सोचिए, आप 1982 की एक शांत-सुंदर अमेरिकी कॉलोनी में आराम से रह रहे हैं. घर, परिवार, पड़ोसी, बच्चे... सब कुछ एकदम परफेक्ट. फिर अचानक रोशनी चमकती है, धरती कांपती है और खिड़की के बाहर इंसानों की जगह करोड़ों साल पुराने डायनासोर घूमते नजर आते हैं. ‘द एंड ऑफ ओक स्ट्रीट’ का आइडिया ही इतना जंगली है कि इसे देखने के लिए लॉजिक को घर पर छोड़कर पॉपकॉर्न लेकर थिएटर पहुंचना बनता है.
आजादी के मौके पर सिनेमाघरों में बंटवारा 1947 और आवारापन 2 के साथ ही फिल्म 'द एंड ऑफ ओक स्ट्रीट' रिलीज हुई. कैसी है ये फिल्म आइये बताते हैं.
फिल्म की कहानी ओक स्ट्रीट में रहने वाले प्लेट परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है. डेनिस (ऐनी हैथवे) अपने घरेलू जीवन से परेशान है और चुपके से घर छोड़ने पर एक किताब लिख रही है. पति ग्रेग (इवान मैकग्रेगर) की नौकरी जा चुकी है और वह अपनी परेशानियां छिपाने की कोशिश कर रहा है. बेटी ऑड्रे और बेटा ब्रायन भी अपनी-अपनी दुनिया में उलझे हैं. लेकिन परिवार की असली परीक्षा तब शुरू होती है, जब एक रहस्यमयी घटना पूरी कॉलोनी को करीब 25 करोड़ साल पीछे उस दौर में पहुंचा देती है, जहां से मानव इतिहास की शुरुआत हुई थी.
अब सामने हैं टी-रेक्स जैसे खूंखार शिकारी, उड़ते प्टेरोडैक्टिल और ऐसे तमाम जीव, जिनके सामने घर का दरवाजा बंद करना भी बेकार लगता है. फिल्म का मजा इसी बात में है कि डायनासोर और अमेरिकी सबअर्बन जिंदगी का ऐसा कॉम्बिनेशन शायद ही आपने पहले देखा हो.
डायनासोरों का आतंक, लेकिन अंदाज पूरा मसालेदार
डायरेक्टर डेविड रॉबर्ट मिशेल ने फिल्म को कोई भारी-भरकम वैज्ञानिक व्याख्या बनाने की कोशिश नहीं की है. टाइम-ट्रैवल कैसे हुआ, स्पेस में क्या हुआ- इन सवालों के जवाब बहुत गहराई से नहीं मिलते. फिल्म बस इतना कहती है कि रहस्यमयी कॉस्मिक घटना ने सबकुछ उलट-पुलट कर दिया और फिर सीधे असली खेल शुरू हो जाता है.
और यही फिल्म की सबसे बड़ी ताकत भी है. कहानी जैसे ही डायनासोरों के बीच पहुंचती है, फिल्म रफ्तार पकड़ लेती है. कहीं शिकारी जीव झाड़ियों में छिपे हैं, कहीं घर के आसपास मंडरा रहे हैं और कहीं अचानक हमला कर देते हैं. कई सीन्स में डायनासोरों को पूरा दिखाने के बजाय उनके शरीर का कुछ हिस्सा छिपाकर डर पैदा किया गया है, जिससे सस्पेंस बढ़िया बनता है.
ऐनी हैथवे बनीं ‘डायनासोर स्लेयर’
ऐनी हैथवे को एक परेशान मां से लेकर हाथ में बंदूक थामकर डायनासोरों से भिड़ती महिला के रूप में देखना फिल्म के मजेदार हिस्सों में से एक है. इवान मैकग्रेगर भी परिवार को संभालने की कोशिश करते हुए अपने किरदार में अच्छा रंग भरते हैं. बच्चों के किरदार भी कहानी को हल्का और एंटरटेनिंग बनाए रखते हैं.
और हां, परिवार का प्यारा कुत्ता स्टारबक भी फिल्म का ऐसा किरदार है, जिसके लिए आप दिल से दुआ करेंगे. उसके कुछ पल तो बाकायदा थिएटर में बैठे दर्शकों को खुश करने वाले हैं.
विजुअल्स और डायनासोर हैं असली हीरो
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी कमाल की है. कैमरा कभी बाड़, झाड़ियों या खिड़कियों के पीछे से डायनासोरों की मौजूदगी महसूस कराता है तो कभी पूरे इलाके को ही खतरनाक जंगल में बदल देता है. डायनासोरों को सिर्फ कंप्यूटर से बने राक्षस की तरह नहीं, बल्कि एक अलग दुनिया के जीवों की तरह पेश किया गया है.
खासकर कुछ हमले ऐसे हैं जो खूंखार भी हैं और मजेदार भी. फिल्म खून-खराबे से बिल्कुल नहीं घबराती. लोग काटे जाते हैं, कुचले जाते हैं और डायनासोरों का निवाला बनते हैं. यानी बच्चों वाली प्यारी डायनासोर फिल्म समझकर गए तो कुछ सीन्स आपको चौंका सकते हैं.
कमी कहां रह गई?
फिल्म का सबसे कमजोर हिस्सा इसकी कहानी और वैज्ञानिक व्याख्या है. इतने बड़े आइडिया के बावजूद टाइम-डिस्प्लेसमेंट को लेकर फिल्म बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करती. परिवार के भीतर चल रही परेशानियां भी दिलचस्प शुरुआत के बाद ज्यादा गहराई नहीं पकड़ पातीं.
ओक स्ट्रीट के बाकी लोग भी ज्यादातर कहानी में बस डायनासोरों के शिकार बनने या बैकग्राउंड भरने के लिए नजर आते हैं. अगर फिल्म इंसानों और डायनासोरों के इस अजीब को-एग्जिस्टेंस को थोड़ा और खंगालती, तो कहानी में ज्यादा वजन आ सकता था. लेकिन अगर आप इसे दिमाग लगाने वाली साइंस-फिक्शन नहीं, बल्कि डायनासोरों वाला धमाकेदार पॉपकॉर्न एंटरटेनर मानकर देखेंगे, तो मजा काफी आएगा.
‘द एंड ऑफ ओक स्ट्रीट’ में कुछ चीजें बेतुकी हैं, कुछ सवालों के जवाब गायब हैं और कहानी कई जगह हल्की पड़ जाती है. लेकिन डायनासोरों का रोमांच, 80 के दशक की नॉस्टैल्जिया, ऐनी हैथवे का एक्शन अवतार और खतरनाक क्रिएचर्स फिल्म को एक मजेदार थिएटर राइड बना देते हैं.
अगर आपको डायनासोर, खून-खराबा, नॉस्टैल्जिया और बिना ज्यादा दिमाग लगाए पॉपकॉर्न एंटरटेनमेंट पसंद है, तो यह फिल्म आपको निराश नहीं करेगी.