वेस्ट एशिया में जारी संघर्ष और ऑपरेशन सिंदूर से मिले अनुभवों के बाद भारत अब अपनी सैन्य तैयारियों को बड़े स्तर पर ले जा रहा है. इसके तहत रक्षा मंत्रालय भारतीय वायु सेना के लिए 1000 किलोग्राम के 'मेड इन इंडिया' एरियल बमों की खरीद की दिशा में आगे बढ़ रहा है. यह कदम सीधे तौर पर वायु सेना की मारक क्षमता को बढ़ाएगा.
इन बमों को अमेरिका की घातक MK-84 जैसी क्षमता वाला माना जा रहा है, जो करीब 2000 पाउंड विस्फोटक ले जाने में सक्षम होता है. अभी तक इस श्रेणी के बमों के लिए भारत को विदेशी निर्माताओं पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन अब फोकस मेड इन इंडिया पर है. रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 के तहत ऐसे 600 हवाई बमों में रुचि दिखाई गई है.
इसमें इन बमों के डिजाइन, विकास और खरीद की प्रक्रिया शामिल है. इन बमों के साथ टेल यूनिट और अन्य जरूरी उपकरण भी शामिल होंगे. इस पूरी परियोजना को बाय इंडियन श्रेणी के तहत लागू किया जाएगा, जिससे घरेलू रक्षा उद्योग को बढ़ावा मिलेगा. एयरफोर्स इन बमों को बड़े पैमाने पर अपने ऑपरेशनल स्ट्रक्चर में शामिल करना चाहती है.
प्रस्तावित बमों को नेचुरल फ्रैगमेंटेशन और हाई-कैलिबर श्रेणी का बताया गया है. ये बम विस्फोट के बाद बड़े पैमाने पर टुकड़ों में बिखरकर दुश्मन के ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाने में सक्षम होंगे. खास बात यह है कि इन बमों को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि इन्हें भारतीय वायु सेना के बेड़े में शामिल रूसी और पश्चिमी लड़ाकू विमानों से दागा जा सके.
इस पूरी परियोजना को दो प्रमुख चरणों में बांटा गया है. पहले चरण में छह प्रोटोटाइप तैयार किए जाएंगे. इनमें लाइव और इनर्ट दोनों तरह के बम शामिल होंगे. इनके साथ टेल यूनिट और अन्य जरूरी सिस्टम भी विकसित किए जाएंगे. इस चरण में कम्पोजिट ट्रायल होंगे और एयर स्टाफ क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट के आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा.
इसके साथ ही यह अनिवार्य किया गया है कि विकास प्रक्रिया में कम से कम 50 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल हो. दूसरे चरण में योग्य एजेंसियों को कमर्शियल RFP जारी किया जाएगा और बाय इंडियन श्रेणी के तहत अंतिम खरीद की जाएगी. इस प्रोजेक्ट की कुल समयसीमा लगभग 2.5 साल रखी गई है. इसमें पूरी प्रक्रिया को शामिल किया गया है.
ट्रायल भारत के भीतर ही किए जाएंगे और भारतीय वायु सेना के तय एयरक्राफ्ट प्लेटफॉर्म पर इन बमों की टेस्टिंग होगी. इससे न सिर्फ समय की बचत होगी, बल्कि सिस्टम को भारतीय जरूरतों के मुताबिक बेहतर ढंग से तैयार किया जा सकेगा. इस परियोजना में भारतीय कंपनियों के साथ-साथ निजी क्षेत्र को भी भागीदारी का मौका दिया गया है.
जरूरत पड़ने पर विदेशी सहयोग जैसे जॉइंट वेंचर, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर या ऑफ-द-शेल्फ व्यवस्था की भी अनुमति होगी. हालांकि, शर्त साफ है कि डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग में स्वदेशी हिस्सेदारी को प्राथमिकता देनी होगी. तकनीकी और वित्तीय मानकों के आधार पर कंपनियों का चयन किया जाएगा. इसमें उनकी इंजीनियरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर की भी जांच होगी.