महाराष्ट्र की सियासत में मराठी अस्मिता के नाम पर 1966 में बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना का गठन किया. शिवसेना अपने सियासी इतिहास में छह बार टूट चुकी है और एक बार फिर उद्धव ठाकरे के 9 में से 6 लोकसभा सांसद अलग होकर एकनाथ शिंदे से हाथ मिला लिया है. इस तरह बालासाहेब ठाकरे के सियासी विरासत संभाल रहे उद्धव ठाकरे के कार्यकाल में चार बार पार्टी में बगावत हो चुकी है.
शिवेसना (यूबीटी) चार साल में दूसरी बार टूटी है. शिवसेना लगभग हर दशक में टूटती और बिखरती रही है. शिवसेना से निकलकर छगन भुजबल से लेकर नारायण राणे और राज ठाकरे ने अपनी अलग पार्टी बनाई तो एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे से शिवसेना ही छीन ली.
एकनाथ शिंदे के बगावत के बाद उद्धव ठाकरे ने किसी तरह से शिवसेना (यूबीटी) बनाया, लेकिन चार साल के बाद अब उनके 9 में से 6 लोकसभा सांसद अलग हो गए. ये उद्धव ठाकरे की सियासत के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि शिवसेना में कब-कब बगावत का सामना करना पड़ा है?
शिवसेना गठन के कुछ साल बाद बगावत
बालासाहेब ठाकरे ने साठ के दशक में शिवसेना की बनियाद रखी. 19 जून 1966 को बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना के राजनीतिक दल के रूप में गठन किया. शिवसेना के बने कुछ ही दिन हुए थे कि शिवसेना के दिवंगत संस्थापक बाल ठाकरे और मुंबई के एक नेता बंदू शिंगरे के बीच तनाव हो गया.साल 1974 में मुंबई में लोकसभा उपचुनाव होना था. इस चुनाव में बाल ठाकरे ने कांग्रेस के उम्मीदवार रामराव आदिक को समर्थन देने का फैसला किया.
बंधु शिंगरे शिवसेना के कद्दावर नेता थे और मुंबई के परेल-लालबाग मिल मजदूर इलाके में उनकी पकड़ थी. वे बाल ठाकरे के कांग्रेस को समर्थन देने के इस फैसले के सख्त खिलाफ थे. इसी चलते ही उन्होंने पार्टी छोड़ दी. शिवसेना से बाहर निकलने के बाद बंधु शिंगरे ने शिवसेना के समानांतर एक नया संगठन खड़ा किया.उन्होंने अपनी इस नई पार्टी का नाम 'प्रति शिवसेना'रखा. हालांकि, उनकी पार्टी कोई खास असर नहीं छोड़ सकी.
शिवसेना में दूसरी बगावत छगन भुजबल ने की
शिवसेना के गठन के बाद से यह पार्टी अपने आक्रामक हिंदुत्व और क्षेत्रीय अस्मिता के लिए जानी जाती रही है, लेकिन इसके साथ ही पार्टी के भीतर आंतरिक कलह और बड़े नेताओं का बाहर निकलना एक ऐतिहासिक सच्चाई रही है. 1991 में छगन भुजबल का बगावत करना शिवसेना के लिए पहला बड़ा झटका था, जिसने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को चुनौती दी.
शिवसेना के 52 विधायक जीतकर आए थे. छगन भुजबल चाहते थे कि पार्टी उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाए. बालासाहेब ठाकरे ने भुजबल की जगह पर मनोहर जोशी को बना दिया, जिसके चलते भुजबल नाराज हो गए.
भुजबल ने 17 शिवसेना विधायकों के साथ बगावत कर दी. पहली बार किसी बहुत बड़े कद के नेता ने पार्टी में विरोध के सुर उठाए थे. तब महज कई विधायकों ने कथित तौर पर विधानसभा स्पीकर को समर्थन पत्र सौंपा था और दूसरे गुट को शिवसेना बी माना गया था. भुजबल ने 17 विधायकों के साथ पार्टी छोड़कर वे शरद पवार के नेतृत्व में कांग्रेस में शामिल हो गए.
नारायण राणे ने बगावत कर बनाई अलग पार्टी
नारायण राणे शिवसेना के दिग्गज नेता हुआ करते थे. बाला साहेब ठाकरे ने राणे को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री तक बनाया था. बालासाहेब ठाकरे अपने बेटे उद्धव ठाकरे को अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाने का काम किया तो नारायण राणे को ठीक नहीं लगा. उनको लगा कि पार्टी में उनकी और उनके समर्थकों की अनदेखी की जा रही है.
