आलिया भट्ट जैसी TOP इंडियन एक्ट्रेस के साथ धप्पा हो, या सूफी मोतीवाला और निधि कुमार जैसे कंटेंट क्रिएटर्स का भौकाल… कान्स 2026 के रेड कार्पेट से इंडियन सेलेब्रिटीज की चर्चा आप तक जरूर पहुंच चुकी होगी. वही कान्स, जो फ्रांस का एक खूबसूरत ऐतिहासिक शहर है. जहां हर साल दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित फिल्म फेस्टिवल होता है.
इतना प्रतिष्ठित कि इंटरनेशनल सिनेमा कम्युनिटी के ज्यादातर बड़े नाम कान्स फिल्म फेस्टिवल के टॉप अवॉर्ड Palme d’Or (पाम डोर) को ऑस्कर्स से भी ऊपर रखते हैं. कान्स फिल्म फेस्टिवल के दो हिस्से हैं- पहला और ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा एक फिल्म कॉम्पिटीशन है. जहां दुनिया की बेस्ट फिल्में देखी-दिखाई जाती हैं और इन्हें अवॉर्ड मिलता है.
दूसरा है कान्स फिल्म Market, जहां फिल्में खरीदने-बेचने की डील्स होती हैं. फिल्म फेस्टिवल के स्पॉन्सर्स यहां अपना व्यापार बढ़ाते हैं, अपने ब्रांड एम्बेसेडर्स को बुलाते हैं, लाइमलाइट बटोरते हैं. रेड कार्पेट पर भारतीय सेलेब्स के फैशन की जिस चमक-दमक पर खबरें बनती हैं, वो कान्स फिल्म मार्केट की देन हैं.
लेकिन जो कान्स का मेन फिल्म कॉम्पिटीशन है, वहां भारतीय सिनेमा की मौजूदगी कम से कमतर होती जा रही है. कान्स फिल्म फेस्टिवल को अधिकतर भारतीय लोग अब सिर्फ इसलिए जानते हैं क्योंकि इसके रेड कार्पेट पर इंडियन सेलेब्रिटीज फैशन के जलवे बिखेरते हैं. जबकि इस ‘फिल्म फेस्टिवल’ का टॉप अवॉर्ड किसी भारतीय फिल्म ने आखिरी बार तब जीता था, जब हम आजाद भी नहीं हुए थे.
एक विडंबना जिसका नाम है ‘इंडियन सिनेमा’
1946 में जब चेतन आनंद की फिल्म नीचा नगर ने कान्स का टॉप अवॉर्ड जीता था, तब भारत पर राज कर रही ब्रिटिश सरकार को यकीन नहीं हुआ. चेतन के बेटे केतन आनंद ने कभी बताया था कि लॉर्ड माउंटबेटन इंडियन फिल्म को फ्रेंच सिनेमा कम्युनिटी से इतना बड़ा सम्मान मिलने पर शॉक थे.
उन्होंने एक खास स्क्रीनिंग रखकर जवाहरलाल नेहरू और कुछ अन्य नेताओं के साथ ये फिल्म देखी और गदगद हो गए. उनका कहना था कि नीचा नगर तो पूरे भारत में दिखाई जानी चाहिए. लेकिन ये जानकर आप हैरान हो जाएंगे कि कान्स में सबसे बड़ा अवॉर्ड जीतने वाली पहली भारतीय फिल्म, भारत में ही रिलीज नहीं हो सकी.
नीचा नगर में गाने नहीं थे. भारत के फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर्स ने इसे खरीदा ही नहीं— बिना नाच-गाने की फिल्म कौन देखेगा. करीब 80 साल पहले हुई ये घटना इंडियन सिनेमा की विडंबना दिखाने वाली परफेक्ट कहानी है. बिजनेस का खेल हमारे बड़े पर्दे पर इंसानी भावनाओं के खेल से थोड़ा ज्यादा महत्वपूर्ण रहा है.
कागज पर कहानी उतारने के साथ ही पहले ये तय होता है कि इसे बेचने वाले एलिमेंट कहां-कहां और कैसे-कैसे फिट किए जाएं. क्योंकि कहानी बिकने वाली नहीं होगी तो उसे बड़े पर्दे पर लाने का खर्च कौन प्रोड्यूसर देगा. लेकिन हर सिस्टम के अपने बागी होते हैं.
