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Movie Review: उम्दा संवादों वाला राजनीतिक व्यंग्य है फिल्म 'जेड प्लस'

फिल्म जेड प्लेस को उन्हें जरूर देखना चाहिए जिन्हें कुछ हटकर फिल्में पंसद हैं. ईमानदार ढंग से हालात दिखाती फिल्में पसंद हैं. जिन्हें पर्दे पर असली किरदार और उनका विरोधाभास देखना पसंद है. यह फिल्म राजनीतिक व्यंग्य की एक अच्छी कोशिश है.

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Zed plus movie review
Zed plus movie review

फिल्म रिव्यूः जेड प्लस
एक्टरः आदिल हुसैन, मोना सिंह, मुकेश तिवारी, कुलभूषण खरबंदा, संजय मिश्रा, राहुल सिंह, शिवानी तंकसाले, केके रैना, एकावली खन्ना, अनिल रस्तोगी
म्यूजिकः सुखविंदर सिंह, नायाब
स्टोरीः रामकुमार सिंह
डायरेक्टरः चंद्रप्रकाश द्विवेदी
रेटिंगः 5 में 3 स्टार

मुल्क की डगर अगर-मगर के फेर में सतर नहीं है. ऐसे में जब गड्डी छलांगा मारकर या फिर धीमे-धीमे भी चलती है, तब भी राह के रोड़े और कीलें छेद कर ही देती हैं. तब हमें याद आता है सड़क किनारे काले मटमैले कपड़ों में टायरों की छुटंकी दीवार के पीछे तसले में हाथ घुमाता इंसान. पंक्चर वाला. ऐसा ही एक पंक्चरवाला है असलम, जो राजस्थान के फतेहपुर इलाके में रहता है. कुछ आम, कुछ बदमाश सी जिंदगी जीता. उसकी जूतियों की दुकान चलाने वाली बीवी हमीदा है. एक बच्चा है. एक दोस्त की बेवा सईदा है, जो अब उसकी माशूका है. एक खुर्राट शायर पड़ोसी हबीब है, उसकी भी कभी लड़ंकू तो कभी समझदार बीवी फौजिया है. कस्बे की चौपाल जमाता पान वाला है, जिसके नाम का शॉर्ट फॉर्म बीबीसी है. धंधा है, मुश्किलें हैं. खुशियां हैं और कुछ झगड़े भी. जेड प्लस का गाना, पल में पलट गई बाजी

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ऐसा ही एक झगड़ा फतेहपुर की मजार को लेकर भी है. सैकड़ों परिवार उस पर दावा जताते हैं और फैसला होता है कि सबको मिलेगा एक दिन का खादिम बनने का मौका, बारी-बारी.

अब जरा इस कस्बे की कामचलाऊ जिंदगी से उठकर मुल्क की तारीख लिखने वाले हुक्मरानों की तरफ नजर घुमाते हैं. यहां गठबंधन का धर्म निभाते एक ईमानदार मगर कमजोर प्रधानमंत्री हैं. उनकी शातिर परछाईं है एक ब्यूरोक्रेट दीक्षित, जिसे पीएम साहब अपने अंग्रेजी तखल्लुस में डिक शिट बोलते हैं. पीएम बहुमत के लिए घिरे हुए हैं. बंगाल की एक फायरब्रांड नेता ने कालीन घसीट ली है. ऐसे में वह दीक्षित की सलाह पर पीर बाबा के दर्शन के लिए जाते हैं. इत्तफाक उस दिन खादिम हमारा असलम पंक्चरवाला है. जियारत के दौरान असलम अपनी मामूली सी मुश्किल साझा करता है. हमेशा की तरह हुक्मरान कुछ का कुछ मतलब निकालते हैं. इंडिया बनाम भारत का रूपक जिंदा करते. बहरहाल, पीएम कुछ खैरात देते हैं, मगर ऐसी जैसी गरीब के दरवाजे हाथी बंधवा दें. जेड प्लस सिक्युरिटी में आए असलम की जिंदगी आफत कर देती है. इस कदम का औचित्य सही ठहराने के लिए कई राजनीतिक, सामाजिक ताकतें और अपराधी पाला चुन मैदान में आ जाते हैं. आखिर में झूठ का कुहासा छंटता है और लोकतंत्र को एक नई सुबह दिखती है. सच की.

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ये तो थी फिल्म की रूपरेखा. अब बात करते हैं इसकी खूबियों पर. फिल्म की कहानी के ज्यादातर बारीक ब्यौरे सच्चे और अच्छे हैं. मसलन, शुरुआती दृश्य में ही जब हम असलम को काम करते देखते हैं, तो उसके हाथों पर लगी कारोंच इस बात की तस्दीक करती है कि वाकई आदिल हुसैन अपने किरदार में गहरे पैठे हैं. इसी तरह पान वाले की दुकान के आसपास का गठन हो या फिर हामिदा का घर और दुकान.

