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'मैं दर्द की गिरफ्त में हूं…' इरफान खान की लिखी चिट्ठी, आज भी चीर देती हैं दिल

इरफान खान की आखिरी चिट्ठी आज भी दिल को भिगो देती है. दर्द, डर और जिंदगी के सच को बयां करते उनके शब्द हर फैन की आंखें नम कर देते हैं- 6 साल बाद भी वो एहसास जिंदा है.

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 : इरफान खान की 6वीं पुण्यतिथि पर उनकी एक याद (Photo: ITG)
: इरफान खान की 6वीं पुण्यतिथि पर उनकी एक याद (Photo: ITG)

इरफान खान… एक नाम नहीं, एक एहसास. 6 साल बीत गए, लेकिन आज भी इनका जिक्र होते ही दिल में एक अजीब सी कसक उठती है. दिल आज भी मानने को तैयार नहीं कि वो हमारे बीच नहीं हैं. ‘29 अप्रैल 2020’- ये तारीख आज भी उनके चाहने वालों के लिए किसी दर्द से कम नहीं. वो दिन जब सिनेमा का एक नायाब सितारा हमेशा के लिए खामोश हो गया.

ऐसा लगता है जैसे वक्त वहीं ठहर गया हो. सिनेमा का वो सादगी भरा जादूगर, जो बिना शोर किए दिलों पर राज करता था, अचानक खामोश हो गया, लेकिन उसकी मौजूदगी आज भी हर उस दिल में धड़कती है, जिसने उसे महसूस किया है.

फैन्स के लिए इरफान सिर्फ एक एक्टर नहीं थे, वो जिंदगी को देखने का एक नजरिया थे. उनकी आंखों की गहराई, उनकी आवाज की सादगी और उनके किरदारों की सच्चाई- सब कुछ आज भी उतना ही जिंदा लगता है. और जब उनका लंदन से लिखा वो खत पढ़ते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे वो अपने दर्द, अपने डर और अपने सुकून को सीधे हमारे दिल तक पहुंचा रहे हों. 

हर शब्द में एक सच्चाई है, जो अंदर तक चुभती है… और यही एहसास दिलाता है कि इरफान कहीं गए नहीं, बस दिखाई देना बंद हो गए हैं. वो चिट्ठी आज भी दिल को चीर देती है. उसमें उन्होंने जिस दर्द को शब्दों में ढाला, वो पढ़कर हर किसी का दिल भर आता है. जब अपनी पीड़ा को बयां करते हुए उन्होंने लिखा था- दर्द खुदा से भी बड़ा महसूस हो रहा है.

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शायद यही वजह है कि ये खत सिर्फ एक लेटर नहीं, बल्कि उनके जज्बातों की आखिरी आवाज बन गया.

ये चिट्ठी नहीं दर्द है...

''कुछ महीने पहले अचानक मुझे पता चला था कि मैं न्यूरो एन्डोक्रिन कैंसर से ग्रस्त हूं, मैंने पहली बार ये शब्द सुना था. खोजने पर मैंने पाया कि मेरे इस शब्द पर बहुत ज्यादा शोध नहीं हुए हैं, क्योंकि ये एक दुर्लभ शारीरिक अवस्था का नाम है और इस वजह से इसके उपचार की अनिश्चितता ज्यादा है.''

''अभी तक मैं एक अलग खेल में था. अपने इस सर में मैं तेज-मंदगति से चलता चला जा रहा था. मेरे साथ मेरी योजनायें, आकांक्षाएं, सपने और मंजिलें थीं. मैं इनमें लीन बढ़ा जा रहा था, तेज ट्रेन राइड का लुत्फ उठा रहा था कि अचानक किसी ने मेरे कंधे पर थपथपाया. जब मैंने मुड़कर देखा तो वो टीसी था, जिसने कहा, 'आपका स्टेशन आ रहा है, प्लीज उतर जाएं.' मेरी समझ में नहीं आया, मैं अचंभित था, 'नहीं...नहीं ये मेरी मंजिल नहीं है...ना मेरा स्टेशन अभी नहीं आया है.'''

''जवाब मिला, 'नहीं यहीं है. अगले किसी भी स्टाप पर उतरना होगा, आपका गन्तव्य आ गया...' जिंदगी कभी कभी ऐसे ही होती है. अचानक एहसास हुआ कि आप किसी ढक्कन (कॉर्क) की तरह अनजान सागर में अप्रत्याशित लहरों पर बह रहे हैं. लहरों को काबू करने की गलतफहमी लिए.''

