राजनीति संभावनाओं का खेल है, और भारत में तो ये संभावनाएं इतनी अनोखी हैं कि अच्छे-अच्छों का सिर चकरा जाए. यहां न कोई पक्का दोस्त है, न कोई पक्का दुश्मन. बस एक चीज पक्की है कुर्सी. कल तक जो एक-दूसरे को पानी पी-पीकर कोस रहे थे, आज वही एक ही मंच पर मुस्कुराते हुए हाथ मिलाते दिख जाते हैं. विचारधारा? वो तो कहीं पीछे छूट जाती है जब सत्ता का समीकरण सामने हो. भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं जब धुर विरोधियों ने साथ मिलकर सरकार बनाई और जनता बस देखती रह गई.
इन बेमेल गठबंधनों की फेहरिस्त में एक बड़ा नाम आम आदमी पार्टी और कांग्रेस का भी आता है. साल 2013 के उस दौर को याद कीजिए, जब अन्ना हजारे के बड़े भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की कोख से केजरीवाल की पार्टी ने जन्म लिया था. उस वक्त आम आदमी पार्टी का पूरा वजूद ही कांग्रेस के विरोध की नींव पर टिका हुआ था. अरविंद केजरीवाल के साथ उनकी पूरी टीम ने अपना चुनाव प्रचार सिर्फ इसी एक बात पर केंद्रित किया था कि वे भ्रष्ट कांग्रेस के एकदम उलट एक नई राजनीति लेकर आए हैं. शीला दीक्षित की सरकार के खिलाफ 2G और कॉमनवेल्थ जैसे बड़े घोटालों के तीखे आरोप मढ़ते हुए 'आप' दिल्ली की सत्ता के एकदम करीब जा पहुंची थी.
लेकिन जब 2013 के चुनाव नतीजे आए, तो 'आप' को 28 सीटें मिलीं जो बहुमत से कम थीं. ऐसे में एक बड़ा ट्विस्ट आया. जिस कांग्रेस के 8 विधायकों को केजरीवाल दिन-रात कोसते नहीं थकते थे, अंत में उन्हीं के बाहरी समर्थन से अरविंद केजरीवाल पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर जा बैठे. यह भारतीय राजनीति के सबसे अजीब और हैरान करने वाले गठबंधनों में से एक था. हालांकि, यह साथ सिर्फ 49 दिन ही चल सका. केजरीवाल ने बड़े नाटकीय अंदाज में इस्तीफा दे दिया और आरोप लगाया कि कांग्रेस जनलोकपाल बिल का समर्थन नहीं कर रही है.
जब कुर्सी की खातिर एक मंच पर आ गए जानी दुश्मन
अगर दिल्ली का मेल-मिलाप हैरान करने वाला था, तो जम्मू-कश्मीर में साल 2015 से 2018 के बीच जो हुआ, उसे राजनीति का 'नॉर्थ पोल और साउथ पोल' मिलन कहा गया. एक तरफ भारतीय जनता पार्टी थी, जिसकी राजनीति अपनी खास विचारधारा के इर्द-गिर्द घूमती है. दूसरी तरफ महबूबा मुफ्ती की पीडीपी थी, जिसका नजरिया कश्मीर को लेकर बिल्कुल अलग था. इन दोनों का साथ आना किसी अजूबे से कम नहीं था. मुफ्ती मोहम्मद सईद और बाद में महबूबा मुफ्ती ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार तो चलाई, लेकिन वैचारिक मतभेदों के कारण 2018 में यह साथ टूट गया.