भारतीय सिनेमा में भी हुए— वी शांताराम, मृणाल सेन, सत्यजित रे, अदूर गोपालकृष्णन और बाद में पैरेलल सिनेमा मूवमेंट से निकले डायरेक्टर्स की एक पूरी खेप. ये लोग इंसानी इमोशंस, सामाजिक कुरीतियों और सिस्टम की नाकामियों को परत दर परत उधेड़ने वाली फिल्में बनाते रहे.
कमर्शियल सिस्टम में रहकर एंटरटेनमेंट को सर्वप्रथम रखकर बनने वाली फिल्मों को फंडिंग देने के लिए पूरा स्टूडियो सिस्टम खड़ा हो चुका था. लेकिन बागी तेवर वाले, लीक से हटकर सिनेमैटिक स्टाइल वाले और झिंझोड़ने वाली कहानियां लेकर आ रहे फिल्ममेकर्स को अपनी फंडिंग की व्यवस्था भी खुद जुटानी पड़ती थी. इसलिए इन्हें इंडिपेंडेंट फिल्में कहा गया, आज इन्हें इंडी फिल्म्स कहा जाता है.
सरकारी फंडिंग से फलता-फूलता इंडियन सिनेमा
इंडिपेंडेंट फिल्मों की फंडिंग का दूसरा बड़ा सोर्स थी सरकारी मदद. भारत सरकार ने फिल्म फाइनेंस कॉर्पोरेशन (FFC) जैसा इनिशिएटिव शुरू किया जो एक कंपनी के तौर पर फिल्मों को फंडिंग देता था— ऐसी फिल्में जो समाज को आईना दिखाती हों, जो मसालेदार फिल्मी एंटरटेनमेंट से हटकर सामाजिक यथार्थवाद पर जोर दें.
कोई फिल्ममेकर अगर अपनी फिल्म का एक चौथाई बजट जुटा ले तो बाकी हिस्सा FFC की तरफ से मिल सकता था. आसान ब्याज दर वाले लोन के रूप में, जो फिल्ममेकर बाद में लौटा सकते थे. आइडिया ये था कि अपने समाज की कमियां बड़े पर्दे पर लाने वाली फिल्में, उन समस्याओं पर बात करने का माहौल देती हैं जो किसी भी लोकतंत्र के लिए बहुत जरूरी है.
यही FFC बाद में चलकर नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (NFDC) बना जिसने इंडियन सिनेमा की कुछ सबसे दमदार आवाजों को पहचान दी. आज जिन फिल्मों को भारतीय समाज को आईना दिखाने के लिए सम्मान दिया जाता है, उनमें से कई NFDC ने प्रोड्यूस की थीं— सत्यजित रे की घरे बैरे, कुंदन शाह की जाने भी दो यारों, केतन मेहता की मिर्च मसाला या मीरा नायर की सलाम बॉम्बे.
1980 के दशक में शुरू हुआ इंडियन सिनेमा का पैरेलल सिनेमा मूवमेंट, NFDC के भरोसे ही फला-फूला. यानी इंडिपेंडेंट फिल्ममेकर्स और सरकारी फंडिंग ने मिलकर एक ऐसा सिनेमा तैयार किया जिसका राजनीतिक मैसेज बहुत स्पष्ट था— हमारे सिनेमा को अपनी कमियों पर बात करने से परहेज नहीं है.
ये इंडिपेंडेंट फिल्में ग्लोबल ऑडियंस और सिनेमा क्रिटिक्स को भाती रहीं, और कई फिल्म फेस्टिवल्स समेत बीच-बीच में कान्स का भी दरवाजा खटखटाती रहीं. कान्स के मुख्य कॉम्पिटीशन में पहुंचीं घरे बैरे (1984), गर्म हवा (1974) और स्वहम (1994) इंडिपेंडेंट फिल्में ही थीं.
