आवारा कुत्तों से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न राज्यों के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई. अदालत ने कहा कि कई राज्यों ने अब तक आवारा कुत्तों की नसबंदी (स्टेरलाइजेशन), डॉग पाउंड स्थापित करने और शैक्षणिक व अन्य संस्थानों के परिसरों से कुत्तों को हटाने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए हैं. कोर्ट ने असम से जुड़े आंकड़ों पर विशेष रूप से हैरानी जताई.
अदालत के अनुसार, असम में वर्ष 2024 के दौरान कुत्तों के काटने के 1.66 लाख मामले सामने आए, जबकि पूरे राज्य में केवल एक ही डॉग सेंटर मौजूद है. इसके अलावा, वर्ष 2025 में सिर्फ जनवरी महीने में ही 20,900 लोगों को कुत्तों ने काटा, जिसे कोर्ट ने बेहद चौंकाने वाला आंकड़ा बताया. इस मामले में अगली सुनवाई गुरुवार, 5 फरवरी को जारी रहेगी.
मामले में एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) गौरव अग्रवाल ने कोर्ट को बताया कि आंध्र प्रदेश में कुल 39 एबीसी (एनिमल बर्थ कंट्रोल) सेंटर हैं, जहां प्रतिदिन 1,619 कुत्तों की नसबंदी की जा सकती है. उन्होंने कहा कि राज्य को मौजूदा सुविधाओं का ऑडिट करना चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि उनका पूरा उपयोग हो रहा है या नहीं. साथ ही नए एबीसी सेंटर स्थापित करने के लिए एक स्पष्ट समय-सीमा तय की जानी चाहिए.
उन्होंने यह भी कहा कि आवारा कुत्तों की पहचान के लिए संबंधित हितधारकों की मदद ली जानी चाहिए. असम के संदर्भ में एमिकस क्यूरी ने बताया कि राज्य में केवल तीन म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन हैं और वहीं से एबीसी कार्यक्रम की शुरुआत करनी होगी. उन्होंने कहा कि असम में एबीसी सेंटरों की संख्या बेहद कम है और इन्हें बढ़ाने के लिए एक विस्तृत एक्शन प्लान तैयार किया जाना चाहिए.
केरल और गोवा के मामलों पर एमिकस क्यूरी ने कहा कि इन राज्यों के समुद्र तटों पर बड़ी संख्या में आवारा कुत्ते मौजूद हैं और उन्हें वहीं वापस नहीं छोड़ा जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि इससे पर्यटन पर नकारात्मक असर पड़ेगा, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड्स एसोसिएशन (SCAORA) के सम्मेलन के दौरान अनुभव किया गया. एमिकस क्यूरी ने अदालत के समक्ष सभी राज्यों द्वारा दाखिल की गई स्टेटस रिपोर्ट भी पेश की और राज्यों में आवश्यक बुनियादी ढांचे को बढ़ाने पर जोर दिया.