इसके अलावा किरदारों का चयन और उनकी एक्टिंग भी उम्दा है, एक को छोड़कर. दक्षिण भारतीय प्रधानमंत्री के रोल में कुलभूषण खरबंदा जैसा मंझा हुआ एक्टर गले नहीं उतरता. उनकी एक्टिंग हमेशा की तरह उम्दा है, मगर किरदार दक्षिण भागता है और वह उत्तर में उतराते नजर आते हैं. इस तरफ ध्यान न दें तो लीड रोल में आदिल हुसैन बहुत खूब लगे हैं. एक दम प्रामाणिक. खास तौर पर बीच फिल्म में उनका एक केंचुली उतार खुर्राट राजनेता बनना बहुत ही स्वाभाविक ढंग से होता नजर आया है. फिल्म 'जेड प्लस' का ट्रेलर

हमीदा के रोल में जो एक गर्वीली गरीबी है, उसे मोना सिंह बखूबी अपनी देह भाषा से दर्शाती हैं. फिल्म का सरप्राइज पैकेज हैं मुकेश तिवारी. असलम के निकम्मे शायर पड़ोसी के रोल में उन्होंने अपनी एक्टिंग की रेंज का परिचय दिया है. मुकेश को लाउड रोल मिलते रहे हैं. यह कुछ अलग था. और उम्दा भी. केके रैना भी खुर्राट दीक्षित की बेशरम बदमिजाजी को पैनापन देते हैं.

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फिल्म के संवाद सुकूनबख्श हैं. सिनेमा की नई जमीन की नई फसल सा एहसास देते. जेड प्लस देखने के दौरान आपको नई किस्म की भाषा, मुहावरों और कहन का परिचय मिलेगा. एक राजनीतिक व्यंग्य वाली फिल्म में संवादों का तीखा होना भी जरूरी है. बिना ज्यादा प्रकट हुए. उसमें भी फिल्म सफल होती है और इसके लिए राजकुमार सिंह और चंद्रप्रकाश द्विवेदी बधाई के पात्र हैं. मसलन, जब हमीदा कहती है कि नींद बेचकर बिस्तर नहीं खरीदा जाता है. या फिर एक जगह असलम किसी वाकये पर अफसर से पूरी मासूमियत के साथ कहता है, क्या प्रधानमंत्री भी गलती करते हैं.

अब बात कमजोरियों की. फिल्म की कहानी शुरुआत में उम्मीद जगाती है. लगता है कि एक कस्बे और एक किरदार की कहानी जनपथ से राजपथ तक के सफर में कई गांठें खोलेगी. पीपली लाइव की तरह. मगर आखिर में इसमें झोल ही झोल नजर आने लगते हैं. फिल्म का क्लाइमेक्स हो या फिर कई उपकथाओं को अधूरा छोड़ देना. या फिर गानों या प्रकरणों को तुरत फुरत स्पार्क पैदा करने के लिए ठूंस देना. असलम और हबीब कभी दोस्त थे. फिर दुश्मन हो गए. आखिर में फिर दोस्त. मगर रकीब क्यों बने, ये बताने की जरूरत नहीं समझी गई. इसी तरह बॉर्डर के डाकू के रोल में संजय मिश्रा को बस इसलिए रख दिया गया ताकि कॉमेडी का एक और कोटा पूरा हो सके. उनका किरदार भरवां सा लगा. फिल्म के गाने भी यूं ही तगादे का तकाजा पूरा करने के लिए डाले गए लगे. हालांकि राहत बस इतनी है कि ये कहीं भी फिल्म की गति रोकते हुए बीच में नहीं आते. ज्यादातर पार्श्व में ही चलते हैं.

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डायरेक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी के सिनेमा की खासियत उनके किरदारों का गाढ़ापन होता है. यहां भी वह यह काम बखूबी करते हैं. मगर संगीत और प्रामाणिक होता, कहानी और भी चुस्त, तो बात और भी बेहतर होती.

फिल्म जेड प्लेस को उन्हें जरूर देखना चाहिए जिन्हें कुछ हटकर फिल्में पंसद हैं. ईमानदार ढंग से हालात दिखाती फिल्में पसंद हैं. जिन्हें पर्दे पर असली किरदार और उनका विरोधाभास देखना पसंद है. यह फिल्म राजनीतिक व्यंग्य की एक अच्छी कोशिश है.

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