भारत और पाकिस्तान के बीच जब भी तनाव बढ़ता है, बातचीत के रास्ते बंद हो जाते हैं. ऐसे माहौल में दोनों देशों के रिश्तों को सुधारने की कोशिश करना बड़ा ही मुश्किल काम है, लेकिन कोलकाता के एक चार्टर्ड अकाउंटेंट ने यही मुश्किल रास्ता चुना. इनका नाम ओपी शाह है.
हाल ही में भारत और पाकिस्तान के 117 नामचीन लोगों ने दोनों मुल्कों की सरकारों से बातचीत शुरू करने की अपील करते हुए एक साझा 'शांति पत्र' जारी किया. सोशल मीडिया पर इस चिट्ठी को लेकर काफी बहस छिड़ गई है. इस पूरी मुहिम के पीछे असली दिमाग ओपी शाह का ही है, जो पिछले 35 सालों से दोनों देशों को करीब लाने की कोशिश में जुटे हैं.
कौन हैं ओपी शाह?
ओपी शाह पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और इसके साथ ही वे लंबे समय से सामाजिक कार्यों से जुड़े रहे हैं. उन्होंने 'सेंटर फॉर पीस एंड प्रोग्रेस' नाम की संस्था बनाई है. यह संस्था भारत-पाकिस्तान के बीच बातचीत बढ़ाने के साथ आम लोगों के स्तर पर रिश्ते बेहतर करने का काम करती है. उनका मानना है कि सरकारों के अलावा आम जनता के बीच भी संवाद होना बेहद जरूरी है.
ओपी शाह का भारत-पाक संवाद से जुड़ाव नया नहीं है. उन्होंने 1991 में दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में पहला भारत-पाक संवाद आयोजित किया था. इसके बाद वे प्रतिनिधिमंडल के साथ खुद 1991 और 1992 में पाकिस्तान भी गए. तब से अब तक वे दोनों मुल्कों के बीच बातचीत, नागरिक स्तर पर संपर्क समेत ट्रैक-2 डिप्लोमेसी को बढ़ावा देने की कोशिश में जुटे हैं. उनकी संस्था ने जम्मू-कश्मीर जैसे कई अहम मुद्दों पर दोनों देशों के विशेषज्ञों और आम समाज के बीच चर्चा कराई है.

बीते जून के आखिरी हफ्ते में ओपी शाह की पहल पर भारत और पाकिस्तान के 117 प्रमुख लोगों ने एक खुला पत्र जारी किया. 30 जून की तारीख वाला यह पत्र दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों को भेजा गया है. इसमें बातचीत फिर शुरू करने, सामान्य रिश्ते बहाल करने, सैन्य तनाव कम करने और जम्मू-कश्मीर समेत लंबित मुद्दों पर चर्चा आगे बढ़ाने की अपील की गई है.
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किन लोगों ने किए हस्ताक्षर?
इस पत्र पर भारत की ओर से नेशनल कॉन्फ्रेंस प्रमुख फारूक अब्दुल्ला, अलगाववादी नेता मीरवाइज उमर फारूक, पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती, RJD सांसद मनोज झा और हुमायूं कबीर समेत कई लोगों ने हस्ताक्षर किए हैं. वहीं, पाकिस्तान की ओर से पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी, पूर्व राजनयिक अशरफ जहांगीर काजी, नेशनल असेंबली के सदस्य इस्फन्यार एम. भंडारा और लेखक परवेज हुदभोय जैसे बड़े नाम शामिल हैं.
इस पहल पर सवाल भी उठे
इस पहल पर कई लोगों ने गंभीर सवाल भी उठाए हैं. आलोचकों का साफ तर्क है कि पाकिस्तान से बातचीत की बात करने से पहले सीमा पार से होने वाले आतंकवाद पर सख्त शर्त रखनी चाहिए थी. भारत ने पहले भी कई बार शांति की कोशिश की, लेकिन उसके बदले में हमेशा 1993 के मुंबई धमाके और 26/11 जैसे आतंकी हमले मिले.
इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में भी ओपी शाह से यही सवाल पूछा गया कि पत्र में पाकिस्तान पर आतंकवाद रोकने की जिम्मेदारी साफ तौर पर क्यों नहीं डाली गई. जवाब में उन्होंने कहा कि यह किसी सरकार की नहीं, बल्कि नागरिक समाज की पहल है. उनका दावा है कि इस पत्र का मकसद दोनों देशों के बीच भरोसा बढ़ाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बेहतर हो सके.
उन्होंने यह भी साफ किया कि उनकी यह पहल किसी भी तरह से आतंकवाद का समर्थन नहीं करती. उनका मानना है कि बातचीत बंद होने से समस्याएं और बढ़ती हैं, इसलिए संवाद का रास्ता खुला रहना चाहिए.