नारायण राणे और उद्धव ठाकरे के बीच मतभेद चरम पर पहुंच गए थे. राणे का आरोप था कि उद्धव ठाकरे के पास राजनीतिक करिश्मा नहीं है और वे जमीनी कार्यकर्ताओं से कट चुके हैं. ऐसे में नारायण राणे ने 2004 में उद्धव ठाकरे के साथ मतभेदों के चलते शिवसेना को अलविदा कहा. शिवसेना से अलग होकर नई स्वाभिमान पार्टी का गठन किया, इसके बाद कांग्रेस से होते हुए बीजेपी में शामिल हो गए.
उद्धव के चलते राज ठाकरे ने बनाई पार्टी
बालासाहेब ठाकरे की उंगली पकड़कर राजनीति में आए राज ठाकरे खुद को सियासी वारिस मान रहे थे. बाल ठाकरे ने उद्धव ठाकरे को आगे बढ़ाया तो राज ठाकरे नाराज हो गए. ठाकरे परिवार में आंतरिक मतभेद और उद्धव ठाकरे के बढ़ते कद से असंतुष्ट होकर राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़कर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना एमएनएस का गठन किया.
राज ठाकरे ने शिवसेना से अलग होकर 9 मार्च 2006 को अपनी नई राजनीतिक पार्टी 'महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना' बनाया. इस तरह शिवसेना दो हिस्सों में बट गई. ठाकरे परिवार और शिवसेना के इतिहास का सबसे बड़ा पारिवारिक और संगठनात्मक विभाजन माना जाता है. शुरुआती सफलताओं के बावजूद,पार्टी अपनी राजनीतिक पकड़ को बरकरार नहीं रख सकी और वर्तमान में शून्य पर है.
उद्धव ठाकरे से छीन ली शिंदे ने शिवसेना
उद्धव ठाकरे के सिपहसलार माने जाने वाले एकनाथ शिंदे ने जून 2022 में उनके हाथ से सत्ता और पार्टी दोनों ही छीन ली. 2022 में सिर्फ नेता नहीं बल्कि शिवसेना ही दो हिस्सों में टूट गई. शिवेसना के 40 विधायक उद्धव का साथ छोड़कर एकनाथ शिंदे से हाथ मिला लिया, जिसके चलते शिवसेना दो हिस्सों में बट गई. मामला अदालत तक पहुंचा, लेकिन उद्धव न ही पार्टी बचा सके और न ही चुनाव सिंबल. दोनों पर शिंदे का कब्जा हो गया.
शिंदे के नेतृत्व में बहुमत विधायक और सांसद अलग हो गए. 2022 में एकनाथ शिंदे द्वारा किया गया विद्रोह ने उद्धव ठाकरे की राजनीति को गहरा झटा दिया.यह केवल कुछ नेताओं का पार्टी से बाहर जाना नहीं था, बल्कि पार्टी के मूल जनाधार और विधानमंडल के एक बड़े हिस्से का पाला बदल लेना था. शिंदे गुट ने BJP के साथ मिलकर सरकार बनाई और आधिकारिक शिवसेना का नाम और तीर-कमान चुनाव चिन्ह हासिल कर लिया. ऐसे में उद्धव ठाकरे को नई पार्टी बनाई बनानी पार्टी चुनाव सिंबल भी नया बनाना पड़ा.
उद्धव ठाकरे को फिर लगा सियासी झटका
एकनाथ शिंदे के द्वारा शिवसेना छीने जाने के बाद उद्धव ठाकरे ने शिवेसना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नाम से पार्टी बनाई, जिसे शिवसेना (यूबीटी) भी कहा जाता है. इसके साथ ही उन्हें चुनाव चिन्ह टाइगर के बजाय मशाल मिला. शिंदे ख़ुद को कानूनी रूप से असली शिवसेना बताते हैं. ऐसे में उद्धव ठाकरे ने किसी तरह से फिर पार्टी को खड़ा किया.
2024 के लोकसभा चुनाव में उद्धव ठाकरे की पार्टी से 9 लोकसभा सांसद जीतकर आए, जिसने उन्हें एक नई सियासी संजीवनी दी. हालांकि, उसके कुछ दिनों के बाद ही विधानसभा चुनाव हुए तो शिंदे के पलड़ा भारी रहा. यहीं से सारा गेम फिर बदलने लगा. 2026 आते-आते उद्धव ठाकरे के लोकसभा सांसद बागी राह पर चल पड़े. बुधवार को 9 में से 6 लोकसभा सांसद ने स्पीकर को पत्र लिखकर अलग गुट बनाने की मांग की. माना जा रहा है कि उद्धव का साथ छोड़ने वाले सांसद एकनाथ शिंदे के साथ हाथ मिला सकते हैं. इस तरह उद्धव की पार्टी दो धड़ों में बंट गई.