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समंदर का खारा पानी बनेगा पीने लायक... इजरायल की मदद से बन रहे भारत के पहले प्लांट से Ground report

दुनिया के सबसे शुष्क देशों में से एक इजरायल ने डीसेलिनेशन को अपनी ताकत बना लिया है और समंदर के खारे पानी को पीने लायक बना रहा है. इसके बाद रिउवेन रिवलिन के भारत दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच डीसेलिनेशन सहयोग समझौते हुए, जिसने भारत की इस दिशा में यात्रा की नींव रखी.

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लक्षद्वीप में बन रहा डीसेलिनेशन प्लांट (Photo: ITG)
लक्षद्वीप में बन रहा डीसेलिनेशन प्लांट (Photo: ITG)

हम ज्यादा से ज्यादा आत्मनिर्भर हों… पश्चिम एशिया में युद्ध और तेल संकट को लेकर राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस बयान की गूंज आज वैश्विक अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में सुनाई देती है और आत्मनिर्भरता पर जोर दे रही है. 

जब मैंने हाल ही में लक्षद्वीप में बन रहे भारत के पहले ओशन थर्मल एनर्जी कन्वर्जन (OTEC) आधारित डीसेलिनेशन प्लांट का दौरा किया तो मुझे कुछ ऐसी ही आत्मनिर्भरता का अहसास हुआ. यह परियोजना सिर्फ समंदर के पानी को पीने के पानी में बदलने की नहीं है, बल्कि ऊर्जा स्वतंत्रता, रणनीतिक सुरक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है.

चारों ओर फैले नीले समुद्र के बीच स्थित लक्षद्वीप के साथ लंबे समय से यह विरोधाभास था कि यहां चारों ओर पानी है लेकिन पीने के लिए नहीं है. अब यह स्थिति बदलने वाली है.

इजराइल की सफलता से भारत की रूपरेखा तक...

इससे पहले कि मैं लक्षद्वीप के बारे में बात करूं. उससे पहले मैं आपको 2017 में इजरायल के ओल्गा बीच की याद दिलाना चाहता हूं, जहां प्रधानमंत्री मोदी और बेंजामिन नेतन्याहू ने एक अत्याधुनिक डीसेलिनेशन प्लांट का दौरा किया था. 

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इस बदलाव की जड़ें वहीं से जुड़ी हुई हैं. इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ नरेंद्र मोदी ने एक अत्याधुनिक डीसेलिनेशन संयंत्र का दौरा किया. जीएल वॉटर टेक्नोलॉजीज द्वारा संचालित इस प्लांट ने यह दर्शाया कि किस तरह समंदर के खारे पानी को बड़े पैमाने पर पीने योग्य बनाने में बदला जा सकता है.

दुनिया के सबसे शुष्क देशों में से एक इजरायल ने डीसेलिनेशन को अपनी ताकत बना लिया है और समंदर के खारे पानी को पीने योग्य बना रहा है. इसके बाद रिउवेन रिवलिन के भारत दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच डीसेलिनेशन सहयोग समझौते हुए, जिसने भारत की इस दिशा में यात्रा की नींव रखी.

लक्षद्वीप की बड़ी छलांग: पानी और बिजली साथ-साथ

2026 में जब मैं लक्षद्वीप पहुंचा तो इस तकनीक के भारतीय रूप को देखने की उत्सुकता चरम पर थी. दशकों से यहां बिजली के लिए डीजल पर निर्भरता रही है, जिसे मुख्य भूमि से लाना पड़ता है, खासकर मॉनसून में यह एक चुनौतीपूर्ण और महंगा काम होता है.

इस परियोजना की खासियत यह है कि यह सिर्फ पानी ही नहीं बनाती, बल्कि समुद्र के तापमान के अंतर से बिजली भी पैदा करती है. यह प्लांट समंदर के पानी को पीने योग्य बनाता है, बिजली पैदा करता है. डीजल पर निर्भरता कम करता है और आत्मनिर्भर द्वीपीय पारिस्थितिकी तंत्र बनाता है. 

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स्थानीय लोगों ने बताया कि अब उन्हें साफ पानी मिल रहा है. पहले ऐसी सुविधा नहीं थी, लेकिन अब हर कोई डीसेलिनेटेड पानी का उपयोग कर रहा है. चाय और कॉफी के स्वाद में भी फर्क महसूस किया जा रहा है.

यह कैसे काम करता है?

इस प्लांट की कार्यप्रणाली बेहद रोचक है. समंदर की सतह का गर्म पानी (लगभग 30°C) लिया जाता है. 1000 मीटर गहराई से ठंडा पानी (8°C से कम) खींचा जाता है. तापमान का अंतर एक थर्मोडायनामिक चक्र चलाता है. इससे पानी वाष्पित होकर संघनित होता है और मीठा पानी बनता है. इसके साथ ही बिजली भी उत्पन्न होती है. यह भारत का पहला ऐसा एकीकृत प्लांट है जो एक साथ पानी और ऊर्जा दोनों देता है.

ऊर्जा संकट से समाधान की ओर

लक्षद्वीप अभी भी डीजल पर निर्भर है, जो कोच्चि जैसे स्थानों से लाया जाता है लेकिन इस परियोजना के बाद ईंधन परिवहन लागत कम होगी. कार्बन उत्सर्जन घटेगा. बिजली की आपूर्ति निरंतर होगी.

केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने भरोसा जताया कि भविष्य में बिजली कटौती जैसी समस्याएं खत्म हो जाएंगी. यह परियोजना पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देगी.

वैश्विक तनाव के बीच रणनीतिक महत्व

7 मार्च 2026 को ईरान में क़ेश्म द्वीप के एक डीसेलिनेशन प्लांट पर हमले की खबर आई, जिससे कई गांवों की जल आपूर्ति प्रभावित हुई. यह दिखाता है कि जल अवसंरचना अब एक रणनीतिक संपत्ति बन चुकी है. भारत के लिए, लक्षद्वीप में ऐसी स्वदेशी परियोजनाएं आपदा और संकट के समय में आत्मनिर्भरता और सुरक्षा को मजबूत करती हैं.

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2017 में इजराइल के ओल्गा बीच से शुरू हुई यात्रा 2026 में लक्षद्वीप तक पहुंच चुकी है. यह बदलाव साफ है, भारत अब सिर्फ तकनीक सीख नहीं रहा, बल्कि खुद नई तकनीक विकसित कर रहा है. OTEC और डीसेलिनेशन का यह संयोजन भारत को न केवल अपनी समस्याओं का समाधान देता है, बल्कि दुनिया के अन्य द्वीपीय देशों के लिए एक नया मॉडल भी पेश करता है.

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