पीलीभीत उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले का एक जिला स्तरीय शहर और जिला मुख्यालय है. यह नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा और उत्तराखंड राज्य के करीब स्थित है. यह एक पुरानी बस्ती है, जिसका इतिहास काफी गहरा है. पीलीभीत को बांसुरी बनाने की पुरानी परंपरा के कारण भारत की बांसुरी राजधानी के रूप में भी जाना जाता है. यह जिला घने जंगलों, पीलीभीत टाइगर रिजर्व और हिमालय की तलहटी में स्थित तराई क्षेत्र के लिए भी जाना जाता है. पीलीभीत रुहेलखंड मंडल का सबसे उत्तर-पूर्वी जिला है.
1956 के परिसीमन आदेश के तहत स्थापित पीलीभीत एक सामान्य, गैर-आरक्षित विधानसभा क्षेत्र है और पीलीभीत लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. इसमें पीलीभीत नगर पालिका बोर्ड, गुलरिया भंडारा और जहानाबाद नगर पंचायतों का पूरा क्षेत्र शामिल है. इसके साथ ही पीलीभीत तहसील के नगर, अमरिया और जहानाबाद कानूनगो सर्किलों के बड़ी संख्या में गांव भी इस विधानसभा क्षेत्र में आते हैं, जिससे इसका स्वरूप अर्ध-शहरी बनता है.
पीलीभीत में 1957 में पहली बार विधानसभा चुनाव हुआ था. इसके बाद यहां 18 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें वर्ष 2000 का उपचुनाव भी शामिल है. कई दशकों में इस सीट पर अलग-अलग राजनीतिक दलों को जीत मिली है. हालांकि समय के साथ भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी यहां के प्रमुख राजनीतिक दलों के रूप में उभरे हैं. 1991 से 2000 के बीच भाजपा ने लगातार चार बार इस सीट पर जीत दर्ज की. इसके बाद 2002 से 2012 तक समाजवादी पार्टी ने लगातार तीन चुनाव जीते. 2017 में भाजपा ने दोबारा वापसी की और लगातार दो विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की.
वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी के रियाज अहमद ने लगातार तीसरी बार चुनाव जीता. उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के संजय सिंह गंगवार को 4,235 वोटों से हराया. बाद में संजय सिंह गंगवार भाजपा में शामिल हो गए और 2017 में भाजपा के उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता. उन्होंने तत्कालीन समाजवादी पार्टी विधायक को 43,356 वोटों के बड़े अंतर से हराया. वर्ष 2022 में भाजपा की जीत का अंतर काफी कम हो गया. संजय सिंह गंगवार को 125,506 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के शैलेंद्र सिंह गंगवार को 118,536 वोट प्राप्त हुए. भाजपा ने यह सीट 6,970 वोटों से बरकरार रखी.
विधानसभा चुनावों में अलग-अलग परिणामों के बावजूद, 2009 के बाद हुए सभी चार लोकसभा चुनावों में पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र में भाजपा को बढ़त मिली है. वर्ष 2009 में भाजपा ने समाजवादी पार्टी पर 54,982 वोटों की बढ़त बनाई. 2014 में यह बढ़त 61,899 वोटों की रही, जबकि 2019 में भाजपा 37,344 वोटों से आगे रही. वर्ष 2024 में भाजपा की बढ़त और कम हो गई. भाजपा उम्मीदवार जितिन प्रसाद को 120,263 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के भगवत सरन गंगवार को 101,969 वोट प्राप्त हुए. इस तरह भाजपा को 18,294 वोटों की बढ़त मिली.
पीलीभीत लोकसभा सीट लंबे समय तक मेनका गांधी और उनके बेटे फिरोज वरुण गांधी से जुड़ी रही है. दोनों ने मिलकर आठ बार भाजपा के लिए इस सीट का प्रतिनिधित्व किया. वरुण गांधी 2014 से यहां के सांसद थे, लेकिन 2024 में भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया और उनकी जगह जितिन प्रसाद को उम्मीदवार बनाया. उम्मीदवार बदलने और अन्य स्थानीय व राजनीतिक कारणों के बीच इस विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की बढ़त में काफी कमी दर्ज की गई.
पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ी है. वर्ष 2012 में यहां 3,40,050 पंजीकृत मतदाता थे. वर्ष 2017 में यह संख्या बढ़कर 3,68,537 हो गई. 2019 में 3,72,433, वर्ष 2022 में 3,79,323 और 2024 में 3,81,681 मतदाता दर्ज किए गए. मतदान प्रतिशत भी आमतौर पर अच्छा रहा है, हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में इसमें सात प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई. वर्ष 2012 में मतदान प्रतिशत 66.20 रहा. 2017 में यह बढ़कर 68.34 प्रतिशत हो गया. 2019 के लोकसभा चुनाव में मतदान 66.37 प्रतिशत रहा. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में यह बढ़कर 68.89 प्रतिशत हुआ, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 61.98 प्रतिशत रह गया.
पीलीभीत हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां मुस्लिम मतदाताओं की भी बड़ी संख्या है. अनुमान के अनुसार मुस्लिम मतदाता करीब 34.80 प्रतिशत हैं, जबकि अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी 12.30 प्रतिशत है. कुर्मी समुदाय यहां प्रभावशाली माना जाता है. इसके अलावा लोधी, मौर्य और कश्यप जैसे अन्य ओबीसी समुदायों की भी अच्छी उपस्थिति है. ब्राह्मण, वैश्य और ठाकुर सहित ऊंची जातियों के मतदाता भी यहां मौजूद हैं. इस विधानसभा क्षेत्र का स्वरूप मिश्रित है, जहां करीब 66.25 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में और 33.75 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है.
स्थानीय परंपराएं इस क्षेत्र को महाभारत काल से जोड़ती हैं. लोककथाओं में इसका संबंध राजा मयूरध्वज या वेणु से बताया जाता है, जिन्हें भगवान कृष्ण का भक्त माना जाता है. हालांकि ऐतिहासिक रूप से इस क्षेत्र का विकास काफी बाद में हुआ और यह कई शताब्दियों तक घने जंगलों से घिरा रहा. 18वीं सदी में रुहेला काल के दौरान पीलीभीत का महत्व बढ़ा. रुहेला नेताओं में प्रमुख हाफिज रहमत खान ने पीलीभीत को एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित किया और कुछ समय तक यह क्षेत्र हाफिजाबाद के नाम से भी जाना गया. कुछ विवरणों के अनुसार शहर की दीवारों, द्वारों, मस्जिदों और बाजारों का निर्माण रुहेला काल में हुआ था. 1774 में रुहेलों की हार के बाद यह क्षेत्र अवध के नवाब के अधीन चला गया और 1801 में इसे ब्रिटिश शासन को सौंप दिया गया. इसके बाद पीलीभीत एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और व्यावसायिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ और 1879 में इसे अलग जिला बनाया गया.
आज पीलीभीत की खास पहचान उसकी पारंपरिक बांसुरी निर्माण कला से भी जुड़ी है. यहां कई पीढ़ियों से स्थानीय कारीगर बांस की बांसुरी बनाते आ रहे हैं. इस परंपरागत कला को उत्तर प्रदेश की एक जिला एक उत्पाद योजना के तहत भी मान्यता मिली है, जिसमें बांसुरी और लकड़ी के उत्पादों को पीलीभीत के प्रमुख उत्पादों के रूप में शामिल किया गया है. जिला प्रशासन भी बांसुरी निर्माण को जिले के प्रमुख लघु उद्योगों में शामिल करता है. आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है. गन्ना यहां की प्रमुख फसल है, जबकि धान और गेहूं की खेती भी बड़े पैमाने पर की जाती है. चीनी मिल, चावल मिल, इंजीनियरिंग इकाइयां और अन्य छोटे उद्योग भी स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं.
पीलीभीत तराई के जंगलों तक पहुंचने वाले महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है. भारत-नेपाल सीमा के पास तराई क्षेत्र में फैला पीलीभीत टाइगर रिजर्व साल के जंगलों, ऊंची घास, आर्द्रभूमि और समृद्ध वन्यजीवों के लिए जाना जाता है. यहां बाघ, तेंदुआ, स्लॉथ बियर, बारहसिंगा और पक्षियों की कई प्रजातियां पाई जाती हैं. यह तराई आर्क लैंडस्केप का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.
