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अधूरी कहानियों की पूरी दास्तान है 'लवरेज', पर्दे पर दिखेगा स्त्री और प्रेम का अनोखा रंग

मनोज कृष्ण की स्वतंत्र फिल्म 'लवरेज' चार अलग-अलग कहानियों के माध्यम से प्रेम की जटिलताओं और सामाजिक सीमाओं को दर्शाती है. दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और मथुरा पर बनी ये फिल्म स्त्री अनुभवों को केंद्र में रखती है और प्रेम के विभिन्न स्वरूपों को खोजती है.

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जल्ल पर्दे पर आएगी लवरेज (Photo: Social Media)
जल्ल पर्दे पर आएगी लवरेज (Photo: Social Media)

प्रेम को किसी एक परिभाषा, रिश्ते या सामाजिक सीमा में बांधा जा सकता है? क्या प्रेम केवल आकर्षण है, या किसी दूसरे मन की पीड़ा को समझने और उसे स्वीकार करने का साहस भी? लेखक-निर्देशक मनोज कृष्ण की स्वतंत्र फिल्म ‘लवरेज’ इन्हीं सवालों के साथ दर्शकों के बीच आने को तैयार है.

हाल ही में मुंबई में आयोजित फिल्म के विशेष प्रीमियर में शिशिर शर्मा, कला निर्देशक जयंत देसमुख, तारिक उमर खान, राजकुमार कनौजिया और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता निर्देशक-छायाकार शुभ्रांशु दास सहित सिनेमा और रचनात्मक क्षेत्र से जुड़े लेखक, समीक्षक पत्रकार उपस्थित रहे. 

क्या है फिल्म की कहानी?
अदहन क्रिएशन के बैनर तले बनी ‘लवरेज’ चार अलग-अलग कहानियों का संग्रह है. दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, कोलकाता और मथुरा के आसपास फिल्माई गई ये कहानियां समाज के अलग-अलग वर्गों और जीवन-स्थितियों को दर्शाती हैं. इनके परिवेश अलग हैं, लेकिन इन्हें जोड़ने वाला सूत्र है, प्रेम और मनुष्य की जुड़ाव की आवश्यकता.

स्त्री अनुभवों को केंद्र में रखती ये फिल्म तन के आकर्षण से आगे बढ़कर मन के प्रति प्रेम की महत्ता तलाशती है. इसमें ममता है, अपनापन है और संदेह से भटकते प्रेम की व्यथा भी. कहानियां सवाल उठाती हैं कि जहां विश्वास की जगह संशय और अपनत्व की जगह अधिकार ले लेता है, वहां प्रेम का स्वरूप कैसे बदल जाता है. प्रेम को समझने के लिए समर्पण और विश्वास चाहिए, लेकिन क्या समाज दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके मन को स्वीकार करने के लिए तैयार है?

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लवरेज

‘लवरेज’ एक फिल्म होने के साथ प्रेम पर एक वैचारिक संवाद भी है. इसकी अधूरी कहानियों में जीवन की पूरी दास्तान सुनाई देती है; क्योंकि हर रिश्ते को मनचाहा अंत नहीं मिलता, फिर भी उसमें जिया गया स्नेह, संघर्ष और इंतजार अर्थहीन नहीं हो जाता.

क्यों खास है फिल्म?
स्वतंत्र सिनेमा की शक्ति इसी स्वाभाविकता में है. वो जीवन को उसकी उलझनों, खामोशियों और असहज प्रश्नों के साथ सामने रख सकता है. ‘लवरेज’ मौलिक कहानियों की इसी महत्ता को रेखांकित करती है, ऐसी कहानियां जो परिचित जीवन में छिपे अनसुने अनुभवों को आवाज देती हैं.

फिल्म में चार गीत हैं, जिनमें से तीन को मशहूर गायिका मधुश्री भट्टाचार्य ने स्वर दिया है. कथा, पटकथा और गीत मनोज कृष्ण के हैं; कोलकाता की कहानी में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचना भी शामिल है. संगीत रॉबी बादल ने तैयार किया है.

लवरेज

फिल्म के अंत में मधुश्री की आवाज़ में गूंजता गीत- पूछती फिर रही लड़कियां... महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की पीड़ा और प्रतिरोध को स्वर देता है. गीत ऑडियंस से जवाब मांगता है, स्त्री की गरिमा, सुरक्षा और स्वतंत्रता पर उठे सवालों का जवाब पितृसत्ता देगी, या मौन बनी रहेगी? फिल्म दर्शकों को इस प्रश्न के साथ लौटाती है.

पत्रकारिता और लेखन से निर्देशन में आए मनोज कृष्ण की यह पहली फिल्म है. सर्कल क्रिएशन स्टूडियो में तैयार ‘लवरेज’ को टीएनवी फिल्म्स रिलीज करने जा रही है. टीएनवी के निदेशक प्रज्ञेश कुमार सिंह के अनुसार, कंपनी मौलिक कहानियों और सिनेमा में नए प्रयोग करने वाले स्वतंत्र फिल्मकारों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिबद्ध है. फिल्म जल्द देशभर के सिनेमाघरों में दर्शकों तक पहुंचाने की तैयारी है.

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बता दें कि फिल्म में चंदन रॉय, नंद किशोर पंत, बसंत, रवि, राजेश रमन, सिमरन, दिव्या और राजश्री अहम भूमिका में हैं. 

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