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''इस हड़बोंग, सहम और डर में घबराकर मैं अपने बेटे से कहता हूं, 'आज की इस हालत में मैं केवल इतना ही चाहता हूं  कि मैं इस मानसिक स्थिति को हड़बड़ाहट, डर, बदहवासी की हालत में नहीं जीना चाहता. मुझे किसी भी सूरत में मेरे पैर चाहिए, जिन पर खड़ा होकर अपनी हालत को तटस्थ होकर जी पाऊं. मैं खड़ा होना चाहता हूं.''

ऐसी मेरी मंशा थी, मेरा इरादा था...

''कुछ हफ्तों के बाद मैं एक अस्पताल में भर्ती हो गया. बेइंतहा दर्द हो रहा है. ये तो मालूम था कि दर्द होगा, लेकिन ऐसा दर्द... अब दर्द की तीव्रता समझ में आ रही है. कुछ भी काम नहीं कर रहा है. ना कोई सांत्वना और ना कोई दिलासा. पूरी कायनात उस दर्द के पल में सिमट आई है. दर्द खुदा से भी बड़ा और विशाल महसूस हुआ.''

''मैं जिस अस्पताल में भर्ती हूं, उसमें बालकनी भी है. बाहर का नजारा दिखता है. कोमा वार्ड ठीक मेरे ऊपर है. सड़क की एक तरफ मेरा अस्पताल है और दूसरी तरफ लॉर्ड्स स्टेडियम है. वहां विवियन रिचर्ड्स का मुस्कुराता पोस्टर है. मेरे बचपन के ख्वाबों का मक्का, उसे देखने पर पहली नजर में मुझे कोई एहसास ही नहीं हुआ. मानो वो दुनिया कभी मेरी थी ही नहीं.''

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मैं दर्द की गिरफ्त में हूं.

''और फिर एक दिन ये अहसास हुआ जैसे मैं किसी ऐसी चीज का हिस्सा नहीं हूं, जो निश्चित होने का दावा करे. ना अस्पताल और ना स्टेडियम. मेरे अंदर जो शेष था, वो वास्तव में कायनात की असीम शक्ति और बुद्धि का प्रभाव था. मेरे अस्पताल का वहां होना था. मन ने कहा- केवल अनिश्चितता ही निश्चित है.''

''इस अहसास ने मुझे समर्पण और भरोसे के लिए तैयार किया. अब चाहे जो भी नतीजा हो, ये चाहे जहां ले जाये, आज से आठ महीनों के बाद, या आज से चार महीनों के बाद या फिर दो साल. चिंता दरकिनार हुई और फिर विलीन होने लगी और फिर मेरे दिमाग से जीने-मरने का हिसाब निकल गया.''

''पहली बार मुझे शब्द 'आजादी' का अहसास हुआ सही अर्थ में! एक उपलब्धि का अहसास. इस कायनात की करनी में मेरा विश्वास ही पूर्ण सत्य बन गया. उसके बाद लगा कि वो विश्वास मेरे हर सेल में पैठ गया. वक्त ही बताएगा कि वो ठहरता है कि नहीं. फिलहाल मैं यही महसूस कर रहा हूं.''

''इस सफर में सारी दुनिया के लोग, सभी मेरे सेहतमंद होने की दुआ कर रहे हैं, प्रार्थना कर रहे हैं, मैं जिन्हें जानता हूं और जिन्हें नहीं जानता, वो सभी अलग-अलग जगहों और टाइम जोन से मेरे लिए प्रार्थना कर रहे हैं. मुझे लगता है कि उनकी प्रार्थनाएं मिलकर एक हो गयी हैं, एक बड़ी शक्ति, तीव्र जीवन धारा बनकर मेरे स्पाइन से मुझमें प्रवेश कर सिर के ऊपर कपाल से अंकुरित हो रही हैं.''

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''अंकुरित होकर ये कभी कली, कभी पत्ती, कभी टहनी और कभी शाखा बन जाती है. मैं खुश होकर इन्हें देखता हूं. लोगों की सामूहिक प्रार्थना से उपजी हर टहनी, हर पत्ती, हर फूल मुझे एक नई दुनिया दिखाती हैं. अहसास होता है कि जरूरी नहीं कि लहरों पर ढक्कन (कॉर्क) का नियंत्रण हो. जैसे आप कुदरत के पालने में झूल रहे हों! जून 2018''

इस चिट्ठी को पढ़ते हुए एक ही बात दिल में आती है- इरफान सिर्फ एक कलाकार नहीं थे, वो एक एहसास थे, जो आज भी जिंदा है. हर उस दिल में, जो उन्हें सच में चाहता है.

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