीए के ज्यादातर सांसद मौजूद रहेंगे. ऐसे में भी ओम बिरला को भले ही विपक्ष न हटा सके, लेकिन अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग तक स्पीकर को खामोश करने का दांव सफल हो जाएगा.
हर बार फेल हुआ है स्पीकर के खिलाफ अविश्वप्रस्ताव
आजादी मिलने के बाद लोकसभा स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव बहुत कम बार लाया गया है. अब तक के इतिहास में सिर्फ तीन बार ही लोकसभा स्पीकर को हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाए गए हैं. 1954 में लोकसभा स्पीकर जीवी मावलंकर के खिलाफ पहला प्रस्ताव लाया गया. 1966 में लोकसभा के स्पीकर रहे हुकम सिंह के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया था. इसके बाद 1987 में स्पीकर रहे बलराम जाखड़ के खिलाफ विपक्ष प्रस्ताव लाया था.
हालांकि, हर बार विपक्ष को सफलता नहीं मिली और प्रस्ताव गिर गया. मौजूदा प्रस्ताव को मिलाकर यह चौथा मौका है जब स्पीकर के खिलाफ ऐसा कदम उठाया गया है. इस बार भी विपक्ष को स्पीकर को हटाने की सफलता मिलना मुश्किल है, लेकिन विपक्ष की एक रणनीति जरूर कामयाब हो गई है. विपक्ष एकजुट नजर आ रहा है तो दूसरा स्पीकर ओम बिरला को बजट सत्र के पहले सत्र में खामोश कर दिया और अब दूसरे सत्र में प्रस्ताव पर वोटिंग होने तक ओम बिरला अपनी कुर्सी पर नहीं बैठ सकेंगे.