जगदलपुर के कैफे पंडुम में उस दिन बाकी दिनों जैसी ही हलचल थी. कोई चाय का ऑर्डर दे रहा था, कोई कॉफी का इंतजार कर रहा था. नारंगी रंग की यूनिफॉर्म पहने एक युवक चुपचाप फर्श साफ कर रहा था. वह अपने काम में इतना मशगूल था कि शायद ही किसी ग्राहक की नजर उस पर दूसरी बार जाती. मैं भी उसे कुछ देर तक सिर्फ एक कर्मचारी की तरह देखता रहा. आजतक डॉट इन के साथ उसकी बातचीत शुरू हुई तो सवाल भी सामान्य थे - नाम क्या है? कब से यहां काम कर रहे हो? महीने में कितनी तनख्वाह मिलती है? वह हर सवाल का जवाब बेहद सहजता से देता रहा. फिर मैंने उससे पूछा कि सुना है... तुम पहले नक्सली थे, आठ लाख का इनाम था तुम्हारे पर?
कुछ पल के लिए वह चुप हो गया. झाड़ू दीवार से टिकाई, पास रखी कुर्सी पर बैठा और धीमी आवाज में बोला हां... करीब 14 साल की उम्र में जंगल चला गया था. बस, यहीं से बातचीत का रुख बदल गया. अब मेरे सामने कैफे का कर्मचारी नहीं बैठा था. मेरे सामने एक ऐसा शख्स था, जिसने अपना बचपन बस्तर के जंगलों में खो दिया था. जिसने किताबों की जगह बंदूक पकड़ी. जिसने हथियार चलाना सीखा. जिसने नक्सली कैंपों की जिंदगी देखी. और जिसने आखिरकार उसी जंगल से बाहर निकलकर एक नई जिंदगी चुनने का फैसला किया.
लखमू अपनी कहानी बिना किसी नाटकीय अंदाज के सुनाता है. ऐसा लगता है जैसे वह अपने अतीत को दोहराना नहीं चाहता, लेकिन उसे छिपाना भी नहीं चाहता. मैं करीब 14 साल का था. उसी उम्र में नक्सलियों के कैंप में पहुंच गया. तब यह समझ नहीं थी कि सही क्या है और गलत क्या. जो सामने था, वही दुनिया लगती थी. हर वाक्य ऐसा था, जैसे वर्षों बाद किसी ने पुरानी अलमारी खोल दी हो. वह बताता है कि जंगल पहुंचने के बाद जिंदगी पूरी तरह बदल गई. सुबह की शुरुआत दौड़ से होती थी. फिर हथियारों की ट्रेनिंग. घंटों पैदल मार्च. जंगल में रहना, रास्ते पहचानना, संदेश पहुंचाना और हर वक्त सतर्क रहना. धीरे-धीरे उसने AK-47, INSAS राइफल समेत कई हथियार चलाने की ट्रेनिंग ली. उसके मुताबिक, समय के साथ संगठन के वरिष्ठ नेताओं का भरोसा भी उस पर बढ़ने लगा. जिम्मेदारियां बढ़ती गईं और जंगल ही उसकी दुनिया बन गया.
जंगल में मिली फूलमती... और यहीं से बदलने लगी कहानी
बातचीत के दौरान पहली बार लखमू के चेहरे पर मुस्कान तब आई, जब उसने फूलमती का जिक्र किया. फूलमती भी अपने गांव से निकलकर नक्सली संगठन में शामिल हुई थी. उसने भी वही ट्रेनिंग ली, वही जीवन जिया, वही रास्ते तय किए जो संगठन के बाकी सदस्य करते थे. दोनों की मुलाकातें पहले सिर्फ काम के दौरान होती थीं. फिर कभी किसी जिम्मेदारी पर बातचीत हुई. धीरे-धीरे बातें बढ़ीं. और एक दिन दोनों को एहसास हुआ कि जंगल में, बंदूकों के बीच, उनके भीतर जिंदगी की एक अलग चाह भी बची हुई है. लखमू कहता है, हम दोनों सोचने लगे थे कि क्या पूरी जिंदगी ऐसे ही बीत जाएगी? लखमू बताता है कि इस बीच परिवार की तरफ से भी लगातार संदेश आने लगे. घर लौटने की बात कही जाती. सामान्य जिंदगी जीने की बात कही जाती. उधर फूलमती के मन में भी यही सवाल था. क्या हमेशा जंगल में रहना है? क्या कभी अपना घर होगा? क्या कभी ऐसा दिन आएगा जब बिना डर के सो सकें? यहीं से दोनों ने फैसला लिया कि अब वापस लौटना है मुख्यधारा में. एक सामान्य जिंदगी की तरफ.
