महाराष्ट्र के अमादेया जमीन घोटाले में राकांपा नेता पार्थ पवार को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है. पुणे आर्थिक अपराध शाखा (EOW) के जांच अधिकारी API दत्तात्रय वाघमारे ने एक हलफनामा दाखिल कर कोर्ट के सामने उन कारणों का खुलासा किया है, जिनके आधार पर पार्थ पवार को इस मामले में आरोपी नहीं बनाया गया है.
पुलिस की जांच रिपोर्ट में बताया गया है कि इस पूरी जमीन खरीद-फरोख्त में पार्थ पवार की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर कोई संलिप्तता नहीं पाई गई है. आइए जानते हैं कि वो 8 कारण, जिनके आधार पर जांच अधिकारी ने पार्थ पवार को क्लीन चिट दी है.
1. सेल डीड में कोई भूमिका नहीं
जांच में सामने आया है कि सर्वे नंबर 88 से जुड़ी 300 करोड़ रुपये की इस सेल डीड को सिर्फ शीतल तेजवानी (वतनदारों की पावर ऑफ अटॉर्नी धारक) और दिग्विजय पाटिल (अमादेया एंटरप्राइजेज एलएलपी के पार्टनर) ने एक्जिक्यूट किया था. पार्थ पवार न तो इस सेल डीड के एक्जिक्यूटर थे, न ही इसके गवाह थे और न ही उन्होंने इस पर हस्ताक्षर किए थे.
इसके अलावा, दस्तावेज में ऐसा कोई भी प्राधिकरण या बोर्ड प्रस्ताव नहीं मिला, जिससे ये साबित हो सके कि पार्थ पवार ने दिग्विजय पाटिल को ये जमीन खरीदने के लिए अधिकृत किया था.
2. मनी ट्रेल (धन के लेन-देन) का कोई सुराग नहीं
पुलिस के मुताबिक, बैंक अकाउंट्स की बारीकी से जांच करने के बाद ऐसा कोई वित्तीय लेन-देन, फंड ट्रांसफर या डेबिट-क्रेडिट एंट्री नहीं मिली, जिससे ये साबित हो सके कि पार्थ पवार का व्यक्तिगत रूप से या उनके खातों के जरिए इस डील से कोई लेना-देना था.
यहां तक कि जांच में ये भी बात सामने आई कि अमादेया एंटरप्राइजेज और शीतल तेजवानी के बीच वाकई में कोई नकदी या राशि का लेन-देन हुआ ही नहीं था.
3. शीतल तेजवानी के बयानों में भी नाम नहीं
हिरासत में पूछताछ के दौरान आरोपी शीतल तेजवानी ने भी ये स्वीकार किया कि उनकी तमाम बातचीत, डील और कागजी कार्रवाई सिर्फ और सिर्फ दिग्विजय पाटिल के साथ हुई थी. उन्होंने पार्थ पवार की किसी भी तरह की भूमिका, संवाद या प्रभाव का कोई जिक्र नहीं किया.
4. स्टांप ड्यूटी और सरकारी दस्तावेजों से दूरी
महाराष्ट्र स्टांप अधिनियम की धारा 31 के तहत बाजार मूल्य और स्टांप शुल्क के निर्धारण के लिए दिया गया आवेदन सिर्फ दिग्विजय पाटिल ने साइन और फाइल किया था. इस प्रक्रिया में पार्थ पवार न तो कोई आवेदक थे और न ही हस्ताक्षरकर्ता. इसके अलावा जिला उद्योग केंद्र और लेटर ऑफ इंटेंट से जुड़े दस्तावेजों, घोषणापत्रों और शपथ पत्रों पर भी सिर्फ दिग्विजय पाटिल के हस्ताक्षर मिले हैं.
5. LLP समझौते और सहमति की कमी
भले ही पार्थ पवार अमादेया एंटरप्राइजेज LLP में 99% के हिस्सेदार थे और दिग्विजय पाटिल के पास सिर्फ 1% हिस्सेदारी थी, लेकिन LLP के नियमों के मुताबिक किसी भी अचल संपत्ति की खरीद-फरोख्त के लिए सभी पार्टनर की सहमति से प्रस्ताव पास होना अनिवार्य था. जांच अधिकारी का कहना है कि ऐसा कोई भी प्रस्ताव पार्थ पवार की सहमति से पास नहीं हुआ था. सेल डीड के साथ जो 22 अप्रैल 2025 का प्रस्ताव अटैच था, वो सिर्फ LLP के रजिस्ट्रेशन से जुड़ा था, न कि जमीन खरीदने के लिए. इसलिए सिर्फ दूसरे पार्टनर होने मात्र से उन्हें आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.
6. किसी भी साजिश या 'आपसी मेल' के सबूत नहीं
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 61(2) के तहत अपराध साबित करने के लिए सोची-समझी साजिश या आपसी सहमति के पुख्ता सबूत होने चाहिए. लेकिन पुलिस को ऐसा कोई कॉल रिकॉर्ड, बातचीत, मीटिंग या निर्देश नहीं मिला, जो पार्थ पवार को तहसीलदार सूर्यकांत येवले या दूसरे आरोपियों से जोड़े.
7. LLP एक्ट के कानूनी प्रावधान
जांच अधिकारी ने LLP एक्ट की धारा 26, 27(3) और 28(2) का हवाला देते हुए बताया कि क्योंकि LLP एक अलग कानूनी इकाई है, इसलिए एक पार्टनर के किए गए कृत्यों के लिए दूसरे पार्टनर को स्वचालित रूप से आपराधिक रूप से उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि उसकी व्यक्तिगत संलिप्तता के ठोस सबूत न हों.
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8. आगे की जांच जारी
इस पूरी रिपोर्ट के आखिर में ये बताया गया है कि पुलिस महानिदेशक के निर्देश पर पुणे पुलिस कमिश्नर की देखरेख में मामले के कुछ दूसरे पहलुओं पर अभी भी आगे की जांच जारी है. एजेंसी का कहना है कि जांच के दौरान अगर कोई नया और ठोस सबूत सामने आता है, तो उसके आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी.