हैदराबाद में GHMC (ग्रेटर हैदराबाद म्यूनिसिपल कार्पोरेशन) को तीन नगर निगमों में बांटने के प्रस्ताव पर AIMIM विधायक दल के नेता अकबरुद्दीन ओवैसी ने सरकार की तैयारियों पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि मौजूदा GHMC में ही कर्मचारियों की कमी है, ऐसे में तीन नए नगर निगमों के संचालन के लिए जरूरी कर्मचारी कहां से आएंगे. ओवैसी ने हैदराबाद में अंडरग्राउंड केबलिंग के ₹1,400 करोड़ के ठेके को लेकर भी सरकार पर आरोप लगाए.
प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव पर जताई सहमति
विधेयक पर चर्चा के दौरान ओवैसी ने कहा कि हैदराबाद की तेजी से बढ़ती आबादी और शहरी विस्तार को देखते हुए प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव की जरूरत से वह सहमत हैं. हालांकि उन्होंने सवाल किया कि क्या सरकार ने तीनों प्रस्तावित नगर निगमों के लिए जरूरी कैडर स्ट्रेंथ का आकलन किया है.
ओवैसी ने पूछा, 'कैडर स्ट्रेंथ कहां है? कैडर स्ट्रेंथ कितनी है?' उन्होंने कहा कि मौजूदा नगर निकाय में कई पदों के लिए कर्मचारियों का ढांचा 1950, 1960 और 1970 के दशक में तय किया गया था. इसके बाद हैदराबाद की आबादी और नगर निकाय की जिम्मेदारियां कई गुना बढ़ी हैं, लेकिन कर्मचारियों की संख्या उसी अनुपात में नहीं बढ़ी.
उन्होंने आरोप लगाया कि कर्मचारियों की कमी के कारण एक विभाग के कर्मचारियों को दूसरे विभाग में काम करने के लिए भेजा जा रहा है. ऐसे में सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि तीन नए निगम बनने के बाद टाउन प्लानिंग, सैनिटेशन और दूसरी जरूरी सेवाओं के लिए कितने कर्मचारियों की आवश्यकता होगी और उनकी नियुक्ति कैसे की जाएगी.
₹1400 करोड़ के ठेके पर भी उठाए सवाल
अकबरुद्दीन ओवैसी ने हैदराबाद में ₹1,400 करोड़ के अंडरग्राउंड केबलिंग कॉन्ट्रैक्ट को लेकर भी सवाल उठाए. उन्होंने दावा किया कि इतना बड़ा ठेका एक ही कंपनी को दिया गया है और यह कंपनी लगातार सरकारी ठेके हासिल कर रही है.
ओवैसी ने आरोप लगाया कि संबंधित कंपनी बीजेपी को भी पैसा देती है. उन्होंने कहा कि जब फीस रीइंबर्समेंट, किसानों और आम लोगों के लिए धन की बात आती है तो खजाने में पैसा नहीं होने की बात कही जाती है, लेकिन इस कॉन्ट्रैक्टर को समय पर भुगतान किया जा रहा है.
उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद कंपनी के कितने बिलों का भुगतान किया गया, इसकी जानकारी RTI के जरिए मांगी गई, लेकिन सूचना नहीं दी जा रही है.
ओवैसी ने कहा कि ₹1,400 करोड़ का पूरा ठेका एक बड़ी कंपनी को देने के बजाय छोटे कॉन्ट्रैक्टरों को भी काम दिया जा सकता था, ताकि उन्हें भी कारोबार का अवसर मिलता.