बिहार की तो बात ही निराली है. यहां नीतीश कुमार और लालू यादव की जोड़ी ने राजनीति के हर रंग दिखा दिए हैं. असल में नीतीश कुमार की जदयू का उदय और सत्ता तक का सफर ही लालू यादव की आरजेडी के विरोध में शुरू हुआ था. उस समय लालू की राजनीति को 'यादव-मुस्लिम' समीकरण और 'जंगलराज' से जोड़कर देखा जाता था, जिसे खत्म करने के लिए नीतीश ने बीजेपी से हाथ मिलाया था. सालों तक एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन रहे ये दोनों नेता 2015 में 'महागठबंधन' बनाकर सबको चौंकाते हुए साथ आ गए. नीतीश ने बीजेपी का साथ छोड़ लालू-कांग्रेस से हाथ मिलाया, फिर थोड़े दिन बाद नाता तोड़कर वापस NDA के पाले में चले गए. खेल यहीं नहीं रुका, 2022 में उन्होंने फिर पलटी मारी और दोबारा आरजेडी के साथ हो लिए, और फिर एक बार फिर पाला बदल लिया. बिहार की सियासत में पाला बदलने का यह खेल सबसे ज्यादा चर्चा में रहा है.
महाराष्ट्र में तो साल 2019 में जो कुछ भी हुआ, उसने हर किसी को सन्न करके रख दिया था. बाल ठाकरे की जिस शिवसेना की पहचान ही दशकों तक कांग्रेस के खिलाफ कट्टर हिंदुत्व और मराठी राष्ट्रवाद की राजनीति रही, उसी पार्टी के इतिहास में एक ऐसा मोड़ आया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. बरसों तक बीजेपी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली शिवसेना के रुख में बड़ा बदलाव तब दिखा, जब मुख्यमंत्री पद की कुर्सी को लेकर उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाले गुट की बीजेपी से अनबन हो गई.
नतीजा यह हुआ कि दशकों पुरानी दोस्ती टूट गई और उद्धव ठाकरे ने एक बड़ा वैचारिक यू-टर्न लेते हुए कांग्रेस और एनसीपी के साथ हाथ मिला लिया. जहां कांग्रेस को हमेशा एक सेकुलर पार्टी के तौर पर देखा जाता था, वहीं शिवसेना की जड़ें एकदम अलग थीं. इसके बावजूद, महा विकास अघाड़ी सरकार वजूद में आई और सत्ता की खातिर ये धुर विरोधी विचारधाराएं एक ही छत के नीचे बैठकर सरकार चलाने लगीं.
उत्तर प्रदेश में भी साल 2019 के लोकसभा चुनाव में कुछ ऐसा ही हुआ. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी, जिनके बीच दशकों पुरानी कड़वाहट और हिंसक इतिहास रहा है, वे बीजेपी को रोकने के लिए एक साथ आ गए. अखिलेश यादव और मायावती का एक मंच पर आना और साथ चुनाव लड़ना साबित करता है कि सत्ता की बिसात पर पुराने जख्म आसानी से भुला दिए जाते हैं. हालांकि इसे बड़ी चुनावी सफलता नहीं मिली, लेकिन इस मेल ने सियासी गलियारों में खूब सुर्खियां बटोरीं.
कुल मिलाकर, ऐसा नहीं है कि इतिहास में कभी इस तरह के मेल-मिलाप नहीं हुए. अगर पीछे मुड़कर देखें तो गेस्ट हाउस कांड जैसी कड़वाहट के बाद भी मायावती की बसपा और समाजवादी पार्टी का साथ आना सबको हैरान कर गया था. बिहार में तो लालू की आरजेडी और नीतीश की जेडीयू ने दुश्मनी भुलाकर दो-दो बार सरकार ही बना ली. दिल्ली का किस्सा भी कुछ ऐसा ही है, जहां आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को ही हराकर, फिर उसी का समर्थन लेकर पहली बार सत्ता संभाली. महाराष्ट्र में शिवसेना और कांग्रेस का हाथ मिलाना भी इसी लंबी लिस्ट का एक हिस्सा है.
कहने का सीधा मतलब ये है कि सत्ता की खातिर हमारे नेता कई बार सिद्धांतों की भी बलि दे देते हैं. अब तमिलनाडु के मामले में दिलचस्प बात ये है कि वहां DMK और AIADMK की वो पुरानी लीडरशिप बदल चुकी है, जिनके बीच कट्टर दुश्मनी हुआ करती थी. नए दौर के नेताओं के बीच अब पुरानी कड़वाहट वैसी नहीं रही, इसीलिए वहां अब किसी भी गठबंधन की राह पहले से कहीं ज्यादा आसान लगती है.