कैसे कान्स के मुख्य कॉम्पिटीशन से गायब हुआ भारतीय सिनेमा
90s तक आते-आते दो बड़ी चीजें हुईं. एक तरफ इंडियन सिनेमा का कमर्शियल पहलू, उसके ‘आर्ट’ पहलू पर भारी पड़ने लगा और इंडिपेंडेंट फिल्में खत्म होने की कगार पर पहुंच गईं. दूसरी तरफ, टीवी और नए माध्यमों के बीच ‘सिनेमा’ यानी थिएट्रिकल फिल्मों को बचाने के लिए कान्स ने कुछ ऐसे नियम बना दिए कि इंडियन फिल्मों के लिए दरवाजे लगभग बंद ही हो गए.
इसकी वजह समझने के लिए पहले ये समझना जरूरी है कि कान्स में फिल्में पहुंचती कैसे हैं और इसकी ज्यूरी काम कैसे करती है. कान्स एक ऐसा ईवेंट है जहां ग्लोबल सिनेमा के सबसे बड़े उस्ताद बैठते हैं. फिल्मों की आर्ट, नैतिकता, तकनीकी मजबूती और कहानियों की ह्यूमन वैल्यू तय करना उनका एजेंडा होता है.
कह लीजिए कि सिनेमा की आर्ट को संभालते आए ये लेजेंड फिल्ममेकर्स, इस आर्ट को आगे बढ़ाने वाली फिल्में चुनते हैं. जो फिल्में ये काम सबसे अच्छा करती हैं, उन्हें अवॉर्ड दिया जाता. कान्स फिल्म फेस्टिवल का बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स हर साल एक नई ज्यूरी चुनता है.
इस ज्यूरी में एक प्रेजिडेंट और 8 मेंबर होते हैं. ये ज्यूरी एक सेलेक्शन कमिटी बनाती है, जो फॉर्मल तरीके से कॉम्पिटीशन में सबमिट होने वाली 2000-2500 फिल्में देखती है. उनमें से हर साल करीब 56 फिल्में और 14 शॉर्ट फिल्म्स चुनी जाती हैं, जो कॉम्पिटीशन का हिस्सा बनती हैं.
फॉर्मल शर्त बस एक होती है— जिस देश की फिल्म है उसके बाहर कहीं रिलीज न हुई हो और किसी दूसरे फिल्म फेस्टिवल में न दिखाई गई हो. कान्स में सबसे महत्वपूर्ण ‘मेन कॉम्पिटीशन’ है जो ओरिजिनल कान्स कॉम्पिटीशन है.
1978 में कॉम्पिटीशन में एक नई कैटेगरी आई Un Certain Regard. सबसे नामी फिल्ममेकर्स या कान्स में लगातार तारीफ पाने वाले फिल्म उस्तादों की फिल्में, आर्ट और तकनीक के मामले में सबसे मजबूत फिल्में ‘मेन कॉम्पिटीशन’ में जाती हैं. गौर करने लायक नए फिल्ममेकर्स की फिल्में, या नया एक्सपेरिमेंट लेकर आईं फिल्में, या फिर जिनमें दम तो है मगर और पॉलिश की जरूरत है, वो Un Certain Regard में जाती हैं.
मेन कॉम्पिटीशन में जाने वाली फिल्मों को फ्रांस के थिएटर्स में रिलीज होना अनिवार्य नियम है. फ्रांस में फिल्म रिलीज के नियम बहुत कड़े हैं— रिलीज के 4 महीने बाद ही फिल्म DVD पर आ सकती है. फ्रांस के ओटीटी प्लेटफॉर्म Canal+ पर 6 महीने बाद, Disney+ पर 9 महीने बाद और Netflix-Amazon Prime पर रिलीज के 15-17 महीने बाद.
यानी अगर कोई फिल्म फ्रांस के थिएटर्स में रिलीज होनी है, तो उसके बाकी जगह रिलीज के रास्ते लंबे समय तक बंद हो जाते हैं. फ्रांस ने ये गाइडलाइन्स 1980 के दशक में बनाई थीं, मगर ये 90s में ज्यादा सख्ती से फॉलो की जाने लगीं.
