एक समय था, जब ट्रेन की सीटी सुनते ही लोग घरों से निकलकर स्टेशन पहुंच जाते थे. धुआं उड़ाती भाप की रेलगाड़ी को अपनी आंखों से देखना किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता था. आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. वहीं भारतीय रेलवे अब ऐसी हाइड्रोजन ट्रेन लेकर आया है, जो बिना धुआं छोड़े पटरी पर दौड़ेगी. यानी 173 साल पहले भाप के इंजन से शुरू हुआ यह सफर अब भविष्य की तकनीक तक पहुंच चुका है.
आज इस ऐतिहासिक सफर में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज हरियाणा के जींद स्टेशन से देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाएंगे. इसके साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों की लिस्ट में शामिल हो जाएगा, जहां हाइड्रोजन ईंधन से चलने वाली ट्रेनें संचालित हो रही हैं. यह ट्रेन न केवल आधुनिक तकनीक का उदाहरण है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी भारतीय रेलवे का एक बड़ा कदम माना जा रही है.
भारतीय रेलवे सिर्फ लोगों को एक शहर से दूसरे शहर तक नहीं ले गया, बल्कि इसने देश की तरक्की की रफ्तार भी बढ़ाई. आज हर दिन करोड़ों यात्री ट्रेन से सफर करते हैं और लाखों टन सामान देश के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचता है. वंदे भारत, बुलेट ट्रेन परियोजना और अब हाइड्रोजन ट्रेन जैसे बड़े बदलाव दिखाते हैं कि रेलवे कितनी तेजी से आधुनिक हो रहा है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में शामिल भारतीय रेलवे की शुरुआत सिर्फ 34 किलोमीटर के छोटे से सफर से हुई थी? आइए जानते हैं, 173 साल में भारतीय रेलवे ने कैसे भाप के इंजन से हाइड्रोजन ट्रेन तक का ऐतिहासिक सफर तय किया.
16 अप्रैल 1853 को चली थी पहली ट्रेन
भारत में पहली यात्री ट्रेन 16 अप्रैल 1853 को मुंबई ( बॉम्बे) के बोरीबंदर स्टेशन से ठाणे के बीच चलाई गई थी. यह ट्रेन करीब 34 किलोमीटर की दूरी तय करती थी. इसमें 14 डिब्बे थे और लगभग 400 यात्रियों ने सफर किया था. इस ऐतिहासिक ट्रेन को तीन भाप के इंजनों- साहिब, सिंध और सुल्तान ने खींचा था. उस समय यह उपलब्धि भारत के लिए तकनीकी क्रांति मानी गई थी. इसके बाद धीरे-धीरे देश के अलग-अलग हिस्सों में रेलवे लाइन बिछाई जाने लगी और रेल नेटवर्क तेजी से बढ़ता गया.
भाप के इंजन का था सुनहरा दौर
रेलवे की शुरुआती पहचान भाप के इंजनों से ही थी. इन इंजनों में कोयला जलाकर भाप तैयार की जाती थी, जिससे इंजन चलता था. कई दशकों तक यही इंजन भारतीय रेलवे की ताकत बने रहे. हालांकि इन इंजनों की कुछ बड़ी कमियां भी थीं. इनमें काफी कोयला लगता था, धुआं ज्यादा निकलता था और रखरखाव भी महंगा पड़ता था. इसके बावजूद उस दौर में यही तकनीक सबसे भरोसेमंद मानी जाती थी.
फिर आया डीजल इंजन का दौर
1960 के दशक में भारतीय रेलवे ने धीरे-धीरे डीजल इंजनों को अपनाना शुरू किया. डीजल इंजन भाप इंजनों की तुलना में ज्यादा तेज, अधिक शक्तिशाली और कम रखरखाव वाले थे. इन इंजनों की मदद से लंबी दूरी की ट्रेनों का संचालन आसान हुआ. मालगाड़ियों की क्षमता भी बढ़ी और रेलवे का विस्तार पहले से कहीं तेज गति से होने लगा. कई दशकों तक डीजल इंजन भारतीय रेलवे की रीढ़ बने रहे.
इलेक्ट्रिक ट्रेनों ने बदल दी तस्वीर
इसके बाद रेलवे ने पर्यावरण और लागत को ध्यान में रखते हुए इलेक्ट्रिफिकेशन पर जोर दिया. बिजली से चलने वाले इंजन डीजल की तुलना में ज्यादा तेज, कम प्रदूषण फैलाने वाले और ऊर्जा की दृष्टि से अधिक किफायती साबित हुए. पिछले कुछ वर्षों में भारतीय रेलवे ने रिकॉर्ड गति से रेल मार्गों का इलेक्ट्रिफिकेशन किया है. अब देश का अधिकांश ब्रॉड गेज नेटवर्क बिजली से संचालित हो रहा है. इससे ईंधन पर खर्च कम हुआ है और ट्रेनों की रफ्तार भी बढ़ी है.
