राजनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाने वाले हरीश रावत का बाहुबली चेहरा उत्तराखंड के जनमानस को रास नहीं आया. नतीजतन उनको हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा विधानसभा क्षेत्रों से हार का मुंह देखना पड़ा.
मोदी की आंधी में रावत अपनी सीट तक नहीं बचा पाए. इसके अलावा कांग्रेस को राज्य में चेहरे की कमी भी खली. हाल ही चुनाव से पहले पर खूब वायरल हुआ था.
सूबे में कांग्रेस के बेहद लोकप्रिय चेहरा माने जाने वाले रावत चार बार चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे. वह राज्यसभा सदस्य भी रहे, लेकिन पार्टी की ओर से हमेशा उपेक्षा का शिकार होते रहे. रावत को पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे एनडी तिवारी का धुर विरोधी माना जाता है. तिवारी के चलते उनको सूबे की राजनीति से लंबे समय तक दूर रखा गया, लेकिन उन्होंने कांग्रेस का दामन नहीं छोड़ा. लिहाजा रावत को केंद्र की राजनीति में तवज्जो मिलती रही.
सूबे में जब कांग्रेस की सरकार बनी, तो उनको दरकिनार कर विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बना दिया गया. हालांकि जनता के बीच अपनी लोकप्रियता एवं मजबूत पैठ के चलते रावत का कद कम नहीं और एक समय ऐसा भी आया, जब विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा और उनकी जगह रावत की ताजपोशी की गई.
मुख्यमंत्री बनने के बाद रावत के खिलाफ उनकी ही पार्टी के नेता बगावत पर उतर आए. वहीं, कांग्रेस में गुटबाजी का फायदा उठाकर केंद्र की बीजेपी सरकार ने हरीश रावत सरकार को बर्खास्त कर दिया, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने हरीश रावत सरकार को बहाल कर दिया और वह दोबारा मुख्यमंत्री बन गए.
मुख्यमंत्री रहते वीडिया सामने आने से सियासी गलियारों में हड़कंप मच गया. विधायकों की खरीद फरोख्त के स्टिंग के सामने आने से रावत की छवि को धक्का लगा. मामले में उनको सीबीआई ने समन जारी किया और उनसे पूछताछ की. सीबीआई की पूछताछ में उन्होंने स्टिंग वीडियो को सही ठहराया था, लेकिन विधायकों की खरीद फरोख्त से इनकार कर दिया था. इसके अलावा वह पार्टी के भीतर गुटबाजी को भी रोकने में विफल रहे.