उस्ताद नुसरत फतेह अली खान (Nusrat Fateh Ali Khan) पाकिस्तान के प्रसिद्ध गायक, संगीतकार, गीतकार और कव्वाल थे. उन्हें दुनिया भर में कव्वाली संगीत को लोकप्रिय बनाने का श्रेय दिया जाता है. उनका जन्म पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के लायलपुर (वर्तमान फैसलाबाद) में एक संगीत से जुड़े परिवार में हुआ था. उनका परिवार कई पीढ़ियों से कव्वाली की परंपरा को आगे बढ़ाता आ रहा था.
नुसरत फतेह अली खान के पिता फतेह अली खान स्वयं एक संगीतज्ञ, गायक और कव्वाल थे. हालांकि शुरुआत में उनके पिता चाहते थे कि नुसरत डॉक्टर या इंजीनियर बनें, लेकिन बचपन से ही उनकी रुचि संगीत और कव्वाली में थी. धीरे-धीरे परिवार ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें संगीत की शिक्षा दी जाने लगी.
अपने शुरुआती दिनों में नुसरत फतेह अली खान अपने पिता की कव्वाली पार्टी में तबला बजाते थे. इसी दौरान उन्होंने गायन की बारीकियां भी सीखीं. वर्ष 1964 में उनके पिता के निधन के बाद उन्होंने परिवार की कव्वाली परंपरा में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की. बाद में अपने चाचा मुबारक अली खान के साथ उन्होंने कव्वाली समूह का नेतृत्व किया.
साल 1965 में उन्होंने रेडियो पाकिस्तान के वार्षिक संगीत कार्यक्रम "जश्न-ए-बहारां" में प्रस्तुति दी. यह उनके शुरुआती महत्वपूर्ण सार्वजनिक प्रदर्शनों में से एक था. इस प्रस्तुति को कई प्रसिद्ध शास्त्रीय गायकों और संगीतकारों ने सराहा. इसके बाद उनकी पहचान लगातार बढ़ती गई.
नुसरत फतेह अली खान मुख्य रूप से उर्दू और पंजाबी भाषा में गाते थे. इसके अलावा उन्होंने फारसी, हिंदी और ब्रज भाषा में भी कई रचनाएं प्रस्तुत कीं. 1970 के दशक में उनकी कई कव्वालियां लोकप्रिय हुईं, जिनमें "नी मैं जाना जोगी दे नाल" और "हक अली अली" जैसी रचनाएं शामिल हैं. इन गीतों ने उन्हें पाकिस्तान में व्यापक पहचान दिलाई.
नुसरत फतेह अली खान ने 1979 में नाहिद नुसरत से शादी की थी. राहत फतेह अली खान, नुसरत के भतीजे हैं.
1980 के दशक में इंग्लैंड की ओरिएंटल स्टार एजेंसी से जुड़ने के बाद उनका संगीत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा. उन्होंने यूरोप, भारत, जापान, पाकिस्तान और अमेरिका सहित कई देशों में एल्बम जारी किए और मंचीय प्रस्तुतियां दीं. उन्होंने दुनिया के 40 से अधिक देशों में कार्यक्रम किए और अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक कव्वाली संगीत को पहुंचाया.
नुसरत फतेह अली खान ने फिल्मों के लिए भी संगीत दिया और कई अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ काम किया. उनकी पहचान केवल कव्वाली तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की भी गहरी समझ रखते थे. उन्होंने अपने लंबे करियर में पारंपरिक और आधुनिक संगीत शैलियों के बीच कई प्रयोग किए.
16 अगस्त 1997 को उनका निधन हो गया. आज भी उनका संगीत दुनिया भर में सुना जाता है और कव्वाली के इतिहास में उनका नाम एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है.
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