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केरल और असम में मुसलमानों का मसीहा कौन, बदरुद्दीन अजमल का असल इम्तिहान

असम और केरल विधानसभा चुनाव के लिए 9 अप्रैल को मतदान है, जिसमें सबसे बड़ा इम्तिहान मुस्लिम सियासत का है. केरल में मुस्लिम लीग तो असम में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF की अग्निपरीक्षा है. ऐसे में देखना है कि मुसलमानों का दिल कौन जीत पाता है?

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असम में बदरुद्दीन अजमल क्या मुस्लिमों का दिल जीत पाएंगे (Photo-PTI)
असम में बदरुद्दीन अजमल क्या मुस्लिमों का दिल जीत पाएंगे (Photo-PTI)

असम, केरल और पुडेचेरी विधानसभा के लिए प्रचार का शोर थम गया है. इन तीनों राज्यों में 9 अप्रैल को मतदान है. असम में कांग्रेस और बीजेपी के बीच मुकाबला है तो केरल में लेफ्ट के नेतृत्व वाले एलडीएफ और कांग्रेस के यूडीएफ में सीधी लड़ाई है. इन दोनों ही राज्य में मुस्लिम वोटर काफी अहम है, जिसके चलते मुस्लिम आधार वाले दलों का भी सियासी इम्तिहान होना है? 

देश में भले ही मुस्लिम मुस्लिम आबादी 14 से 15 फीसदी के बीच हो, लेकिन केरल में 27 फीसदी और असम में 35 फीसदी के बीच है. इस तरह दोनों ही राज्यों में मुस्लिम वोटर काफी अहम है, जिसे देखते हुए मुस्लिम दल भी अपना सियासी दम दिखाने के लिए ताकत झोंक रखी है. 

मुस्लिम वोटों की सियासत ताकत और अहमियत को देखते हुए केरल चुनाव में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग तो असम में मौलाना बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF की अग्निपरीक्षा है. केरल में मुस्लिम लीग कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ का हिस्सा है तो असम में AIUDF और कांग्रेस आमने-सामने हैं. 

असम में बदरुद्दीन अजमल की अग्निपरीक्षा
असम विधानसभा चुनाव के 126 सीटों पर 722 उम्मीदवार किस्मत आजमा रहे हैं, जिसमें बदरुद्दीन अजमल की पार्टी सिर्फ 27 सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है. AIUDF ज्यादातर निचले असम के इलाके वाली सीटों पर ही किस्मत आजमा रही है, जो बांग्लादेश से सटा हुआ है. यहां पर मुस्लिम वोटर्स निर्णायक हैं. इस क्षेत्र में 50 सीटें आती हैं, जिसमें से 2021 में एनडीए ने 23 सीटों तो कांग्रेस-एआईयूडीएफ ने 27 सीटें जीती थी.इस बार दोनों ही अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं, जिसके चलते अजमल को बीजेपी के साथ-साथ कांग्रेस से लड़ाई लडडनी पड़ रही. 

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धुबरी, बारपेटा,गोलपाड़ा क्षेत्र में मुस्लिम वोटर बड़ी संख्या में है, जहां पर कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की पार्टी के बीच मुकाबला, क्योंकि पिछली बार एआईयूडीएफ 16 सीटें जीती थी, लेकिन हालात इस बार बदले हुए हैं. ऐसे में बदरुद्दीन अजमल को मुस्लिम वोटों का समर्थन हासिल करने के लिए असदुद्दीन ओवैसी को बुलाकर रैली कराना पड़ा है.

असम में बदरुद्दीन की सियासी चुनौती
असम में मुस्लिम वोटों की राजनीतिक अहमियत को देखते हुए मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने'ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट' (AIUDF) का गठन 2005 में किया. अजमल ने अपनी राजनीति मुस्लिम अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से असमिया भाषी और बंगाली मूल के मुसलमानों के अधिकारों के हिमायती के तौर पर शुरू की और 2009 से 2024 तक धुबरी से सांसद रहे. 

साल 2006 के विधानसभा चुनाव में AIUDF के पास 10 विधायक जीते थे, 2011 में बढ़कर 18 विधायक हो गए. 2016 में 13 सीटों पर कामयाबी मिली फिर 2021 में 16 सीटों पर जीत मिली. इस तरह से हर साल, AIUDF का जनाधार बढ़ा और पार्टी मजबूत हुई है, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बदरुद्दीन अजमल की राजनीति को गहरा झटका लगा, जब वो अपनी ही सीट हार गए. कांग्रेस दोबारा से मुस्लिम वोटों पर अपनी पकड़ बनाती नजर आ रही है, जिसके चलते 2026 का चुनाव अजमल के लिए काफी अहम माना जा रहा. 

