scorecardresearch
 

वांगचुक के अनशन के बीच श्रीरामुलु की शौर्य गाथा, जिनके बलिदान से बदल गया था भारत का नक्शा

देश की राजधानी दिल्ली में बीते 20 दिनों सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठे हुए हैं. उनका ये हड़ताल शिक्षा क्षेत्र में बदलाव की मांग को लेकर है. इस बीच पोटी श्रीरामुलु की शौर्य गाथा जानना भी बेहद जरूरी है. उन्होंने 58 दिन तक अनशन किया और फिर उनके मौत के बाद आंध्र प्रदेश राज्य की स्थापना हुई. तो आइए जानते हैं पोटी श्रीरामुलु की बलिदान की वो कहानी, जिसने जवाहरलाल नेहरू को अपने फैसले को बदलने को मजबूर किया. 

Advertisement
X
सोनम वांगचुक के अनशन ने याद दिलाई 74 साल पुरानी आंध्र आंदोलन की कहानी (Photo: ITG)
सोनम वांगचुक के अनशन ने याद दिलाई 74 साल पुरानी आंध्र आंदोलन की कहानी (Photo: ITG)

महात्मा गांधी ने एक बार पोटी श्रीरामुलु के बारे में कहा था कि अगर उनके पास श्रीरामुलु जैसे और ग्यारह अनुयायी हों तो भारत एक साल में आजादी पा लेगा. यह बात सच साबित तो नहीं हुई, लेकिन आजादी के बाद श्रीरामुलु ने गांधी के सत्याग्रह और अनशन के हथियार का इस्तेमाल करके भारत का नक्शा ही बदल दिया. 

अक्टूबर 1952 में श्रीरामुलु ने तेलुगु भाषी लोगों के लिए अलग राज्य की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू किया था. 58 दिन भूखे रहने के बाद 15 दिसंबर 1952 को उनकी मौत हो गई, लेकिन उनकी मौत ने आंध्र राज्य को जन्म दे दिया. यह पूरा प्रसंग अब फिर चर्चा में है क्योंकि लद्दाख के शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतर मंतर पर अपने अनिश्चितकालीन अनशन के 20वें दिन में पहुंच चुके हैं.

आजादी और गणतंत्र बनने के कुछ ही साल बाद तक भारत में भाषा के आधार पर राज्य नहीं बने थे. उस समय पूरा तेलुगु भाषी इलाका पहले मद्रास प्रेसिडेंसी और फिर 1950 से मद्रास स्टेट का हिस्सा था. तेलुगु भाषियों के लिए अलग राज्य की मांग श्रीरामुलु से पहले से चली आ रही थी. 

Advertisement

आंध्र महासभा अंग्रेजों के जमाने से ही तेलुगु पहचान को मजबूत करने में जुटी थी. कांग्रेस पार्टी ने भी 1920 के दशक से भाषा आधारित राज्यों का समर्थन किया था, लेकिन देश के बंटवारे के बाद हालात बदल गए. सांप्रदायिक हिंसा, शरणार्थियों के पुनर्वास, कश्मीर में पाकिस्तान से जंग और रियासतों के विलय जैसी चुनौतियों के बीच नेहरू को डर था कि भाषा के आधार पर राज्य बनाने से देश तोड़ने वाली ताकतें बढ़ सकती हैं.

नेहरू, वल्लभभाई पटेल और पट्टाभि सीतारमैया की जेवीपी कमेटी ने भाषा आधारित राज्यों पर कांग्रेस के पुराने रुख को पलट दिया. मई 1952 में संसद में नेहरू ने कहा था कि भाषाई राज्य बनाना ठीक समय पर हो सकता है, लेकिन अभी सही समय नहीं है. मगर तेलुगु नेताओं को लगता था कि नेहरू का रुख साफ नहीं है और कोई भी नहीं जानता था कि सही समय कब आएगा. इसी बेचैनी में आंध्र इलाकों में आंदोलन तेज होता गया.