रेलवे में आया आधुनिक तकनीक का दौर
आज भारतीय रेलवे केवल इंजन बदलने तक सीमित नहीं है. अब यात्रियों को बेहतर सुविधाएं देने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. वंदे भारत एक्सप्रेस जैसी सेमी हाई-स्पीड ट्रेनें, आधुनिक एलएचबी कोच, ऑटोमेटिक सिग्नल सिस्टम, कवच सुरक्षा प्रणाली, डिजिटल टिकटिंग और बेहतर स्टेशन सुविधाएं रेलवे को नई पहचान दे रही हैं. यात्रियों को पहले की तुलना में ज्यादा सुरक्षित, आरामदायक और तेज सफर मिल रहा है.
अब बारी हाइड्रोजन ट्रेन की
भारतीय रेलवे अब एक और बड़ी छलांग लगाने जा रहा है. देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन रेलवे के इतिहास में नया अध्याय जोड़ने वाली है. हाइड्रोजन ट्रेन डीजल की जगह हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक का इस्तेमाल करती है. इसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के केमिकल प्रोसेस से बिजली बनती है, जिससे ट्रेन चलती है. सबसे खास बात यह है कि इस प्रक्रिया में धुआं नहीं निकलता, बल्कि केवल पानी की भाप बनती है. इसलिए इसे पर्यावरण के लिए बेहद सुरक्षित माना जाता है.
भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन कहां चलेगी?
भारतीय रेलवे की पहली हाइड्रोजन ट्रेन हरियाणा में जींद से सोनीपत (89 किमी) के बीच चलेगी. जो रोज दो राउंड ट्रिप यानी कुल 356 किमी का सफर तय करेगी. हाइड्रोजन ट्रेन जींद सिटी, गोहाना, पांडु पिंडारा, ललित खेड़ा, भांभेवा, इसापुर खेड़ी, बुटाना, खांडराई, राबरा, लाथ, मोहाना और सोनीपत स्टेशन पर रुकेगी. इसमें आधुनिक सुरक्षा प्रणाली, हाइड्रोजन लीक डिटेक्शन सिस्टम और विशेष फ्यूल सेल तकनीक का उपयोग किया गया है.
कैसे काम करती है हाइड्रोजन ट्रेन?
हाइड्रोजन ट्रेन के आगे और पीछे खास पावर कार लगी होती हैं. इनमें हाइड्रोजन गैस के टैंक, फ्यूल सेल और बैटरी होती है. जब हाइड्रोजन फ्यूल सेल में पहुंचती है, तो वहां से बिजली बनती है. यही बिजली ट्रेन की मोटर को चलाती है और ट्रेन दौड़ने लगती है. अगर जरूरत से ज्यादा बिजली बनती है, तो उसे बैटरी में जमा कर लिया जाता है. इस तकनीक की एक बड़ी खासियत यह है कि हाइड्रोजन ट्रेन डीजल ट्रेन की तुलना में काफी शांत होती है. इसमें करीब 60 प्रतिशत तक कम आवाज होती है, इसलिए सफर ज्यादा आरामदायक माना जाता है.
हाइड्रोजन ट्रेन क्यों है खास?
हाइड्रोजन ट्रेन को भविष्य की ट्रेन माना जा रहा है, क्योंकि यह पर्यावरण को बहुत कम नुकसान पहुंचाती है. यह हाइड्रोजन से चलती है, इसलिए इससे कार्बन उत्सर्जन लगभग न के बराबर होता है. इससे डीजल की खपत कम होगी और प्रदूषण भी घटेगा. साथ ही, ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा मिलेगा. इस ट्रेन की एक और खास बात यह है कि इसे उन रेल मार्गों पर भी चलाया जा सकता है, जहां अभी बिजली की लाइन (ओवरहेड वायर) नहीं है. यानी बिना डीजल के भी ऐसे रूट पर ट्रेन चलाई जा सकेगी. जर्मनी, फ्रांस, जापान और चीन जैसे कई देश पहले से इस तकनीक पर काम कर रहे हैं. अब भारत भी इस दिशा में बड़ा कदम बढ़ा चुका है.
रफ्तार की बात करें तो हाइड्रोजन ट्रेन की सामान्य ऑपरेशनल स्पीड 75 किलोमीटर प्रति घंटा होगी. ट्रायल के दौरान इसने 120 किलोमीटर प्रति घंटे तक की रफ्तार हासिल की थी. रेलवे का कहना है कि यह ट्रेन करीब एक घंटे में 90 किलोमीटर का सफर तय कर सकती है, जबकि कई पुराने डीजल इंजन वाली ट्रेनों को इतनी दूरी तय करने में लगभग दो घंटे तक लग जाते हैं. भारतीय रेलवे आने वाले वर्षों में और भी आधुनिक बनने की तैयारी कर रहा है. सरकार का लक्ष्य रेलवे को अधिक सुरक्षित, तेज और पर्यावरण के अनुकूल बनाना है.