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असम में मुस्लिमों की पहली पसंद कौन बनेगा?
असम में तकरीबन मुस्लिम आबादी 34 फीसदी है, जो राज्य की कुल 126 सीटों में से 32 सीटों पर अहम रोल अदा करते थे. 2021 में 31 मुस्लिम विधायक जीतकर आए थे,लेकिन परिसीमन में मुस्लिम सीटों का गेम बदल गया है. मुस्लिम मतदाता अब 32 सीटों के बजाय 22 सीटों पर ही निर्णायक रोल में रह गए हैं. कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल दोनों की नजर मुस्लिम वोटबैंक पर टिकी हुई है. 

मुस्लिम वोटर ही बदरुद्दीन अमजल की ताकत है तो कांग्रेस की नजर भी इसी वोटबैंक पर टिकी हुई है. 021 में बदरुद्दीन अजमल और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ी थी, लेकिन इस बार दोनों ही अलग-अलग किस्मत आजमा रही हैं. ऐसे में मुस्लिम वोटर की पहली पसंद कौन बनेगा, यह बड़ा सवाल है. 2024 के लोकसभा चुनाव में देखा गया है कि मौलाना बदरुद्दीन अजमल से मुस्लिमों को मोहभंग हुआ है. कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधी लड़ाई में मुस्लिम वोटर किस करवट बैठेगा, यह अहम है?

केरल में मुस्लिम लीग का क्या होगा? 
दक्षिण भारत में मुस्लिम आबादी सबसे वाला राज्य केरल हैं. केरल में करीब 27 फीसदी मुस्लिम आबादी है,जो 80 लाख से अधिक है. मलप्पुरम, कोझिकोड और कन्नूर जिलों में मुस्लिम वोटर काफी अहम माने जाते हैं.केरल का मुस्लिम समुदाय अपनी शैक्षिक उपलब्धियों और राज्य के सामाजिक-आर्थिक विकास में सक्रिय भागीदारी के लिए जाना जाता है. केरल में मुस्लिम सियासत मुख्य रूप से इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के इर्द-गिर्द केंद्रित है और ठीक ठाक पकड़ मानी जाती है. 

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मुस्लिम लीग केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है. केरल की 140 सीटों में से 26 सीटों पर मुस्लिम लीग ने अपने उम्मीदवार उतार रखा है और बाकी सीटों पर कांग्रेस और दूसरे सहयोगी दल को समर्थन कर रही है. मुस्लिम लीग केरल के  मलप्पुरम, कोझिकोड और कासरगोड जिले की मुस्लिम बहुल सीटों पर ही किस्मत आजमा रही है. ये सभी इलाके कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ की सहयोगी पार्टी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) को पारंपरिक वोटर हैं. 

केरल में मुस्लिम लीग का सियासी आधार
1962 से लेकर अब तक प्रत्येक लोकसभा में इसके कम से कम दो सांसद रहे हैं और हर विधानसभा चुनाव में उसका खाता खुलता रहा है.केरल विधानसभा के 140 सीटों में से 32 मुस्लिम विधायक हैं. इनमें से 15 इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) से, नौ वामपंथी दलों से, तीन कांग्रेस से, तीन निर्दलीय और एक-एक इंडियन नेशनल लीग और नेशनल सेकुलर कॉन्फ्रेंस से है. 

केरल में कुल 43 सीटें ऐसी हैं, जहां पर मुस्लिम मतदाता राजनीतिक समीकरण बना और बिगाड़ सकते हैं. पिछले कई दशकों से केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने अपना वर्चस्व मुस्लिमों के बीच बना रखा है. कांग्रेस के साथ गठबंधन होने के चलते मुस्लिम वोटों का बिखराव भी नहीं हो पाता है. केरल में मुस्लिम बहुल जिला मलप्पुरम हमेशा से आईयूएमएल का गढ़ रहा है. इस बार केरल में यूडीएफ और एलडीएफ की बीच लड़ाई में यूडीएफ का सियासी पलड़ा भारी दिख रहा है. ऐसे में मुस्लिम लीग के लिए सियासी मुफीद माना जा रहा है.

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