'धुरंधर' में आदित्य धर की कहानी में नजर आए पॉलिटिकल रंगों की होली सोशल मीडिया पर खूब खेली गई थी. कोई इन रंगों में सराबोर हो रहा था, तो कोई दामन बचाकर भाग निकलना चाहता था. मगर पहली फिल्म के नैरेटिव ने ही 'धुरंधर 2' के लिए पॉलिटिकल जमीन भी तैयार कर दी थी. ‘धुरंधर’ में जब आर माधवन का किरदार भविष्य में आने वाली मजबूत भारत सरकार के लिए आशावादी हो रहा था, तो ये स्पष्ट था कि फिल्म की पॉलिटिक्स आगे कहां मुड़ने वाली है.
मगर 'धुरंधर 2' का सरप्राइज ये है कि इस बार पॉलिटिक्स वाला रंग फिल्म पर पहले से भी ज्यादा चढ़ा हुआ है. और इस बार फिल्म अपने रंग लगा अंग छुपाने का संकोच पूरी तरह किनारे करके उतरी है. पिछले कुछ सालों से फिल्मों में ये कोई नई बात भी नहीं है. मगर 'धुरंधर 2' की खासियत ये है कि पॉलिटिक्स फिल्म के नैरेटिव में इस कदर घुली है कि फैक्ट्स और फिक्शन को एक दूसरे से अलग करके देख पाना मुश्किल है.
फैक्ट्स और फिक्शन की लस्सी बनाने वाला धुरंधर
पॉलिटिक्स के दो हिस्से होते हैं. एक वो जो संसद से सड़क तक नेताओं के भाषणों में दिखाई-सुनाई देता है. दूसरा हिस्सा चाय के अड्डों और केश सज्जा की दुकानों में मिलता है. ये पॉलिटिक्स में रुचि लेने वाले आम आदमी की कल्पना है, जो कागज पर शब्दों के बीच से झांकती खाली जगहों को पढ़ डालने का आनंद पाना चाहता है. 2016 में जब खबर आई कि भारत ने पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी है, तो लोग इसके फोटो-वीडियो देखना चाहते थे.
सबका मकसद देश की विपक्षी पार्टी की तरह सत्ता पक्ष को घेरना नहीं था. ये इंसानी दिमाग की नेचुरल जिज्ञासा है कि उसे इन्फॉर्मेशन का विजुअल चाहिए. और सोशल मीडिया के दौर में हर जिज्ञासा का सामूहिक हो जाना बहुत फास्ट और फ्यूरियस होता है. लेकिन सर्जिकल स्ट्राइक जैसी चीज देश की सुरक्षा, विदेश नीति, राजनीति वगैरह से जुड़ा भारी मैटर है. इसकी सारी जानकारी ऐसे ही थोड़ी न पब्लिक में बांट दी जाएगी! आधिकारिक सूत्रों से जितनी जानकारी सामने आई, उसमें दिमागों की जिज्ञासा ने रीडिंग्स निकालनी शुरू कर दीं— यूं हुआ होगा, वैसे घुसे होंगे, इस तरह मारा होगा. मगर ये जिज्ञासा पूरी तरह शांत की आदित्य धर ने, फिल्म 'उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक' (2019) से.
पक्की, कन्फर्म जानकारी फिल्म में भी उतनी ही थी जितनी हम तक खबरों ने पहुंचाई. लेकिन फिल्म ने इन्फॉर्मेशन को विजुअल दे दिए. आदित्य धर के प्रोडक्शन में बनी 'आर्टिकल 370' में भी कुछ ऐसा ही हुआ. लेकिन इस तरह के 'खाली स्थान भरो' सिनेमा की खासियत होती है कि फिल्म में जो क्रिएटिव लिबर्टी ली जाती हैं, वो विजुअल्स के साथ दिमाग में बैठने लगती हैं और फिक्शन, फैक्ट्स की जगह लेने लगता है. कई बार रियल घटनाओं पर चर्चा करते हुए लोग बोलते हैं— 'उस फिल्म में भी थी ये चीज!' तो फिल्ममेकिंग के धुरंधर आदित्य धर यही काम बहुत अच्छे से कर लेते हैं और यही चीज 'धुरंधर 2' को बहुत बड़ी ब्लॉकबस्टर बनाने वाली है. (वॉर्निंग— इसके आगे आपको फिल्म के कुछ स्पॉइलर मिल सकते हैं)
कितना फैक्ट कितना फिक्शन?
‘धुरंधर’ के दोनों पार्ट्स को एक पूरी कहानी की तरह देखें तो रणवीर सिंह का किरदार जसकीरत सिंह रांगी उर्फ हमजा अली मजारी फिक्शन है. लेकिन रहमान डकैत पाकिस्तान में एक रियल खूंखार गैंगस्टर हुआ है. मेजर इकबाल का किरदार भारत के लिए नासूर रहे कई आतंकियों को मिलाकर तैयार किया गया लगता है. उसका लुक पाकिस्तानी आतंकी इलियास कश्मीरी जैसा है, लेकिन काम कई अलग-अलग आतंकियों से मिलते हैं.