उससे पहले भारत के उन फिल्ममेकर्स की फिल्में कान्स के ‘मेन इवेंट’ में पहुंची थीं, जिनके क्राफ्ट को दुनिया टॉप क्लास मानती थी और कान्स की ज्यूरी खुद उनपर नजर रखती थी. लेकिन फ्रांस में फिल्म रिलीज की गाइडलाइन फॉलो करना भारत के ही नहीं, अधिकतर इंडिपेंडेंट फिल्मों और नए फिल्ममेकर्स के लिए संभव नहीं रहा.
भारत में बड़े-बड़े स्टूडियो की फिल्में थिएटर्स में रिलीज के 8 हफ्ते बाद ओटीटी पर पहुंच जाती हैं क्योंकि ओटीटी डील से मोटा पैसा आता है. अब सोचिए— इंडिया के एक दमदार फिल्ममेकर ने किसी तरह फंडिंग जुटाकर कान्स की ज्यूरी को भाने वाली फिल्म बना ली.
लेकिन उसे ‘मेन कॉम्पिटीशन’ में जाने के लिए फ्रांस में फिल्म रिलीज करनी होगी. एक नए देश में उसे फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर खोजने की जद्दोजहद करनी होगी. और फ्रांस में रिलीज होने के बाद वो महीनों तक ओटीटी को फिल्म नहीं बेच सकता. लेकिन जिन लोगों ने फिल्म फंड की है, उन्हें तो अपना पैसा और ब्याज टाइम पर चाहिए ही.
बीते एक दशक में उड़ान (2010), मिस लवली (2012), तितली (2014), मसान (2015), चौथी कूट (2015) या होमबाउंड (2025) जैसी भारतीय फिल्में कान्स में पहुंचीं भी तो ‘मेन कॉम्पिटीशन’ में नहीं, Un Certain Regard में.
NFDC अब भी है, मगर अब ये सीधा फिल्मों को फंड नहीं करता. बल्कि अगर कोई इंडियन फिल्ममेकर किसी विदेशी प्रोडक्शन हाउस के साथ फिल्म के लिए पार्टनरशिप करने में कामयाब हो जाए तो उसे प्रोडक्शन के खर्चे पर इंसेंटिव देने की व्यवस्था है.
अगर कोई फिल्म A-क्लास फिल्म फेस्टिवल के लिए सेलेक्ट हो जाए तो उसके प्रमोशन के लिए फिल्ममेकर सरकार के ‘फिल्म प्रमोशन फंड’ की तरफ जा सकता है. इरफान खान की द लंचबॉक्स (2013), कान्स में पहुंची पहली पंजाबी फिल्म चौथी कूट (2015) और लो बजट बंगाली फिल्म सहज पाथेर गप्पो (2016) ऐसी ही फिल्में थीं जिन्हें NFDC ने सरकारी सपोर्ट तो किया, मगर इन्हें कई घरेलू या इंटरनेशनल प्रोड्यूसर मिलने के बाद.
इसलिए 80s की तरह अब एक फिल्ममेकर सरकारी फंड के भरोसे फिल्म प्लान नहीं कर सकता. ऊपर से फिल्म सपोर्ट के सरकारी सिस्टम में अब एक और स्पीड ब्रेकर नजर आता है— आपकी फिल्म देश की क्या इमेज दिखा रही है? ऐसे में समाज को आईना दिखाने वाली, कमियों की तीखी आलोचना करने वाली फिल्मों के लिए रास्ता मुश्किल हुआ है.
पायल कपाड़िया की कान्स क्रांति
1994 में शाजी एन करुण की स्वहम के 30 साल बाद, कान्स के मेन कॉम्पिटीशन में भारत का नाम 2024 में सुनाई दिया. पायल कपाड़िया की All We Imagine As Light मेन कॉम्पिटीशन में सिर्फ पहुंची ही नहीं, इसने दूसरा सबसे बड़ा अवॉर्ड Grand Prix भी जीता.
पायल की जीत को इंडिया में बहुत सेलिब्रेट किया गया और इसे ‘भारत के लिए गर्व का मोमेंट’ बताया गया. मगर अनुराग कश्यप के एक बयान पर उस समय खूब विवाद उठा. अनुराग ने कहा था— ‘इंडिया को बहुत सारी फिल्मों का क्रेडिट लेना पसंद है. वो ऐसी फिल्मों को सिनेमा में रिलीज करवाने का सपोर्ट भी नहीं करते.’
