मेघना गुलजार की फिल्म राजी को दर्शकों और क्रिटिक्स की खूब सराहना मिली है. फिल्म में सहमत नाम की बहादुर कश्मीरी लड़की की कहानी राइटर हरिंदर सिक्का के नॉवेल 'कॉलिंग सहमत' पर बेस्ड है. सहमत की शादी एक पाकिस्तानी आर्मी ऑफिसर के बेटे से होती है लेकिन इस फिल्म में सहमत के पहले प्यार का जिक्र गायब है. बहरहाल, ये शख्स जिंदा हैं और वह सहमत और अपने रिश्ते के बारे में कई बातें भी शेयर कर चुके हैं.
हरिंदर सिक्का के नॉवेल में ये शख्स अभिनव नाम से उल्लेखित है, जाहिर सी बात है कि ये उनका असल नाम नहीं, बल्कि काल्पनिक नाम है. फिल्म में सहमत की जिंदगी के सिर्फ एक ही प्यार यानी देशप्रेम पर फोकस किया गया है. हालांकि, सहमत के दूसरे प्यार यानी उनके प्रेमी, जो कि एक लंबी कद काठी वाला एथलीट है, का कोई जिक्र नहीं है. जानकारी के मुताबिक, सहमत की अभिनव से मुलाकात दिल्ली यूनिर्वसिटी में हुई थी.
अब कहां है अभिनव?
सहमत अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन अभिनव अब सीनियर सिटीजन हैं और दिल्ली में रह रहे हैं. राइटर हरिंदर सिक्का ने सहमत की असल पहचान दुनिया को बताने की बता की थी, लेकिन अभिनव उनके इस फैसले के खिलाफ हैं. न सिर्फ अभिनव, बल्कि सहमत के कई करीबी पहचान के इस खुलासे को व्यर्थ बता रहे हैं. यहां तक पूर्व सीएम फारुक अब्दुल्ला ने भी ऐसा न करने के लिए राइटर को खत लिखा था.
खैर, लेखक ने इस बात के खुलासे के अभिनव की मंजूरी को महत्वपूर्ण समझा. सिक्का ने अभिनव के बारे में बताया कि वह फिलहाल दिल्ली में अच्छी तरह से बस गए हैं और मुझे लगता है कि मैं उनकी गोपनीयता में घुसपैठ कर रहा हूं.' 'मैं बस उनसे ये पूछने की कोशिश कर रहा हूं कि क्या सहमत एक व्यक्ति से संबंधित है? वह अब एक राष्ट्रीय संपत्ति (आकृति) है. वह नायक हैं.'
भारत लौटने पर क्या सहमत अपने पहले प्यार के पास वापस गईं?
सिक्का ने बताया कि सहमत के लिए अभिनव का प्यार एक परीक्षा की तरह था. सहमत कभी उसके पास वापस नहीं लौटी, बल्कि अभिनव खुद उसके पास गए. वास्तव में, जब वह भारत लौट आईं तो अभिनव ने सहमत का हर तरह से ख्याल रखा.
सहमत जब भारत लौटी तो वह डिप्रेशन में डूबी हुईं थीं और एक बच्चे के साथ गर्भवती थीं. उसके पास उसके पहले की जिंदगी में वापस लौटने की कोई वजह नहीं थी.'
राइटर सिक्का का सहमत की पहचान को उजागर करने का यही मकसद है कि वह उस सहमत जैसी बहादुर लड़की की पहचान को दिखाकर ये ट्रेंड शुरू करना चाहते हैं कि लोग भी उन्हें जान सकें जो बिना वर्दी के देश के लिए इतना बड़ा जोखिम लेते हैं. सिक्का ने यहां सवाल खड़ा किया कि आखिर क्यों हमारे बहादुर एजेंट अनसंग और अज्ञात मर जाते हैं.'
यहां जानकारी के लिए बात दें कि हरिंदर सिक्का को सहमत की बहादुरी की कहानी लिखने में करीब 7 साल का समय लगा था. खुद भी एक नेवल ऑफिसर रहे सिक्का सहमत के बेटे की मदद से सहमत तक पहुंचे और जानकारी जुटाई. सहमत ने खुद इस बात का जिक्र किया था कि पाकिस्तान में रहकर भारत के लिए जासूसी के मिशन में वह कामयाब रहीं, लेकिन इस मिशन में कई हत्याएं हुईं जिनमें से एक उनके पति भी थे.