अंग्रेजी हुकूमत से भारत को आजादी मिले 79 साल बीत चुके हैं. 15 अगस्त 1947 का दिन इस देश ने बड़ी धूम धाम से मनाया था. करीब 200 साल तक भारत में अपना खूंटा गाड़कर बैठे अंग्रेजों ने यहां बहुत जुल्म ढाए. उनसे आजादी की लड़ाई लड़ना कितना मुश्किल रहा, ये आज की जेनरेशन के लिए जानना बेहद जरूरी है. 20वीं सदी की शुरुआत में भारत के अंदर कई आंदोलन लड़े गए, ताकि अंग्रेजों को यहां से निकाला जाए. इसमें कई लोगों ने ब्रिटिश राज के खिलाफ बगावत की कोशिश की, जिसके कारण कुछ की मौत हुई. उन्होंने अपने देश के लिए बलिदान दिया. चूंकि इस लड़ाई में कई स्वतंत्रता सेनानी शामिल थे, इसलिए कुछ वक्त से साथ गुमनाम हो गए.
मगर अब अमेजॉन प्राइम उन्हीं गुमनाम वीरों की गाथा लाया है. द रिवोल्यूशनरीज नाम से वेब सीरीज आई है, जो 20वीं सदी में लड़े गए गदर आंदोलन की एक अनकही-अनसुनी कहानी है. उस आंदोलन में राशबिहारी बोस, बाघा जतिन और सचिंद्रनाथ सान्याल ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई थी. शो में ये किरदार में भुवन बाम, गुरफतेह पीरजादा और रोहित सराफ ने प्ले किए हैं. इसमें लापता लेडीज वाली प्रतीभा रांता भी हैं, जिन्होंने एक बेहद अहम किरदार निभाया. कैसी है आजादी की लड़ाई की ये अनसुनी कहानी? आइए, विस्तार से बात करते हैं...
क्या था गदर आंदोलन?
गदर आंदोलन का मकसद सिर्फ एक ही था- भारत से ब्रिटिश राज की छुट्टी. इस आंदोलन को सफल बनाने के लिए राशबिहारी बोस (भुवन बाम) अपना पहला वार भारत के वाइसरॉय लॉर्ड हार्डिंगे पर करते हैं. 1912 में वो दिल्ली में उनके ऊपर बम से हमला करते हैं. बदकिस्मती से उनकी जान बच जाती है, जिससे ब्रिटिश राज में भी अफरा-तफरी का माहौल बनता है. सभी अब उस गद्दार को ढूंढने निकले हैं, जिसने वाइसरॉय पर हमला किया. इस काम के लिए जनरल डायर (जेसन शाह) को चुना जाता है, तो तब लेफ्टिनेंट के पद पर थे. वो किसी तरह राशबिहारी बोस का पर्दाफाश करके उन्हें ब्रिटिश राज का सबसे आतंकवादी घोषित करार देता है.
राशबिहारी बोस किसी तरह अपनी जान बचाकर बनारस सान्याल परिवार के पास पहुंचते हैं, जो आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाते हैं. वहां उनकी मुलाकात सचिंद्रनाथ सान्याल (रोहित सराफ) से होती है, जिनके अंदर देशभक्ति का खून दौड़ रहा है. वो राशबिहारी बोस के संग मिलकर गदर आंदोलन का हिस्सा बन जाते हैं. इन दोनों के साथ बाघा जतिन (गुरफतेह पीरजादा) भी जुड़ जाते हैं, जो राशबिहारी की तरह कलकत्ता के सबसे बड़े आतंकवादी घोषित थे.
राशबिहारी, सचिंद्रनाथ और बाघा जतिन अंग्रेजी हुकूमत से छिपकर उनको खत्म करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाते हैं. इसमें उन्हें प्रतिभा लहिरी (प्रतिभा रांता), पिशिमा (पाउली दाम), करतार सिंह सराभा (कशिश सलूजा) और पी एन टैगोर (के.सी.शंकर) जैसे दूसरे स्वतंत्रता सेनानियों का साथ मिलता है. अब क्या इतनी बड़ी फौज अंग्रेजों को हराने में कामयाब हुई थी? क्या उनका गदर आंदोलन कामयाब हुआ था? यही इस सीरीज में आपको देखकर पता लगने वाला है.