अनुराग का कहना था कि भारत ने तो पायल को वो फाइनेंशियल मदद भी नहीं दी, जिसका वादा किया गया था. 2017 में पायल कपाड़िया जब फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट (FTII) में पढ़ रही थीं, तो उनकी शॉर्ट फिल्म Afternoon Clouds कान्स के स्टूडेंट सेक्शन Cinefondation के लिए चुनी गई थी.
उस साल ये भारत की तरफ से इस कॉम्पिटीशन में पहुंचीं एकमात्र फिल्म थी. कान्स फिल्म फेस्टिवल के एक प्रोग्राम La Residence du Festival में यंग प्रतिभावान फिल्ममेकर्स को पेरिस में रहकर अपनी फिल्म लिखने का मौका मिलता है. पायल को उनकी शॉर्ट फिल्म की वजह से ही इस प्रोग्राम में जगह मिली थी.
इसी प्रोग्राम में पायल ने जो स्क्रिप्ट लिखी, वो All We Imagine As Light फिल्म बनी. 2021 में इंडिया के छात्र प्रदर्शनों पर बनी पायल की डॉक्यूमेंट्री ने कान्स फिल्म फेस्टिवल में डॉक्यूमेंट्री सेक्शन का टॉप अवॉर्ड Golden Eye जीता था.
कान्स के सिस्टम से आप समझ चुके होंगे कि वहां के प्रोग्रामर कैसे दमदार फिल्ममेकर्स पर नजर रखते हैं. पहले शॉर्ट फिल्म, फिर राइटिंग प्रोग्राम और फिर डॉक्यूमेंट्री को अवॉर्ड... कान्स में हाइलाइट होने का फायदा ये हुआ कि पायल ने जब All We Imagine As Light बनाई तो उन्हें यूरोपियन प्रोडक्शन कंपनियों ने सपोर्ट किया.
एक फ्रेंच प्रोडक्शन हाउस पायल की फिल्म का लीड प्रोड्यूसर बना. जब फ्रेंच प्रोडक्शन हाउस ही मिल गया, तो फ्रांस में रिलीज या कान्स के लिए जरूरी फ्रेंच फिल्म सपोर्ट पायल के साथ था. दो इंडियन प्रोडक्शन हाउस, नीदरलैंड, इटली और लक्जमबर्ग की कंपनियों ने मिलकर पायल की फिल्म प्रोड्यूस की थी. इसी वजह से पायल की फिल्म का कान्स फिल्म फेस्टिवल में जाना आसान हुआ था.
आज जब कान्स 2026 के विजेताओं की घोषणा हो चुकी है और रोमानियन फिल्म Fjord ने Palme d’Or अपने नाम किया है, भारतीय सिनेमा के लिए आत्ममंथन का यह सवाल और भी बड़ा हो जाता है— क्या भारत से कोई फिल्म कान्स के मेन कॉम्पिटीशन में पहुंच सकती है? क्या हमारे पास वो सिस्टम है जो सिनेमा के इस सबसे प्रतिष्ठित इवेंट में हमारा नाम बुलंद कर सके?
आज भारतीय सिनेमा ग्लोबल ऑडियंस में पैठ बनाने की कोशिश में है. सिनेमा सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं, सॉफ्ट पावर भी होता है. और कान्स जैसे प्रतिष्ठित सिनेमा इवेंट्स में भारतीय फिल्मों की गैरमौजूदगी से विदेशों के विशुद्ध फिल्मचियों में हमारी इमेज अभी भी ‘नॉन सीरियस’ सिनेमा की ही है. इंटरनेशनल सिनेमा कम्युनिटी में एक बड़ा तबका है जिसे लगता है कि हम जायकेदार एंटरटेनमेंट परोसने वाली मसाला फिल्में ही बनाते हैं.
जबकि इंडियन ऑडियंस जानती है कि पिछले कुछ समय से हम दमदार ह्यूमन स्टोरीज, इमोशन्स और सोशल ड्रामा फिल्में भी बना रहे हैं. तो क्यों न कान्स वाला भौकाल हमारे पास भी हो.