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'पारिवारिक तनाव उकसावा नहीं माना जा सकता', पत्नी के सुसाइड केस में पति को SC से राहत

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वैवाहिक जीवन में कुछ दिन बातचीत बंद होना या सामान्य विवाद आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं है. जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की बेंच ने एक अहम फैसले में कहा कि आपराधिक उकसाव साबित करने के लिए ठोस सबूत जरूरी हैं.

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कोर्ट ने निचली अदालत का फैसला पलट दिया. (File Photo: ITG)
कोर्ट ने निचली अदालत का फैसला पलट दिया. (File Photo: ITG)

सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में पति और उसके परिवार को बड़ी राहत दी है. दरअसल, एक पति मस्कट में काम करता था और वीजा में देरी की वजह से पत्नी उसके साथ नहीं जा पाई थी, जिससे दोनों के बीच झगड़ा हो गया. पति के विदेश जाने के बाद 13 दिनों तक दोनों के बीच बातचीत बंद रही. इसी दौरान पत्नी ने मायके में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. 

मृतका के परिजनों ने पति और ससुराल वालों पर दहेज प्रताड़ना और आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया था.

निचली अदालत और हाईकोर्ट ने पति को तीन साल की सजा सुनाई थी.

कोर्ट ने क्यों पलटा निचली अदालत का फैसला?

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि सिर्फ कुछ दिनों तक बातचीत न होना या पारिवारिक तनाव 'क्रूरता' की कानूनी परिभाषा में नहीं आता है. कोर्ट ने साफ तौर से कहा कि किसी को आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध साबित करने के लिए यह सिद्ध होना जरूरी है कि आरोपी ने ऐसा कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष काम किया हो, जिससे पीड़ित के पास कोई अन्य विकल्प न बचा हो. सामान्य मनमुटाव या भावनात्मक तनाव को स्वचालित रूप से आपराधिक उकसाव नहीं माना जा सकता है. इस आधार पर कोर्ट ने निचली अदालतों की सजा को न्याय सम्मत नहीं माना.

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इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने एक कड़ा मैसेज दिया है कि वैवाहिक जीवन में होने वाले सामान्य पारिवारिक तनाव और आपराधिक गतिविधियों के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए. सिर्फ आरोप लगा देने से ही किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

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कानून की नजर में 'क्रूरता' का मतलब बहुत गंभीर है और इसके लिए आरोपी के ऐसे आचरण का होना जरूरी है, जो पीड़ित को चरम कदम उठाने के लिए बाध्य कर दे. यह फैसला उन मामलों में एक नजीर बनेगा, जहां सामान्य घरेलू विवादों को दहेज प्रताड़ना या उकसाने के बड़े मामलों में बदल दिया जाता है.

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