पोटी श्रीरामुलु का जन्म 1901 में हुआ था. वे इंजीनियर थे और रेलवे में नौकरी करते थे. 1928 में उनकी पत्नी और नवजात बच्चे की मौत के बाद उनकी जिंदगी बदल गई. 1930 में नौकरी छोड़कर वे गांधी के नमक सत्याग्रह से जुड़ गए और साबरमती आश्रम में रहने लगे. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे डेढ़ साल जेल में भी रहे. 

Advertisement

शुरुआत में उनका आंदोलन दलितों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर था. 1946 में इसी मांग पर उन्होंने आमरण अनशन शुरू किया था, जिसे खुद गांधी के कहने पर उन्होंने खत्म किया.

1952 आते आते आंध्र आंदोलन को राजनीतिक ताकत मिल चुकी थी. मद्रास विधानसभा चुनाव में कांग्रेस तेलुगु इलाकों की 145 में से सिर्फ 43 सीटें ही जीत पाई थी, जबकि आंध्र राज्य का समर्थन करने वाली पार्टियां आगे रहीं. 

एक और बड़ा विवाद मद्रास शहर को लेकर था. तेलुगु नेता चाहते थे कि मद्रास शहर आंध्र राज्य का हिस्सा बने, लेकिन नेहरू और मद्रास के तत्कालीन मुख्यमंत्री सी राजगोपालाचारी इसके सख्त खिलाफ थे.

इसी माहौल में 19 अक्टूबर 1952 को श्रीरामुलु ने मद्रास में फिर से आमरण अनशन शुरू कर दिया. जैसे जैसे दिन बीतते गए, उनका समर्थन बढ़ता गया. कई शहरों में हड़तालें हुईं. दिसंबर की शुरुआत में नेहरू ने साफ कहा था कि वे इस अनशन से बिल्कुल प्रभावित नहीं हैं और इसे पूरी तरह नजरअंदाज करेंगे. 

लेकिन बढ़ते दबाव के बीच 12 दिसंबर को नेहरू ने राजगोपालाचारी को लिखा कि अब आंध्र की मांग मान लेने का समय आ गया है, वरना तेलुगु लोगों में गहरी निराशा फैल जाएगी. फिर भी सरकार ने कोई औपचारिक ऐलान नहीं किया.

Advertisement

58वें दिन तक श्रीरामुलु की हालत बहुत खराब हो चुकी थी. उनकी आंखें धंस गई थीं, गला सूज गया था और वे पानी तक नहीं निगल पा रहे थे. 15 दिसंबर 1952 को उनकी मौत हो गई. उनकी मौत की खबर फैलते ही तेलुगु इलाकों में हिंसा भड़क उठी. 

सरकारी दफ्तरों पर हमले हुए, ट्रेनें रोकी गईं और पुलिस फायरिंग में कई प्रदर्शनकारी मारे गए. आखिरकार चार दिन बाद, 19 दिसंबर को नेहरू ने अलग आंध्र राज्य बनाने का ऐलान कर दिया, हालांकि मद्रास शहर उसमें शामिल नहीं किया गया.

आंध्र राज्य औपचारिक रूप से 1 अक्टूबर 1953 को कुर्नूल को राजधानी बनाकर अस्तित्व में आया. तीन साल बाद नवंबर 1956 में इसे हैदराबाद स्टेट के तेलंगाना इलाके के साथ मिलाकर आंध्र प्रदेश बनाया गया. 2014 में तेलंगाना फिर अलग हो गया. श्रीरामुलु की मौत के बाद महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरलम जैसे राज्यों की भाषाई मांगें भी मजबूत हुईं, और सरकार को राज्य पुनर्गठन आयोग बनाना पड़ा, जिसने बाद में 1956 में देश के राज्यों का बड़े पैमाने पर पुनर्गठन किया.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement