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रजनीकांत की पॉलिटिकल ताकत के आगे झुकेंगे CM बनने वाले विजय? बिना राजनीति सत्ता पलट चुके हैं थलाइवा

तमिलनाडु में विजय की राजनीतिक जीत के बाद उनके फैन्स और रजनीकांत फैन्स के बीच राइवलरी फिर तेज हो गई है. लेकिन इस फैन वॉर के बीच 1996 का वो किस्सा बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है, जब ट्रैफिक में फंसे रजनीकांत ने, मुख्यमंत्री जयललिता की राजनीति का पूरा खेल बदल दिया था.

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रजनीकांत और विजय की फैन राइवलरी कैसे हुई थी शुरू? (Photo: ITGD)
रजनीकांत और विजय की फैन राइवलरी कैसे हुई थी शुरू? (Photo: ITGD)

तमिलनाडु में सिनेमा और पॉलिटिक्स इतने ज्यादा जुड़े हुए हैं कि कई मौकों पर दोनों में फर्क करना मुश्किल हो जाता है. तमिल सिनेमा के सुपरस्टार थलपति विजय का चुनाव जीतना और मुख्यमंत्री बनने के करीब पहुंचना, एक बार फिर से इस फर्क को कम कर रहा है. अपनी फिल्मों में लगातार सोशल और पॉलिटिकल मैसेज शेयर करते आ रहे विजय अब खुद तमिलनाडु की राजनीति के केंद्र में हैं. इससे उनके वो करोड़ों फैन्स भी उत्साह में हैं जिन्होंने उन्हें राजनीतिक मंच तक पहुंचाया है.

और फिल्म स्टारों को पूजने का कल्चर शुरू करने वाली तमिल इंडस्ट्री में फैन्स का उत्साह कुछ नई खुराफात न छेड़ दे, ये कैसे हो सकता है! तो विजय की जीत के बाद से उनके कुछ फैन्स सोशल मीडिया पर 'थलाइवा' रजनीकांत को टारगेट करने लगे हैं, जिन्हें तमिल सिनेमा का सबसे बड़ा सुपरस्टार माना जाता है. लेकिन खुद कभी पॉलिटिक्स में डायरेक्ट न उतरने वाले रजनीकांत की पॉलिटिकल ताकत क्या कर सकती है, इसकी रियल कहानी किसी ब्लॉकबस्टर से कम नहीं है.

क्यों है विजय वर्सेज रजनीकांत फैन वॉर?
रजनीकांत करीब पांच दशक से तमिल सिनेमा के सबसे बड़े सुपरस्टार रहे हैं. कमल हासन को सिनेमा के व्याकरण का उस्ताद होने के नाते सम्मान दिया जाता है. मगर रजनीकांत तमिल सिनेमा के बिजनेस को लगातार दौड़ाने वाले इंजन की तरह रहे हैं. मगर 2000 के दशक से ही विजय भी सुपरस्टार बनकर उभरे हैं.

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लगातार बड़ी-बड़ी हिट फिल्में देते विजय उस समय बॉक्स ऑफिस पर छाए रहे, जब 2010 में एंथिरन (रोबोट) के बाद रजनी ने एक स्लो दौर देखा. 2018 में 2.0 ने उन्हें उस ऊंचाई पर पहुंचाया, जिसके लिए वो जाने जाते हैं. मगर इसके बाद वो फिर स्लो पड़े और जेलर (2023) से ही फिर बुलंदी पर पहुंच सके.

2010 के बाद से जब-जब रजनीकांत स्लो रहे, विजय उस दौर में तमिल इंडस्ट्री को लगातार बड़ी-बड़ी हिट्स देते रहे. छोटी हिट्स नहीं, रजनीकांत लेवल की हिट्स! इसलिए थलपति फैन्स उन्हें अगला 'थलाइवा' कहने लगे. जेलर से रजनी ने 600 करोड़ वर्ल्डवाइड बिजनेस के साथ शानदार कमबैक किया, तो उसी साल विजय की लियो भी 600 करोड़ पर पहुंच गई. तब से थलाइवा और थलपति फैन्स की राइवलरी और तेज हो गई.

'छोटी सी कहानी'
विजय की स्पीच का एक सिग्नेचर स्टाइल है— 'कुट्टी स्टोरी'. हिंदी में कहें तो 'एक छोटी सी कहानी'. अपनी फिल्मों से जुड़े इवेंट्स में विजय स्पीच में एक कुट्टी स्टोरी जरूर सुनाते हैं. लेकिन तमिल सिनेमा में फैन्स की राइवलरी को तब हवा मिली जब जेलर से धमाकेदार कमबैक करने वाले रजनीकांत ने फिल्म के ऑडियो लॉन्च में एक कुट्टी स्टोरी सुना डाली— एक कौवे और एक बाज की. आसमान में कौवे कई होते हैं और वो बाज से कॉम्पिटीशन करने के चक्कर में रहते हैं. लेकिन कौवा कभी बाज नहीं बन सकता क्योंकि वो बाज जितनी ऊंचाई पर कभी नहीं उड़ सकता.

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विजय फैन्स ने निचोड़ निकाला कि थलाइवा ने उनके थलपति के 'पेंच कसने' के अंदाज में ये कहानी सुनाई है. लियो के सक्सेस इवेंट पर विजय ने अपने फैन्स को फिर एक कुट्टी स्टोरी सुनाई— दो शिकारी एक जंगल में शिकार करने गए. एक ने तीर चलाकर खरगोश का शिकार किया, दूसरा भाले से हाथी का शिकार करने में नाकाम हुआ. तो वापस लौटने पर किसे ज्यादा कामयाब माना जाए? विजय ने कहा— भाले वाले को, क्योंकि उसने ज्यादा बड़ी कोशिश की! मगर इस कहानी में जंगल के जानवरों का जिक्र करते हुए जब विजय ने 'बाज' का नाम लिया, तो रजनी फैन्स को लगा कि उनके थलाइवा को टारगेट किया गया है.

इसी इवेंट पर विजय के फैन्स को ईंधन देते हुए लियो के राइटर ने टिप्पणी कर दी कि 'बाज कितना भी ऊंचा उड़े, भूख लगेगी तो नीचे ही आना पड़ेगा.' फैन्स का उत्साह हिलोरें भरने ही लगा था कि विजय ने इसी इवेंट पर अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत का हिंट दे दिया. और एक लाइन में स्पष्ट कर दिया कि वो किसी तरह की राइवलरी में यकीन नहीं करते और तमिल सिनेमा में अपने सीनियर्स की बराबरी करने का सोचते भी नहीं. उन्होंने कहा— 'केवल एक पुराची थलाइवर (स्वर्गीय एमजीआर) हैं, केवल एक नदिगर तिलकम (शिवाजी गणेशन), एक ही पुराची कलैगनार कैप्टन (सुपरस्टार विजयकांत), एक उलगानायगन (कमल हासन), एक ही सुपरस्टार (रजनीकांत) और केवल एक थाला (अजित कुमार).'

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रजनीकांत ने भी इसके बाद एक इवेंट में विजय के पिता एस ए चंद्रशेखर की फिल्म याद की, जिसके सेट पर उन्होंने पहली बार तमिलनाडु के भावी मुख्यमंत्री को देखा था. रजनीकांत ने कहा कि उनकी कौवे और बाज की कहानी को लोगों ने विजय पर अटैक समझ लिया, जिससे उन्हें बहुत बुरा लगा. 'विजय मेरी नजरों के सामने बड़े हुए हैं. वो अपनी कड़ी मेहनत और अनुशासन के कारण एक-एक कदम चलकर आज एक शानदार स्टार बने हैं. मेरा विजय को अपना कॉम्पिटीटर बताना, खुद को शर्मिंदा करने जैसा होगा.' इसलिए मैं हमारे फैन्स से अनुरोध करता हूं कि लड़ना बंद करें.'

मगर फैन्स कहां मानते हैं. विजय ने चुनाव जीता तो कई विजय फैन्स ने रजनीकांत को ट्रोल करना शुरू कर दिया. एक यूजर ने लिखा कि 'अब रजनीकांत को अपना काफिला निकालने के लिए विजय के प्रशासन की इजाजत लेनी पड़ेगी!' जबकि एक यूजर ने सोशल मीडिया पर लिखा, 'विजय की TVK की परफॉरमेंस देखने के बाद रजनीकांत को एहसास हो रहा होगा कि अगर वो समय पर पॉलिटिक्स में आ जाते तो तमिलनाडु के मुख्यमंत्री होते.' लेकिन क्या रजनीकांत को अपनी पावर दिखाने के लिए राजनीति में आने की जरूरत है? इसका जवाब करीब 30 साल पुरानी एक और 'कुट्टी स्टोरी' में छुपा है.

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जब ट्रैफिक जाम में फंसे रजनी और छिन गई जयललिता की कुर्सी
शायद थलपति फैन्स को उस दौर के बारे में खबर नहीं है जब थलाइवा की टेढ़ी नजर ने तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता को उनकी कुर्सी से हटा दिया था. ये कहानी रजनीकांत की बायोपिक द नेम इज रजनीकांत में दर्ज है. फिल्मों से राजनीति में आईं जयललिता ने 1991 में शानदार चुनावी जीत के बाद तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनी थीं. उनकी पार्टी ने राज्य की 234 में से 225 सीटों पर जीत हासिल की थी.

रजनी की बायोग्राफी कहती है कि जयललिता 'महारानी की तरह' जिंदगी जी रही थीं, आम जनता की परवाह किए बिना. उनके काफिले को जगह देने के लिए पूरे चेन्नई शहर में ट्रैफिक जाम लग जाना बहुत आम बात थी. ऐसे ही एक जाम में एक बार रजनी की कार भी फंस गई. एक वर्दीधारी सीनियर ऑफिसर आए और माफी मांगते हुए बोले कि जब तक मुख्यमंत्री का काफिला नहीं निकल जाता, जाम खत्म नहीं होगा. इसमें आधा घंटा लग सकता है. रजनी बोले कि इतनी बड़ी तो कोई कार नहीं होती जिसे निकलने में आधा घंटा लगे! मुख्यमंत्री साहिबा के क्रॉस करने से पहले तक तो लोगों को आने-जाने दें. जवाब मिला— 'सॉरी सर, आदेश हैं.'

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रजनी कार से उतरे, सड़क किनारे एक टपरी पर पहुंचे, सिगरेट का पैकेट लिया और वहीं खड़े होकर कश मारने लगे. लोगों का जैसे ही ध्यान गया कि ट्रैफिक में उनके साथ और कौन फंसा है, तो रजनीकांत को देखने के लिए भीड़ जुटने लगी. चेन्नई का डॉक्टर राधाकृष्णन रोड, जहां ये सब चल रहा था, थोड़ी देर में खचाखच भर गया. हालात बेकाबू होने की आशंका में वो पुलिस ऑफिसर फिर दौड़े हुए रजनी के पास आए और रिक्वेस्ट करने लगे कि वो उस जगह से निकल जाएं. इस बार रजनी ने जवाब दिया, 'मैं तो मुख्यमंत्री साहिबा के निकल जाने का इंतजार कर रहा हूं. मुझे यहां इंतजार करने में कोई दिक्कत नहीं है.'

ये घटना उन कई वजहों में से एक है जिसके कारण 1996 के तमिलनाडु चुनाव में रजनीकांत ने जयललिता की विरोधी पार्टी DMK और तमिल मानिला कांग्रेस (TMC) पार्टी के गठबंधन को सपोर्ट किया. TMC पार्टी बनाए जाने में भी उनका बड़ा रोल था. इस गठबंधन के लिए रजनीकांत ने प्रचार भी किया और एक जगह अपनी स्पीच में कहा— 'अगर जयललिता फिर से सत्ता में आईं तो ईश्वर भी तमिलनाडु को नहीं बचा पाएगा.'

रजनीकांत की एक लाइन का असर ये था कि 1991 में 225 सीटें लाने वाली जयललिता की पार्टी AIADMK को 1996 में मात्र 4 सीटें मिलीं. जयललिता खुद अपनी सीट नहीं बचा पाईं. सुपरस्टार रजनीकांत ने रियल लाइफ में ब्लॉकबस्टर कहानी रच दी थी. इसके बाद भी वो खुद कभी राजनीति में नहीं आए, मगर नेताओं को समझ आ गया था कि उनको छेड़ने से बचना है.

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हालांकि रजनीकांत अपनी तरह के अनोखे आदमी हैं. 2002 के बाद वो पोएस गार्डन इलाके में जयललिता के पड़ोसी भी बन गए थे. उन्होंने 2004 में अपनी बेटी ऐश्वर्या की शादी के लिए जयललिता को ये सोचते हुए न्यौता भेजा कि वो नहीं आएंगी. उसी दिन जयललिता के एक पार्टी मेम्बर की भी शादी थी. लेकिन उसे उन्होंने शादी टालने को कह दिया और रजनी के घर पहुंचीं. 2016 में जयललिता के निधन के बाद प्रार्थना सभा में रजनीकांत ने कहा था, 'वो 1996 में मेरी वजह से चुनाव हार गई थीं. मैंने उन्हें दुख पहुंचाया था. वो कोहिनूर का हीरा थीं.'

इन थलाइवा को अब थलपति फैन्स छेड़ रहे हैं. लेकिन उन्होंने तभी विजय को अपनी पार्टी बनाने पर भी शुभकामनाएं दी थीं और अब चुनाव जीतने पर भी बधाई दी है. ऐसे में कहीं विजय फैन्स की बातें रजनी को बुरी लग गईं तो!

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