सबसे कठिन फैसला
यह फैसला सिर्फ संगठन छोड़ने का नहीं था. यह फैसला डर छोड़ने का भी था. एक तरफ नक्सली संगठन था. दूसरी तरफ पुलिस. बीच में दो ऐसे लोग थे, जो सिर्फ एक नई जिंदगी चाहते थे. लखमू बताता है कि उन्होंने संगठन के वरिष्ठ लोगों के सामने घर लौटने की इच्छा जताई. इसके बाद उन्होंने आत्मसमर्पण का रास्ता चुना. उसके मुताबिक, शुरुआत आसान नहीं थी. मन में कई तरह के डर थे. लेकिन एक बात तय थी अब जंगल में वापस नहीं जाना. सरेंडर के बाद पहली बार भविष्य दिखा कुछ समय बाद दोनों ने शादी कर ली. आज वे पति-पत्नी हैं. दोनों जगदलपुर के कैफे पंडुम में काम करते हैं. लखमू सफाई का काम संभालता है. उसे हर महीने करीब 9 हजार रुपये वेतन मिलता है. फूलमती भी यहीं काम करती है और अपनी कमाई से घर चलाने में बराबर की हिस्सेदार है. यह नौकरी शायद किसी बड़े शहर के हिसाब से छोटी लगे. लेकिन लखमू के लिए यह सिर्फ नौकरी नहीं है. यह उस जिंदगी का प्रमाण है, जिसे उसने दूसरी बार जीना शुरू किया है.
मैंने उससे पूछा कि कभी जंगल याद आता है? वह बिना देर किए जवाब देता है नहीं... अब नहीं. फिर थोड़ी देर रुककर कहता है कि अब सुकून है. मेहनत करते हैं. जो मिलता है, उसी में घर चलता है. रात को डरकर नहीं सोना पड़ता. उसके इस जवाब में शायद पूरी कहानी छिपी हुई थी.
कैफे पंडुम सिर्फ एक कैफे नहीं
जगदलपुर पुलिस लाइन परिसर का यह कैफे सिर्फ चाय और कॉफी बेचने की जगह नहीं है. यह उन लोगों की नई शुरुआत का प्रतीक है, जिन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर सामान्य जिंदगी चुनी. 'पंडुम' गोंडी भाषा के शब्द 'पंडुम' से लिया गया है. जिसका अर्थ मेल-मिलाप और साथ आना होता है. इस कैफे का उद्घाटन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने किया था. यह कैफे बस्तर में बदलती शांति और पुनर्वास की तस्वीर को भी बयां कर रहा है.
यहां आने वाला ग्राहक शायद यह नहीं जानता कि उसकी मेज साफ करने वाला या उसे चाय देने वाला कर्मचारी कभी बस्तर के जंगलों में हथियार लेकर घूमता था. लेकिन यही इस जगह की सबसे बड़ी खूबसूरती भी है. यहां किसी की पहचान उसके अतीत से नहीं, उसके वर्तमान से होती है. बातचीत खत्म हुई. वह फिर उठा. झाड़ू हाथ में ली और उसी सहजता से अपने काम में लग गया. जाते-जाते मैंने उससे आखिरी सवाल पूछा कि अगर आज जंगल में कोई ऐसा लड़का हो, जो उसी रास्ते पर जाने की सोच रहा हो, तो उससे क्या कहोगे? इस बार उसने जवाब देने में थोड़ा वक्त लिया. फिर बोला गलती दोबारा मत करना. जिंदगी जंगल में नहीं... घर में है. कैफे से बाहर निकलते वक्त मैं पीछे मुड़कर देखता हूं. वह फिर उसी तरह फर्श साफ कर रहा था. फर्क सिर्फ इतना था कि अब मैं उसे एक कर्मचारी की तरह नहीं देख रहा था. मैं उस इंसान को देख रहा था, जिसने बंदूक छोड़ने का फैसला किया... और शायद वही उसकी जिंदगी का सबसे बहादुर फैसला था.