दिलचस्प कहानी बनी बोरिंग
डायरेक्टर निखिल आडवाणी ने इस सीरीज को बनाया है, जो इससे पहले सोनी लिव पर 'फ्रीडम एट मिडनाइट' जैसा पॉपुलर शो भी बना चुके हैं. वो शो भारत की आजादी और विभाजन की पृष्ठभूमि पर बना था. उसमें उनका डायरेक्शन स्टाइल, स्क्रीनप्ले और स्टोरी में आए ट्विस्ट और टर्न काफी मेजदार थे. मगर द रिवोल्यूशनरीज शो में उस चीज की कमी नजर आई है. शो का स्क्रीनप्ले काफी कमजोर सा है. आठ एपिसोड्स की ये सीरीज का हर एपिसोड करीब 50 मिनट के आसपास है, और सच कहूं तो ये रन टाइम महसूस भी होता है. गदर आंदोलन की कहानी पन्ने पर देखें, तो काफी जबरदस्त है और भारत के हर नागरिक को इसके बारे में जानकारी मिलनी चाहिए.
लेकिन डायरेक्टर निखिल आडवाणी ने इस दिलचस्प लगने वाली कहानी को काफी बोरिंग सा बना डाला. डायरेक्टर ने काफी सारा टाइम स्टोरी को बिल्डअप करने में खर्च कर दिया, जिससे मजा उतना नहीं आया. अगर आखिरी के दो एपिसोड्स को छोड़ दिया जाए, तो बाकी एपिसोड्स ने निराश किया. ये एक अच्छी कहानी थी, जो मेरा ध्यान स्क्रीन पर पूरे समय बांधे रखने में असफल रही. इसके अलावा शो से वो इमोशनल कनेक्ट भी मिसिंग था, जो अक्सर देशभक्ति वाली फिल्मों में मौजूद रहता है.
हमें कहानी का उद्देश्य पता है, लेकिन इसमें वो इमोशन कहां हैं जिससे हम किरदारों से कनेक्ट कर सकें. ना स्टोरी में कोई खास प्लॉट ट्वि्स्ट था, जो अगले एपिसोड को देखने की दिलचस्पी बढ़ा सके. सीरीज में एक चीज की तारीफ इस बात पर बनती है कि मेकर्स ने आजादी के समय वाली फील देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. शो की सेट डिजाइनिंग काफी अच्छी थी. 1913-1920 के दौर वाला कलकत्ता जैसा दिखना चाहिए, इसमें वैसा दिखाने की कोशिश की गई है. साथ ही में बनारस की खूबसूरती को भी बढ़िया से कैप्चर किया गया. शो में गाने और बैकग्राउंड म्यूजिक भी तगड़े थे.
यहां देखें सीरीज का ट्रेलर:
बोरिंग शो में तगड़ी है सबकी एक्टिंग
द रिवोल्यूशनरीज वेब सीरीज में कास्ट काफी अच्छी थी. अगर मेन एक्टर्स की बात करें, तो रोहित सराफ, गुरफतेह पीरजादा और प्रतिभा रांता का काम शानदार था. लेकिन भुवन बाम इसके असली हीरो थे. ऐसा लगा कि मानो उन्होंने अपने कंधों पर इस शो को उठाया हुआ था. अपने यूट्यूब चैनल से भुवन ने ये तो साबित कर दिया था कि वो एक ही समय में कई सारे अलग-अलग किरदार निभा सकते हैं. उनके पास बढ़िया एक्टिंग रेंज है, जो इस शो में भी अच्छे से नजर आई.
उनका साथ गुरफतेह पीरजादा और रोहित सराफ ने भी बखूबी निभाया. रोहित के चार्म और गुरफतेह के एक्सप्रेशन, सभी कमाल के लगे. तीनों जब एक साथ स्क्रीन पर दिखे, तो उनके बीच वो केमिस्ट्री भी नजर आई, जिसकी जरूरत थी. वहीं प्रतिभा रांता जो लापता लेडीज की सक्सेस के बाद पहली बार नजर आईं, उन्होंने भी निराश नहीं किया. उनकी खूबसूरती ने शो में चार चांद लगाने वाला काम किया. उनका स्क्रीनटाइम भले ही कितना हो, मगर उन्होंने भी अपनी छाप छोड़ी. जनरल डायर के रोल में जेसन शाह भी लाजवाब थे. उन्होंने एक क्रूर जनरल डायर को अच्छे से स्क्रीन पर पेश किया.
कुल मिलाकर ये एक ऐवरेज शो है, जिसमें कहानी और एक्टिंग जबरदस्त थी. लेकिन उसे दिखाने का तरीका अच्छा नहीं था. अगर आप इतिहास में दिलचस्पी रखते हैं, तो ये सीरीज आपके लिए ही बनी है. अगर आप भुवन बाम के फैन हैं, तो इसे देखने के बाद आप बिल्कुल भी निराश नहीं होने वाले. ये शो पूरे परिवार के साथ बिना किसी झिझक देखा जा सकता है, क्योंकि इसमें कोई भी बेफिजूल का इंटीमेट सीन नहीं है. हां बस एक-दो गालियां हैं, लेकिन सिचुएशन के हिसाब से वो भी चल जाती है.