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अरावली की नई परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त! जांच के लिए बनाई गई हाई-लेवल कमेटी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अरावली को लेकर केंद्र सरकार की रिपोर्ट में कई अहम बातें साफ नहीं हैं. अब विशेषज्ञों की नई कमेटी पूरे मामले की स्वतंत्र और साइंटिफिक जांच करेगी.

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केंद्र सरकार की रिपोर्ट पर जांच के लिए बनी कमेटी (File Photo: Getty)
केंद्र सरकार की रिपोर्ट पर जांच के लिए बनी कमेटी (File Photo: Getty)

सुप्रीम कोर्ट ने अरावली हिल्स की परिभाषा और सीमांकन पर केंद्र सरकार की रिपोर्ट की समीक्षा के लिए एक हाई-पावर्ड कमेटी (HPC) बनाई है. अदालत ने कहा कि रिपोर्ट में कई ऐसी बातें हैं, जो समझ से बाहर हैं, इसलिए इनकी निष्पक्ष और साइंटिफिक जांच जरूरी है. कमेटी को 31 अगस्त 2026 तक अपनी रिपोर्ट देनी होगी.

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 29 दिसंबर को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट को लागू करने पर रोक लगा दी थी. अदालत ने कहा था कि अरावली क्षेत्र का नया वैज्ञानिक और पर्यावरणीय आकलन स्वतंत्र विशेषज्ञों से कराया जाए. 

कोर्ट के मुताबिक, सभी पक्षों से राय लेने के बाद निष्पक्ष और स्वतंत्र विशेषज्ञों की रिपोर्ट जरूरी है, जिससे अरावली पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़े विवादित मुद्दों पर फैसला लिया जा सके.

पीटीआई की रिपोर्ट मुताबिक, नई कमेटी की अगुवाई कंचन देवी करेंगी, जो 1991 बैच की भारतीय वन सेवा (IFS) की अधिकारी है. यह समिति इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड ए़जुकेशन (ICFRE) के नेतृत्व में काम करेगी. ICFRE, पर्यावरण मंत्रालय के तहत काम करने वाली एक स्वतंत्र संस्था है, जो फॉरेस्ट्री और पर्यावरण से जुड़े शोध और शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करती है. इसके साथ ही, समिति में पूर्व वन सर्वेक्षण महानिदेशक डॉ. सुभाष अशुतोष, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के पूर्व निदेशक डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा, पर्यावरण मंत्रालय के पूर्व संयुक्त सचिव बृज मोहन सिंह राठौड़ और दिल्ली विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के पूर्व प्रमुख प्रो. अशोक के. भटनागर भी शामिल हैं.  

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इसके अलावा, इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स, बेंगलुरु के प्रोफेसर जगदीश कृष्णास्वामी और केंद्रीय विश्वविद्यालय हरियाणा के प्रो. लक्ष्मीकांत शर्मा को विशेष तौर पर सदस्य बनाया गया है. जरूरत पड़ने पर समिति की अध्यक्ष उनसे काम ले सकेंगी. कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय को निदेशक स्तर के एक अधिकारी को समिति का सदस्य सचिव बनाने का निर्देश भी दिया है.

किन मुद्दों पर होगी जांच?

समिति अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट से जुड़े कई अहम सवालों की जांच करेगी. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अरावली क्षेत्र को सिर्फ उन जगहों तक सीमित करना सही है, जहां दो या उससे ज्यादा पहाड़ियां एक-दूसरे से 500 मीटर के अंदर हों. अदालत का मानना है कि ऐसा करने से संरक्षित क्षेत्र छोटा हो सकता है और खनन जैसी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियां जारी रह सकती हैं. इसके अलावा समिति यह भी देखेगी कि 100 मीटर या उससे ज्यादा ऊंची अरावली की पहाड़ियां, भले ही वे 500 मीटर से ज्यादा दूरी पर हों, क्या एक ही प्राकृतिक और पर्यावरणीय तंत्र का हिस्सा मानी जानी चाहिए. पहाड़ियों के बीच के इलाकों में खनन की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं, इसकी भी जांच की जाएगी.

राजस्थान की पहाड़ियों के दावे की भी होगी जांच

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अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट में कहा गया था कि राजस्थान की 12,081 पहाड़ियों में से सिर्फ 1,048 ही 100 मीटर ऊंचाई के मानक को पूरा करती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी से यह जांचने को कहा है कि यह आकलन वैज्ञानिक और तथ्यात्मक रूप से सही है या नहीं. साथ ही यह भी देखा जाएगा कि क्या इससे कम ऊंचाई वाली बड़ी संख्या में पहाड़ियां पर्यावरणीय संरक्षण से बाहर हो जाएंगी. समिति यह भी जांच करेगी कि मौजूदा नियमों और व्यवस्था में कोई बड़ी कमी तो नहीं है. इसके साथ ही, यह भी देखा जाएगा कि अरावली पर्वतमाला के लिए व्यापक वैज्ञानिक और भूवैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत है या नहीं.

कमेटी का गठन कोर्ट में सभी पक्षों से चर्चा के बाद किया गया है. 25 मई की सुनवाई में केंद्र सरकार ने कहा था कि एमिकस क्यूरी और सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) की सिफारिशों में शामिल चार विशेषज्ञों को समिति में रखा जा सकता है. इसके साथ ही, ICFRE के महानिदेशक को समिति का अध्यक्ष बनाने का सुझाव भी दिया गया था.

 
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