पीलीभीत सड़क और रेल मार्ग से आसपास के क्षेत्रों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. पीलीभीत जंक्शन से बरेली, टनकपुर, शाहजहांपुर और अन्य नजदीकी शहरों के लिए रेल संपर्क उपलब्ध है. सड़क मार्ग से पीलीभीत बरेली, दिल्ली, लखनऊ, हरिद्वार, ऋषिकेश, आगरा, कानपुर और टनकपुर से जुड़ा है. पीलीभीत बरेली से करीब 55 किलोमीटर, शाहजहांपुर से लगभग 80 किलोमीटर और उत्तराखंड के टनकपुर से करीब 65 किलोमीटर दूर है. हल्द्वानी की दूरी लगभग 110 किलोमीटर और नैनीताल की दूरी करीब 140 किलोमीटर है. नेपाल सीमा भी पास है और नेपाल का महेंद्रनगर, जिसे अब आधिकारिक रूप से भीमदत्त कहा जाता है, सड़क मार्ग से लगभग 60 से 65 किलोमीटर दूर है. दुधवा टाइगर रिजर्व पीलीभीत से करीब 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. नई दिल्ली की दूरी लगभग 300 किलोमीटर, जबकि लखनऊ करीब 270 किलोमीटर दूर है.
वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव को छोड़कर, जिसमें भाजपा तीसरे स्थान पर रही थी, 2009 के बाद हुए बाकी छह प्रमुख चुनावों में भाजपा इस क्षेत्र में पहले स्थान पर रही है. इनमें लगातार दो विधानसभा चुनावों में जीत और चार लोकसभा चुनावों में बढ़त शामिल है. हालांकि 2022 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए काफी करीबी रहा और उसकी जीत का अंतर घटकर सिर्फ 6,970 वोट रह गया. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा की बढ़त में काफी कमी आई, हालांकि पार्टी बढ़त बनाए रखने में सफल रही.
इसलिए भाजपा के पास 2027 के विधानसभा चुनाव में पीलीभीत सीट बरकरार रखने का आधार है, लेकिन पिछले चुनावों में कम हुए जीत के अंतर के कारण पार्टी इस सीट को पूरी तरह सुरक्षित नहीं मान सकती. गांधी परिवार को राजनीतिक रूप से किनारे किए जाने के बाद पैदा हुए संगठनात्मक और राजनीतिक असंतोष को भी भाजपा को संभालना होगा. खासतौर पर उन मतदाताओं और कार्यकर्ताओं के बीच, जो लंबे समय से पीलीभीत की राजनीति में गांधी परिवार की मौजूदगी के आदी रहे हैं. दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी भाजपा की अंदरूनी मुश्किलों को अपने लिए चुनावी अवसर में बदलने की कोशिश करेगी. हालांकि केवल भाजपा के भीतर असंतोष पर निर्भर रहना समाजवादी पार्टी के लिए पर्याप्त नहीं होगा. पार्टी को मुस्लिम मतदाताओं और विपक्षी वोटों के अन्य वर्गों में अपनी स्थिति बनाए रखने के साथ-साथ गैर-मुस्लिम मतदाताओं के बीच भी अपनी स्वीकार्यता बढ़ानी होगी.
2027 की ओर बढ़ते हुए पीलीभीत में भाजपा फिलहाल आगे दिखाई देती है, लेकिन इस विधानसभा क्षेत्र ने कई बार यह दिखाया है कि यहां विधानसभा चुनाव के मतदाता हमेशा लोकसभा चुनाव के रुझान के अनुसार मतदान नहीं करते. यही अंतर और पिछले दो चुनावों में कम होते जीत के अंतर इस सीट को भाजपा के कुल चुनावी रिकॉर्ड से अधिक प्रतिस्पर्धी बनाते हैं. भाजपा चुनाव में बढ़त के साथ उतरती है, लेकिन समाजवादी पार्टी के पास भी यह मानने की पर्याप्त वजह है कि मुकाबला अब उसकी पहुंच से बाहर नहीं है.
(अजय झा)
Shailendra Singh Gangwar
SP
Shane Ali
BSP
Nota
NOTA
Shakeel Ahmad Noori
INC
Arvind Yadav
SVSAP
Moti Ram Rajpoot
SDU
Mohd Sharik
IND
Ikrar Husain
IND
Bela Mati
BSRD
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