जमील जमाली का किरदार पाकिस्तानी पॉलिटीशियन नबील गबोल से प्रेरित लगता है. लेकिन ‘धुरंधर 2’ में जमील का जो सीक्रेट रिवील हुआ है, वो रियल लाइफ में सच नहीं है. जबकि मिशन धुरंधर की नींव रखने वाले भारतीय ऑफिसर अजय सान्याल का किरदार रियल लाइफ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल पर पूरी तरह मॉडल किया गया है. ये फैक्ट के बहुत करीब खड़ा फिक्शन है.
'धुरंधर 2' में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो कैमियो हैं— डायरेक्ट नहीं, इनडायरेक्ट. फिल्म में उनके शपथग्रहण और नोटबंदी की अनाउंसमेंट वाली वीडियो फुटेज है. पाकिस्तान में सेट फिल्म के किरदार मेजर इकबाल, जावेद खनानी और बड़े साहब उर्फ दाऊद इब्राहिम ये दोनों फुटेज देखकर रिएक्ट करते दिखते हैं. 'धुरंधर' में खनानी भाइयों की फैक्ट्री में छपे नकली नोट भारत में पहुंचने का रूट आपको बता ही दिया था— कराची-नेपाल-उत्तर प्रदेश-इंडिया की बाकी जगहें.
'धुरंधर 2' यूपी में इन नोटों का लॉन्च पैड एक नेता कम, गैंगस्टर के अड्डे को दिखाया गया है. नेता का नाम है— आतिफ अहमद. कद-काठी-आवाज से ये किरदार रियल लाइफ में गैंगस्टर से नेता बने अतीक अहमद की याद दिलाता है. 'धुरंधर 2' का ये किरदार कराची में बैठे दाऊद इब्राहिम, खनानी ब्रदर्स और मेजर इकबाल से डायरेक्ट कनेक्टेड है.
नोटबंदी अनाउंस करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने इस फैसले से आतंकवाद की कमर तोड़ने की बात कही थी. 'धुरंधर 2' में नोटबंदी पर एक पूरा चैप्टर है, जो दिखाता है कि कैसे सरकार के इस फैसले से कराची तक असर पड़ा है. दाऊद इब्राहिम एक 'चाय वाले' से तंग नजर आ रहा है. मेजर इकबाल और उसका बाप एक 'चाय वाले' से त्रस्त हैं. आतिफ अहमद झल्लाते हुए कह रहा है— 'एक चाय वाला घुस के फट गया है हम में!'
फिल्म देखने वाले हर दर्शक को पता है कि वो 'चाय वाला' कौन है, जिसका खौफ फिल्म पाकिस्तान में बैठे आतंकियों से लेकर भारत में बैठे नेता तक को खाए जा रहा है. वो भारतीय नेता किस पार्टी से था, सब जानते हैं. क्योंकि उसकी हत्या टीवी चैनल पर लाइव दिखाई गई थी. फिल्म में आतिफ अहमद को भी न्यूज चैनल्स की लाइव कवरेज के दौरान गोली मारी जाती है. फिल्म की शुरुआत में आदित्य धर ने डिस्क्लेमर दे दिया है कि 'फिल्म डॉक्यूमेंट्री नहीं है, रियल घटनाएं नहीं दिखाती'. लेकिन विजुअल्स देखकर आपको समझ आ रहा है कि इन्फॉर्मेशन किसके बारे में है.
‘धुरंधर 2’ में एक पूरा सीक्वेंस है जिसमें पाकिस्तान में छुपकर भारत में आतंकवाद फैलाने वाले कई बड़े आतंकियों की हत्याएं हो रही हैं. इनमें अब्दुल सलाम भुट्टवी रियल आतंकी का नाम था, जो वैसे ही मारा गया जैसे फिल्म दिखाती है. रियल लाइफ आतंकी अब्दुल रहमान मक्की हार्ट अटैक से मरा था. ‘धुरंधर 2’ भी यही दिखाती है, बस उसके हार्ट अटैक की वजह जसकीरत के मिशन से जोड़ देती है.
आज के दौर में तो विजुअल्स, इन्फॉर्मेशन से भी ज्यादा असर करते हैं. 'धुरंधर 2' की पॉलिटिकल शोबाजी, नोटबंदी का पूरा चैप्टर एंगेजिंग तरीके से फिल्माए गए हैं. ये विजुअल्स अखबार पर छपी सुर्खियों के बीच झांकते वो खाली स्पेस भर रहे हैं, जिसे पढ़ने की जिज्ञासा जनता को एक की जगह दो चाय पिला देती है. जिस जिज्ञासा में उलझे लोग अपना नंबर आने के इंतजार में दो-दो घंटे सैलून में बैठे रह जाते हैं, उस जिज्ञासा को विजुअल मिलना जनता को ऑलमोस्ट चार घंटे सीट पर क्यों नहीं बिठाए रख सकता!
वो भी जब साथ में एक्शन, वायलेंस का ऐसा डोज हो जो 'एनिमल' से भी ऊपर हो. जब साथ में रणवीर सिंह की दमदार परफॉर्मेंस हो. जब साथ में राकेश बेदी का अद्भुत कॉमिक अंदाज हो. आदित्य धर के 'रिक्त स्थान भरो' सिनेमा पर इन फिल्मी हर्ब्स की टॉपिंग एक ऐसी डिश बनाती है, जिसके बॉक्स ऑफिस पर हाथोंहाथ बिकने की पूरी गारंटी है!